भरमौर के कई गद्दी समुदायों के परिवार में ज्येष्ठ पुत्र को पहनना जरूरी है कुगती के केलंग बजीर का ‘लाण’, उपासक के लिए वर्जित शराब और मांसहार का सेवन

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भरमौर के कई गद्दी समुदायों के परिवार में ज्येष्ठ पुत्र को पहनना जरूरी है कुगती के केलंग बजीर का ‘लाण’, उपासक के लिए वर्जित शराब और मांसहार का सेवन
कुगती से लौटकर कपिल मेहरा की रिपोर्ट
चंबा जिले के जनजातीय क्षेत्र भरमौर के कुगती गांव से करीब 6 किलोमीटर दूर एक उंची पहाड़ी पर स्थित केलंग बजीर का मंदिर हजारों लोगों की आस्था का केंद्र है। भगवान केलंग बजीर शिवजी के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय का ही दूसरा नाम है, जिसे देवताओं का सेनापति भी कहा गया है। मनमोहक हरे-भरे पहाड़ी क्षेत्र से घिरा यह मंदिर साल में करीब साढ़े चार महीने बंद रहता है। मंदिर हर वर्ष 13-14 अप्रैल को बैशाखी वाले दिन खुलता है और नवंबर के अंत में तय तिथि पर बंद कर दिया जाता है। माना जाता है कि नवंबर महीने के बाद क्षेत्र में भारी बर्फबारी होती है, इसलिए श्रद्धालुओं का मंदिर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। यह भी मान्यता है कि इस अंतराल के दौरान देवता स्वर्गलोक को चले जाते हैं और इस दौरान मंदिर जाने पर कोई अनहोनी घटना की आशंका रहती है।
मंदिर को लेकर लोकमान्यता
इस मंदिर के संदर्भ में लोकमान्यता है कि जब भगवान कार्तिकेय को पता चला कि माता पार्वती ने गणेश जी का राज्यभिषेक करवा दिया है तो वे क्रोधित हो उठे और माता पार्वती को उनका मांस व दूध वहीं अपर्ण कर दिया और अपना कंकाल स्वरूप लेकर कैलाश पर्वत से निकल पड़े। कहा जाता है कि कैलाश से कार्तिकेय सीधे कुगती पहुंचे थे और वहां पर कुछ देर विश्राम करने के बाद लाहौल की ओर चल पड़े। कुगती में जिस स्थान पर भगवान कार्तिक स्वामी ने विश्राम किया था, उस स्थान पर आज भी लोग कार्तिक स्वामी की पूजा करते हैं। लाहौल में कई देवताओं के मनाने के बावजूद भी कार्तिकेय नहीं माने और अंततः भोलेनाथ ने स्वयं आकर उनको मनाया और कैलाश पर्वत साथ चलने को कहा। लेकिन, कार्तिकेय ने भोलेनाथ से कहा कि वह अब कैलाश तो नहीं जाएंगे, लेकिन पिता जी का आदेश है तो कैलाश पर्वत से पीछे एक पहाड़ी पर उनका वास रहेगा। बताया जाता है कि जिस स्थान पर कार्तिकेय ने अपना स्थान लिया उस जगह को शिव भयाली कहा जाता है। कार्तिकेय को भगवान भोलेनाथ का वरदान है कि जो भी व्यक्ति इस मंदिर में आकर कार्तिकेय पूजा-अर्चना करेगा उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।
मंदिर निर्माण के सन्दर्भ में प्रसंग
बताया जाता है कि इस स्थान पर आम लोगों का पहुंचना बहुत ही मुश्किल था और एक दिन कार्तिकेय की पूजा के दौरान भक्तों ने कहा कि इस स्थान पर आपके सभी भक्त नहीं पहुंच पाते हैं, इसलिए प्रभु आप ऐसी जगह पर विराजमान हों, जहां पर आम लोग भी आपके दर्शनार्थ पहुंच सकें। तभी चेले को खेल आई और उसने एक कुट की थाली अर्थात भाणा उपर से नीचे फेंका और कहा कि जिस स्थान पर यह थाली रूकेगी वहीं पर अब कार्तिकेय का वास होगा। इसके बाद थाली पहाड़ी से काफी नीचे आकर ऐसे स्थान पर मिली जहां पर लोगों का पहुंचना आसान था। बाद में इसी जगह पर केलंग बजीर का मंदिर बनाया गया। बताया जाता है कि स्थान पर कार्तिक स्वामी की स्वयंभू मूर्ति भी प्रकट हुई। यह मूर्ति आज भी मंदिर में मौजूद है। इसके साथ ही एक संगमरमर की मूर्ति एक भक्त द्वारा मंदिर में स्थापित करवाई गई और एक मूर्ति 1972 में मंदिर के पुजारियों ने भी स्थापित करवाई है।
कार्तिक स्वामी की बहन माता मराली
कार्तिक स्वामी मंदिर के पास ही थोड़ी चढ़ाई चढ़कर माता मराली का मंदिर भी स्थापित किया गया है। माता मराली को अशोकसुंदरी या मनसा देवी भी कहा जाता है। लोग केलंग बजीर के मंदिर में दर्शन करने के उपरांत माता मराली मंदिर में भी पूजा-अर्चना करते हैं। माता मराली भगवान कार्तिकेय की बहन है और जहां भी भगवान कार्तिकेय का मंदिर होता है उसके पास माता मराली का मंदिर भी जरूर होता है। मन्नत पूरी होने पर लोग कार्तिकेय के मंदिर में घंटी, संगल और छड़ी तथा माता मराली के मंदिर में त्रिशूल चढ़ाते हैं। मंदिर में दूरदराज क्षेत्रों से लोग आकर यहां जागरण आदि भी करवाते हैं।
मंदिर में क्लश रखने की परंपरा
