‘फादर ऑफ हिंदी थियेटर’ के नाम से याद किये जाते हैं शिमल़ा के मनोहर सिंह, थियेटर, टीवी और फिल्मों छोड़ी छाप

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‘फादर ऑफ हिंदी थियेटर’ के नाम से याद किये जाते हैं शिमल़ा के मनोहर सिंह, थियेटर, टीवी और फिल्मों छोड़ी छाप
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
पहाड़ के उस कलाकार ने अपने अभिनय की ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि उनके न होने पर भी दुनिया उनके हुनर की कायल है ओर उन्हें फादर ऑफ़ हिंदी थियेटर के नाम से जानती है। कला के प्रति दिवानगी के कारण सरकारी नौकरी छोडक़र अभिनय की ओर रुख करने वाले मनोहर सिंह ने थियेटर से लेकर फिल्म व टीवी सीरियलों में दमदार अभिनय कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के ड्रामा इंस्पेक्टर
शिमला जिले के क्वारा (जुनगा) से संबंध रखने वाले मनोहर सिंह थियेटर कला में निपुण थे। 12 अप्रैल 1942 को जन्मे मनोहर सिंह में शुरू से कुछ नया करने का जज्बा रहता था। सन 1962 में वे सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में ड्रामा इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए। फिर 1968 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली में नियुक्ति होने पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड दी।
हिमाचली थियेटर में महारत
1968 से 1983 के बीच मनोहर सिंह ने भारतीय थियेटर व हिमाचली थियेटर में विश्वभर में ख्याति प्राप्त की। उन्होंने देश सहित विदेशों में भी अपार प्रसिद्धि प्राप्त की। इसी दौरान उन्हें लंदन स्थित रॉयल अकादमी फॉर आर्ट्स से स्कालरशिप मिली।
हिंदी फिल्मों में अभिनय की छाप
मनोहर सिंह ने कई फिल्मों में अभिनय किया है जो कि उस समय काफी चर्चित रहीं। उन्होंने किस्सा कुर्सी का, डेडी, पार्टी, दामुल, रुदाली, मैं आजाद हूं तथा तिरंगा आदि फिल्मों में जो अभिनय किया वह वास्तव में ही सराहनीय था।
तुगलक से फादर ऑफ हिंदी थियेटर
दिल्ली स्थित पुराना किला में इब्राहिम अल्काजी के निर्देशन में तुगलक नामक नाटक में अभिनय करने के बाद इन्हें काफी प्रसिद्वि मिली और इन्हें फादर ऑफ हिंदी थियेटर की उपाधि दी गई। 1983 में हिमाचल सरकार ने उन्हें राज्य सम्मान से सम्मानित किया।
नॅशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के स्टूडेंट
मनोहर सिंह नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के छात्र रहे हैं और उस दौरान ही उन्होंने थियेटर में अपनी पहचान क़ायम कर ली थी। उनको मशहूर नाटक तुग़लक़ में अपनी भूमिका के लिए आज भी याद किया जाता है। उनके अन्य लोकप्रिय नाटक थे, मोहन राकेश का आधे-अधूरे और संध्या छाया, किंग लियर, मुद्रा राक्षस, ऑथेलो और मदर करेज।
सीरियलों में एक्टिंग की छाप
नब्बे के दशक में उनका छोटे पर्दे की ओर रुझान हुआ और उन्होंने मुल्ला नसरुद्दीन और राज से स्वराज में अपनी छाप छोड़ी। इन सीरियलों के निर्माता फ़ैसल अलकाज़ी के मुताबिक वह हर पक्ष में रुचि लेते थे। यहां तक कि परिंधानो में पूरा उत्साह रहता था।
फिल्मों में दिखाई प्रतिभा
कुछ टीवी सीरीयल जिनके लिए मनोहर सिंह को हमेशा याद किया जाएगा, वे हैं दर्द, गुमराह, पलछिन, राग दरबारी और महायज्ञ। फि़ल्मों में उनका प्रवेश काफ़ी देर में हुआ लेकिन उन्होंने कुछ अविस्मरणीय भूमिकाएं कीं। जैसे, किस्सा कुर्सी का, सुधीर मिश्र की यह वह मंज़िल नहीं, गोविंद निहलानी की पार्टी, प्रकाश झा की दामुल, रोमेश शर्मा की न्यू डेलही टाइम्स और विधु विनोद चोपड़ा की 1942 ए लव स्टोरी।
थियेटर, टेलीविजऩ और फि़ल्मों में सफल
मनोहर सिंह ऐसे गिने चुने कलाकारों में हैं जिन्होंने थियेटर, टेलीविजऩ और फि़ल्म, तीनों माध्यमों में अपनी एक अलग ही छाप छोड़ी। मनोहर सिंह का फेफड़ों के कैंसर से पीडि़त रहने के दिल्ली के अपोलो अस्पताल में 14 नवम्बर 2002 को निधन हो गया। वह 64 वर्ष के थे।
कामयाबी के सफर के अहम् पड़ाव
1968 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली में प्रवेश।
1968 से 1983 भारतीय थियेटर व हिमाचली थियेटर में ख्याति।
लंदन स्थित रॉयल अकादमी फॉर आर्ट्स से स्कालरशिप।
1982 में संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली द्वारा सम्मानित।
1983 में हिमाचल सरकार के राज्य सम्मान से सम्मानित।
नाटक जिनमें किया अभिनय
मोहन राकेश का आधे-अधूरे और संध्या छाया, किंग लियर, मुद्रा राक्षस, ऑथेलो और मदर करेज।
फ़िल्में जिनमें की एक्टिंग
किस्सा कुर्सी का, सुधीर मिश्र की यह वह मंज़िल नहीं, गोविंद निहलानी की पार्टी, प्रकाश झा की दामुल, रोमेश शर्मा की न्यू डेलही टाइम्स और विधु विनोद चोपड़ा की 1942 ए लव स्टोरी। , डेडी, पार्टी, दामुल, रुदाली, मैं आजाद हूं तथा तिरंगा
सीरियलों में काम किया
दर्द, गुमराह, पल-छिन, राग दरबारी और महायज्ञ। मुल्ला नसरुद्दीन और राज से स्वराज

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