बेहद खूबसूरत है अर्की की प्रवीण पुंडीर की रंगों की दुनिया,आप भी घूम कर देखिये दिल को मिलेगा सकूं

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बेहद खूबसूरत है अर्की की प्रवीण पुंडीर की रंगों की दुनिया,आप भी घूम कर देखिये दिल को मिलेगा सकूं
चंडीगढ़ से वीरेंद्र शर्मा वीर की रिपोर्ट
अर्की की प्रवीण पुंडीर की रंगों की दुनिया बेहद खूबसूरत है. पेशे से शिक्षिका ने चित्रकला में बनाई खास पहचान बनाई है। वह वाटर कलर, आॅयल‌ कलर रंगों से बैड शीट, पर्दे , सिरहाना, बुड राइटिंग, जियोमेट्री, फायर राइटिंग, डबल‌ राइटिंग, स्लोगन राइटिंग माॅडल,स्केल, ‌स्नोराइटिंग के अलावा वाॅल पेंटिंग, टाइल‌ पेंटिंग , ग्लास‌ पेंटिग, कोलाज़ मेकिंग, क्ले वर्क, स्कैच मेकिंग कर चित्रों में जान डाल देती है। जहां एक ओर अपने चित्रों के जरिए कई लुप्त होती विधाओं को संजोने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है, वहीं चित्रों के माध्यम से सामाजिक बुराइयों एवं पीड़ा को भी उजागर करने में लगी है ।
हर विधा में महारत
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का स्कैच, क्रियेटिव बुद्धा, माडर्न गर्ल, निर्भया, शाब्दिक गणपति, माडर्न शिवा,आधुनिक चीरहरण,राष्ट्रीय पक्षी पर आधारित रंगोली उसकी कुछ बेहतरीन कृतियाँ हैं । प्रवीण पुंडीर के चित्रों की हिमाचल विश्वविद्यालय व स्टेट म्यूजियम में दो सफल प्रदर्शनियां लग चुकीं हैं ।कुछ वर्ष पहले तक चित्र/ स्कैच बनाकर या कसीदाकारी अपने जानकारों में बांट देने वाली प्रवीण ने इस‌ विधा को गंभीरता से लेना शुरू किया है और इस तरह करीब पचास से अधिक चित्र उसकी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में जमा हो चुके हैं।
फाइन आर्ट्स की पढाई
शिमला स्थित सरकारी प्रिंटिंग प्रैस कर्मचारी अर्की निवासी राम चरण व गृहणी माता सत्या देवी के घर 26 अक्टूबर 1989 को जन्मी प्रवीण पुंडीर की शिक्षा- दीक्षा (पहली कक्षा से दस जमा दो तक) शुरू से ही प्रदेश की राजधानी के निकट उपनगर टूटू में हुई ! बीए आरकेएमवी शिमला , तो बीएड हिमाचल विश्वविद्यालय शिमला से और इसके बाद दो वर्ष का आर्ट्स एंड क्राफ्ट में डिप्लोमा किया और बाद में हिमाचल विश्वविद्यालय से डाॅ हिम चटर्जी के निर्देशन और नंदलाल‌ के सानिध्य में एमए फाइन आर्ट्स किया।
कला शिक्षिका की भूमिका
वर्तमान में शिमला जिला के जुब्बडहट्टी में माॅऊंट शिवालिक स्कूल में बतौर कला अध्यापक सेवाएं दे रही प्रवीण को जहां एक ओर लियोनार्डो द विंची सबसे सबसे अधिक आकर्षित करती है वहीं सोभा सिंह द्वारा एक ही चित्र में रंगों के प्रयोग का तरीका और उनके जरिए एक ही चित्र में पात्रों की मनोदशा दर्शाती पूरी कहानी कह देने की कला प्रभावित करती है ।और पेंटिग बनाने के लिए कुदरत का हर रंग हर देन बहुत अच्छी लगती हैं।
दुनिया के रंग और रंगों की दुनिया
इस संसार में प्रत्येक जीवित प्राणी भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील होता है और मानव समस्त जीवित प्राणियों में सभ्य एवं सर्वोपरि।उसने अपने समकक्ष समाज के साथ अपनी भावनाओं के संप्रेषण के लिए प्राचीन समय से विभिन्न प्रकार की विधियां जैसे कि न केवल कविता, कहानी,गीत-संगीत, गज़ल कहना सीख लिया बल्कि इसके लिए मददगार कई तरह के औजा़रों एवं वाद्य यंत्रों का अविष्कार कर लिया , वो न केवल जीवंत लगने वाली मूर्ति कला में भी पारंगत हो गया । इसी तरह की एक और सजीव कलात्मक विधि जो मानव ने विकसित की वो है चित्रकला।