मंदिर के पुजारी जोधा राम शर्मा और मचलू राम शर्मा बताते हैं कि यहां यह भी परंपरा है कि मंदिर के कपाट बंद करने से पहले मंदिर के गर्भ गृह में पानी की गड़वी अर्थात क्लश रखा जाता है। जब 13 अप्रैल को मंदिर के कपाट खोले जाते हैं तो सर्वप्रथम उस क्लश को देखा जाता है। अगर इस अंतराल के बाद गड़वी पानी से भरी मिले तो उस वर्ष इलाके में अच्छी बारिश और सुख-समृद्धि होने की उम्मीद रहती है। अगर गड़वी आधी या इससे कम मिले तो इलाके में सूखे की संभावना व्यक्त की जाती है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
मंदिर में चढ़ता नई फसल का प्रसाद
इलाके के लोग मंदिर के कपाट खुलने पर समय-समय पर श्रद्धा के अनुसार मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते है तथा नई फसल से बना प्रसाद भगवान कार्तिकेय और देवी मराली को अर्पित करते हैं। दूरदराज क्षेत्रों से कुछ लोग मंदिर में जातर लेकर भी पहुंचते हैं। मणिमहेश यात्रा के दौरान भी कई श्रद्धालु यात्रा शुरू करने से पहले केलंग बजीर के मंदिर में पहुंचकर माथा टेकते और कुगती होकर मणिमहेश पहुंचते है। इसे परिक्रमा करना कहा जाता है।
पहना जाता है विशेष पहरावा
कार्तिकेय स्वामी के गद्दी भक्त और उनके चेले पूजा-अर्चना के दौरान विशेष प्रकार का पहरावा पहनते हैं, जिसे गद्दी भाषा में लाण कहा जाता है। लाण में लाल रंग की उन से बनी टोपी और एक नरवार होती है, जो मफलर जैसी होती है और इसे कमर में बांधा जाता है। मान्यता है कि जो भी भक्त पूरे भक्तिभाव से इस लाण को पहनता है और केलंग बजीर की अराधना करता है उस पर जादू टोणे या टोटके का कोई असर नहीं होता है। लाण पहनने वाला भक्त के लिए शराब, मांस, मछली व अंडे का सेवन वर्जित माना जाता है। भरमौर में कुछ गद्दी समुदायों के परिवारों में ज्येष्ठ पुत्र को यह लाण पहनना ही पड़ता है।
बुहारी देवता को भी पूजते हैं लोग
क्षेत्र के लोग बुहारी देवता की भी अराधना करते हैं। बुहारी देव को सात कोठियों का राजा माना गया है। लाहौल स्पीति में भी कार्तिकेय स्वामी जी के मंदिर के पास बुहारी देवता का भी मंदिर है। वहीं, भरमौर से करीब 4 किलोमीटर दूरी पर सठली गांव में भी कार्तिकेय स्वामी का मंदिर बनाया गया है और जो लोग कुगती स्थित केलंग बजीर के मंदिर में जाने में असमर्थ होते हैं, वे सठली के मंदिर में माथा टेक अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।
जैविक गांव है कुगती
कुगती को जैविक गांव का दर्जा दिया गया है। यहां के लोग जैविक खेती करते हैं और इनका रहन-सहन बहुत ही सादा है। बर्फबारी के दौरान गांव पूरी तरह भरमौर से कट जाता है। गांव के एक छोर पर बहने वाले नाले की कल-कल करती आवाज एक संगीत का एहसास करवाती है। चारों ओर से बर्फ से ढकी पहाड़ियां गांव की सुंदरता को चार चांद लगाती है। देवदार और चीड़ की लकड़ी से बने घर मन को एक अजब अतीत से रूबरू करवाते हैं। यहां मक्की को कुकड़ी कहते हैं और मक्की की रोटी से बना सिड्डू विवाह-शादियों व अन्य समारोहों में धाम के दौरान परोसा जाता है।
कुगती के अख्ररोट और खुमानी
गांव में गद्दी समुदाय के ही लोग रहते हैं और महिलाओं का मुख्य पहरावा नोआचड़ी और पुरूषों का गद्दी टोपी व चोला है, लेकिन समय के बदलाव के कारण आजकल बहुत कम लोग अपने प्राचीन पहरावे को पहनते हैं। लोगों के अनुसार गांव के 90 फिसदी लोग कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। यू तो यह गांव करीब 1514 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है और गांव के 72 हेक्टेयर एरिया में खेती की जाती है। गांव की मुख्य फसल राजमाह, आलू, मक्की, जौ व कुट आदि हैं। इसके साथ ही सेब, अखरोट और खुमानी की पैदावार भी यहां भरपूर होती है। गांव के बच्चों की शिक्षा के लिए यहां प्राथमिक व हाई स्कूल खोले गए हैं।
कैसे पहुंचे
हम बस या निजी वाहन के जरिए कुगती पहुंच सकते हैं। यह स्थान जिला मुख्यालय चंबा से करीब 88 किलोमीटर दूर है। चंबा से भरमौर की दूरी 62 किलोमीटर और भरमौर से कुगती की दूरी 26 किलोमीटर है। चंबा से राख, गैहरा, खड़ामुख, भरमौर, हडसर होते हुए हम कुगती पहुंच सकते हैं। कुगती से केलंग बजीर मंदिर की दूरी 6 किलोमीटर है, जो पैदल योग्य मार्ग है।
(कपिल मेहरा, गांव, डाकघर व तहसील ज्वाली, जिला-कांगड़ा, हि प्र, पिन.176023, मोबाइल – 9816412261.)

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