बंदरों का आतंक, नेताओं के मुंह बंद : 10 जिलों में बंदरों के आतंक ने छुड़वा दी खेतीबाड़ी, 2301 पंचायतों में कहर,  करोड़ों का नुकसान

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शिमला से विनोद कुमार भावुक की रिपोर्ट

बंदरों के आतंक के चलते प्रदेश के किसान और बागवान खासे परेशान हैं। पहाड़ पर बंदरों ने ऐसी तबाही मचाई है कि कल तक जिन खेतों में भरपूर आनाज पैदा होता था, आज वे बंजर भूमि में तबदील हो रहे हैं। हजारों बीघा सिंचाई योग्य भूमि पर इसलिए खेती और बागवानी नहीं हो रही है, क्योंकि बंदर खड़ी फसल को तबाह कर जाते हैं। प्रदेश के बंदरों का सरकारी आंकड़ा ही सात लाख की संख्या पार कर चुका है। लाहुल-स्पिति और किन्नौर जिलों को छोड़ प्रदेश के बाकि सभी जिलों में बंदरों का उत्पात जारी है। प्रदेश की 3243 पंचायतों में से 2301 पंचायतें बंदरों के कहर से प्रभावित हैं। राजधानी शिमला में तो बंदरों का ऐसा आतंक है कि कहीं भी बंदर किसी भी तलाशी ले लेते हैं। ताजा सर्वेक्षण के अनुसार हर साल बंदर प्रदेश में 340 करोड़ की फसल और और 170 करोड़ के फलों को बर्दाब कर रहे हैं। नजीतजन प्रदेश के हजारों परिवार अब खेती और बागबानी को छोड़ चुके हैं। जंगली जानवरों से किसानों की फसलों की हिफाजत कब चुनावी मुददे के तौर स्थान पाएगी? इस सवाल का जवाब प्रदेश के किसान सभी दलों से कर रहे हैं।  मंडी के प्राचीन इतिहास की गहन गुफाओं में अंधेरा,  मंडी के प्राचीन इतिहास में बौद्ध संदर्भों की तलाश की कोशिश, कभी प्रसिद्ध यायावर राहुल सांस्कृत्यायन ने भी मंडी के इतिहास को खंगालने के किए थे प्रयास

बंदरों के आतंक से पीडि़त किसानों के दर्द पर अभी तक दोनो राजनीतिक दल चुप्पी सादे हुए हैं। किसी भी राजनीतिक दल ने किसानों को इस समस्या से राहत प्रदान करने के लिए समाधान को अपना चुनावी मुद्दा नहीं बनाया है। बंदरों से लोगों को कैँसे निजात दिलवाई जाए, किसी नेतृत्व के पास कोई जवाब नहीं है। हालांकि प्रदेश में बारी बारी सत्ता सुख भोगती आई कांग्रेस-भाजपा दोनों ने इस मुद्दे पर पिछले चुनावों में वोट बटोरे हैं, लेकिन किसी भी सरकार में बंदरों की समस्या से निजात के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ है।हिमाचल प्रदेश का सेसिल चैपल : अपने भित्ति चित्रों के लिए दुनिया भर में मशहूर 268 साल पुरानी चंबा की ऐतिहासिक धरोहर देवीकोठी मंदिर शायद ही बच पाए


प्रदेश की सरकारें नहीं गंभीर
हालांकि प्रदेश की सरकारों ने बढ़ते बंदरों से निपटने के लिए कई कवायदें की हैं। बंदर संरक्षण पार्क और बंदरों की नसबंदी करने की मुहिम शुरू हुई, लेकिन संरक्षण पार्क की मुहिम औंधे मुहं गिरी है तो बंदरों की नसबंदी का काम लक्ष्य से भटक गया। शिमला के तारादेवी बंदर रसरंक्षण पार्क हालत किसी से छुपी नहीं है। 14 जुलाई, 2007 को सिरमौर जिला के नौहराधार से ऑपरेशन कलिंग शुरू किया गया था, लेकिन इसे बंद कर दिया गया। बंदरों की समस्या से निजात पाए जाने के लिए प्रदेश से बंदरों का निर्यात करने के प्रस्तावों की खबरें भी सुर्खियां बनीं, लेकिन हकीकत की जमीन पर बंदर खेतों में ही काबिज रहे। किसान सभा जरूर बंदरों की समस्या के समाधान के लिए सरकारों पर दबाव बनाने के प्रयास करती रही है, लेकिन समस्या जस की तस मौजूद रही है।  किसान सभा के नेता कुलदीप तनवर कहते हैं कि बंदरों के आतंक से प्रदेश के किसानों की रीढ़ तोड़ दी है। बंदरों और अन्य जंगली जानवरों के कहर का कोई हल नहीं निकलने पर वह सारा दोष सरकारों के सिर मढ़ते हैं। साहित्यकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी पर पढ़िये डॉ विजय पुरी को लेख : गुलेरी जी की कहानियां और उनका लोकजीवनात्मक आधार

हमलावार हुए बंदर
कल तक सिर्फ फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बंदर अब हमलावर भी होने लगे हैं। वन विभाग की मानें तो अभी तक एक हजार से ज्यादा ऐसे मामले सामने आए हैं जब बंदरों ने प्रदेश के लोगों को काट खाया है। बंदरों के हमलों से मौतें तक होने की घटनाएं पुलिस फाईलों में दर्ज हुई हैं। वन्य प्राणी विभाग के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि बंदरों के व्यवहार में पिछले कुछ सालों में तेजी से परिवर्तन हुए हैं। अब भगाने पर भागने की जगह बंदर काटने को दौड़ते हैं।हैदराबाद में ग़ज़ल की दुनिया पर राज, कर रही कांगड़ा की आवाज़,  ज्वाली में पंजाब घराने की गायकी के बेताज बादशाह रहे लक्ष्मण दास की संगीत परंपरा को निभा रहा उनका पोता

30 प्रतिशत ने छोड़ी खेती
बंदरों की समस्या के चलते प्रदेश में कृषि और बागवानी के वजूद पर संकट मंडरा रहा है। प्रदेश के 30 प्रतिशत किसान खेती से अपने हाथ खींच चुके हैं, जबकि इससे भी ज्यादा किसान कोई दूसरा विकल्प न मिल पाने के चलते मजबूरन जान जोखिम में डालकर बंदरों से अपनी फसल की हिफाजत कर रहे हैं। सिरमौर, शिमला और सोलन जिलो में बंदरों का सबसे ज्यादा आतंक है। सिरमौर में 81 फीसदी, शिमला में 57 फीसदी, जबकि सोलन मे 71 फीसदी किसान बंदरों के कहर से प्रभावित हैं। चंबा में 38 प्रतिशत, कांगड़ा और कुल्लू की 28  प्रतिशत, बिलासपुर में 25 प्रतिशत, जबकि मंडी की 19  प्रतिशत पंचायतों में बंदरों का कहर जारी है। हर प्रभावित पंचायत में हर साल औसतन 10  लाख का नुकसान बंदरों की वजह से है। हिमाचल प्रदेश में पैदा होते हैं 368 स्थानीय किस्मों के राजमाह, जीआई टैग के लिए प्रयास कर रहा कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर


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