प्राचीनतम स्रोत विष्णु धर्मोत्तर पुराण में चित्रकला का उल्लेख 
चित्रकला बेहद प्राचीन कला है। यूं कहा जाए कि मानव सभ्यता के विकास ही इस कला का भी विकास हो गया होगा तो अतिश्योक्ति न होगी। भारत में चित्रकला के बारे में बताता एक प्राचीनतम स्रोत विष्णु धर्मोत्तर पुराण है चित्रकला का प्रचार चीन, मिस्र, भारत आदि देशों में अत्यंत प्राचीन काल से है। मिस्रसे ही चित्रकला यूनान में गई, जहाँ उसने बहुत उन्नति की। 1400 इस्वी ईसा पूर्व मिस्र में चित्रकला का चरम पर पर थी । 3000 वर्ष तक से अधिक पुराने मिस्र चित्र लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में संग्रहित हैं।
भारतवर्ष में अत्यंत प्राचीन काल से चित्रकला 
भारतवर्ष में भी अत्यंत प्राचीन काल से यह विधा प्रचलित थी, इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। रामायण एवं महाभारत में चित्रों, चित्रकारों तथा चित्रशालाओं का वर्णन बराबर आता है। विश्वकर्मीय शिल्पशास्त्र में भी लिखा गया है कि स्थापक, तक्षक, शिल्पी आदि में से शिल्पी को ही चित्र बनाना चाहिए। प्राकृतिक दृश्यों को अंकित करने में प्राचीन भारतीय चित्रकार कितने निपुण थे, इसका कुछ आभास भवभूति के उत्तर रामचरित के देखने से मिलता है, जिसमें उनके बनाए हुए वनवास‌ काल के अपने सजीब चित्रों के उनके सामने लाए जाने के उपरांत उन्हे देखकर माता सीता जी चकित हो जाती हैं। यद्यपि आजकल कोई पुरातन ग्रंथ चित्रकला पर नहीं मिलता तथापि प्राचीन काल में ऐसे ग्रंथ अवश्य उपलब्ध थे। कश्मीर के राजा जयादित्य की सभा के कवि दोमोदर गुप्त आज से 100 वर्ष पहले अपने कुट्टनीमत नामक ग्रंथ में चित्रविद्या के ‘चित्रसूत्र’ नामक एक ग्रंथ का उल्लेख किया है। अजंता गुफा के चित्रों में प्राचीन भारतवासियों की चित्रनिपुणता देख कोई भी चकित हो जाए । बड़े – बड़े विज्ञ युरोपियनों ने इन चित्रों की प्रशंसा की है। उन गुफाओं में चित्रों का बनाना ईसा से दो सौ वर्ष पूर्व से आरंभ हुआ और आठवीं शताब्दी तक नित नई गुफाएँ खुदती रहीं। अतः डेढ़ दो हजार वर्ष के प्रत्यक्ष प्रमाण तो ये चित्र अवश्य हैं ही।
पहाड़ी चित्रकला शैली की उड़ान 
उपरोक्त चित्रकला शैलियों की तरह एक विशिष्ट शैली जो विकसित हुई वो है पहाड़ी चित्रकला शैली, जिसने महाराजा संसारचंद के समय नई उंचाइयों को छुआ । हिमाचल प्रदेश की बात करें तो प्राचीन समय में महाराजा संसार चंद के समय जो कि उस समय कला और कलाकारों के संरक्षक एवं प्रशंसक के रूप में प्रसिद्ध हुए के समय या आसपास खुशाला, कामा, गोढू,नैनसुख, मणखू, निक्का, सीचू आदि उस दौर के मशहूर चित्रकार हुए (गढवाल से लेकर जम्मू तक विभिन्न नामों ( गढवाली,बसोहली, कांगड़ा / गुलेर शैलियां विश्व प्रसिद्ध हैं ) इसके बाद रूसी चित्रकार निकोलस रौरिक, सरदार सोभा सिंह, ओपी टाॅक से होते हुए पद्म श्री विजय शर्मा, धनीराम खुशदिल, डाॅ हिम चटर्जी, नंदलाल ठाकुर से होते हुए कई उभरते चित्रकारों को रास्ता दिखाते हुए मंजिल के दर्शन करवाती है।प्रदेश में वर्तमान बहुत से उभरते हुए में नाम हैं जिनमें से एक है अर्की से उभरती हुई चित्रकार प्रवीण पुंडीर का।

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