बहादुरपुर किले से सुनाए गए थे मोहणा को फांसी पर लटकाने के आदेश, अब नहीं बचा किले का नामोनिशान बाकि

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बहादुरपुर किले से सुनाए गए थे मोहणा को फांसी पर लटकाने के आदेश, अब नहीं बचा किले का नामोनिशान बाकि
चंडीगढ़ से वीरेंद्र शर्मा ‘वीर’ की रिपोर्ट
सन 1922 बहादुरपुर किले में बैठ कर राजा विजयचंद ( बिजाई चंद) ने बेकसूर मोहणा को फांसी पर लटकाने के आदेशों पर दस्तखत किए थे। इस फरमान के बाद सांडू के मैदान ( लूहणू मैदान) वाली जगह पर हजारों लोगों की भीड़ इक्टठा कर मोहणा को सरेआम फांसी पर लटका दिया गया था। भ्रातृप्रेम का अत्यंत मार्मिक एक लोकगीत ‘मोहणा’उसी सत्य घटना पर बुना गया है।
सबसे ऊंची पहाड़ी पर किला
सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बहादुरपुर किला कलहूर रियासत की सबसे ऊंची पहाड़ी पर समुद्र तल से1980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बाड़ी धार नामक पहाड़ी पर स्थित था। इसे पड़ोसी राज्यों की गतिविधियों पर नजऱ रखने के साथ कहलूर रियासत की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में विकसित किया गया था। कलहूर के ताज के रूप में विख्यात इस किले का निर्माण किसने करवाया इसको लेकर बहुत सी कहानियां हैं और निर्माण के कालखंड को लेकर भी इतिहासकार एक मत नहीं हैं।
जर्मन यात्री बैरन चाल्र्स ह्यूगेल की बिटनेस
1835 में बिलासपुर से गुजरने वाले एक जर्मन यात्री बैरन चाल्र्स ह्यूगेल ने इस किले की एक ज्वलंत तस्वीर रिकॉर्ड की है। इसलिए, यह तो स्पष्ट है कि इस किले को 1835 से पहले बनाया गया था, लेकिन अब न तो यह यह किला रहा और न हीं इसकी नींव। नींव की खुदाई कर पत्थर निकालने से यहां बड़ी– बड़ी खाइयां बन गई हैं, जो अभी भी यदाकदा नजऱ आ जाती हैं।
मंदिर और प्राकृतिक जल स्त्रोत
बहादुरपुर किले में प्राचीन पांडव मंदिर था। इसके अलावा एक देवी का मंदिर था, जहां पर राजा अपना शीश नवाता। किले के पास भी एक प्राकृतिक बाबड़ी थी। कहा जाता है कि राजपरिवार जब यहां पर उपस्थित होता तो केवल उसी बावड़ी का जल ग्रहण करता था। जहां कभी किला अवस्थित था, अब वहां एक हिस्से पर देवी का मंदिर बनाया गया है ।
किले को लेकर मत और कहानियां
मत एक –
पहले मत के अनुसार मंडी के सबसे राजा शासक साहू सेन थे। बाहू सेन उनके छोटे भाई थे और उनके नौ वंशज थे,। राजा केशव सेन कतार में आठवें स्थान पर थे। इस मत के अन ुसार राजा केशव सेन ने बहादुरपुर किले का निर्माण बाहरवीं शाताब्दी में मंडी रियासत की सीमा पर चौकी के रूप में युद्ध के दौरान उनके दुश्मनों के खिलाफ एक कवच प्रदान करने के लिए करवाया था।
मत दो –
बहादुरपुर किले का निर्माण रियासत के तीसवें राजा बिक्रम चंद ने सन् 1555–1593 ई. ने अपनी बाघल (अर्की) वाली रानी को प्रसन्न करने के लिए करवाया। बिक्रम चंद की दो रानियां थीं। एक कांगड़ा के राजा की पुत्री तो दूसरी बाघल रियासत से। इस मत के अनुसार राजा विक्रम ने बागल रियासत से लाई रानी को खुश करने के लिए बहादुरपुर जैसी रमणीय जगह पर महल का निर्माण करवाया था।।
मत तीन –
तीसरे मत के अनुसार 1620 ईस्वी में विक्रम चंद की मृत्यु पश्चात कांगड़ा वाली रानी का पुत्र सुल्तान चंद गद्दी पर बैठा तो केशवचंद ने बहादुरपुर में रहकर अपने पिता बिक्रम चंद द्वारा बनवाए इस किले को मजबूत कर शक्ति अर्जित की और फिर कहलूर पर चढ़ाई कर दी। लड़ाई में उसकी जीत हुई और सुल्तान चंद भाग कर अपने मामा के घर कांगड़ा चला गया। सात वर्ष बाद कांगड़ा के राजा ने सुल्तान चंद को साथ लेकर केशव चंद पर चढ़ाई कर दी। दोनों भाई लड़ाई में घायल होकर मर गए। केशवचंद का कोई पुत्र नहीं था तो सुल्तान चंद के पुत्र कल्याण चंद ने राजगद्दी संभाली और ये बहादुरपुर किला ग्रीष्मकालीन राजधानी बना रहा।
मत चार –
स्थानीय निवासियों के अनुसार बाघल की राजकुमारी के साथ जब विक्रम चंद की शादी हुई तो यह किला और आसपास के क्षेत्र उन्हें दहेज में मिले थे।
सिर्फ यहां गिरती है बर्फ
यह स्थान चीड़ ,कायल, बाण और देवदार के पेड़ों से आच्छादित घने वनों से घिरा हुआ है और जिला बिलासपुर इकलौता स्थान है जहां अभी भी प्रतिवर्ष अभी तक बर्फवारी होती है। अब यह स्थान बिलासपुर– शिमला मार्ग पर नम्होल से दाईं ओर पहाड़ी की चोटी पर बारह किलोमीटर दूर टेपरा पंचायत के अंतर्गत आता है।
पर्यटन की अपार संभावनाएं
अब यहां पर वन विभाग एवं लोकनिर्माण विभाग ने एक– एक कर विश्राम गृह का निर्माण किया है यह स्थान इतना रमणीय है कि अगर इको टूरिज्म स्कीम के तहत विकसित करने के लिए स्थानीय युवाओं को प्रेरित किया जाए तो न केवल रोजगार मिलेगा अपितु पर्यटन की दृष्टि से भी क्षेत्र गुलज़ार हो उठेगा।

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