फर्श से अर्श तक का सफर – कभी था दिहाड़ीदार मजदूर, आज कॉन्ट्रेक्टर मशहूर, तेनजिन ने मेहनत के दम पर रचा कामयाबी का इतिहास, आम आदमी से बन गए खास

Spread the love

फर्श से अर्श तक का सफर – कभी था दिहाड़ीदार मजदूर, आज कॉन्ट्रेक्टर मशहूर, तेनजिन ने मेहनत के दम पर रचा कामयाबी का इतिहास, आम आदमी से बन गए खास
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
उसने मुकद्दर को नहीं कोसा। हालात के थपेड़ों ने उसे तोडऩे में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, बावजूद इसके उसके हौसलों की उड़ान न मंद हुई और न ही मुफलिसी उसकी राह का रोड़ा बनी। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उसने कामयाबी का सुनहरा इतिहास रच कर साबित कर दिया किकुछ करने की ललक हो तो कुछ भी संभव है। तबीयत से एक पत्थर उछाल कर आसमान में छेद करने की इस प्रेरक कथा का नायक है शिमला का तेनजिन। आज वह करोड़ों का सलाना कारोबार करने वाली कंस्ट्रक्शन कंपनी और एक होटल के मालिक हैं। फर्श से अर्श तक पहुंचने की ललक के बावजूद तेनजिन के अंदर का इनसान जिंदा है। यही कारण है कि परोपकार के लिए उसने शिमला में तेनजिन अस्पताल की स्थापना की है।
पहाड़ पर सडक़ बनाते थे मां-बाप
हिमाचल प्रदेश में रहने वाले एक शरणार्थी तिब्बती परिवार में पैदा हुए तेनजिन के माता-पिता दोनों दिहाड़ीदार मजदूर थे। परिवार के पालन-पोषण के लिए वे सडक़ निर्माण में काम करते थे। उनके पास रहने को मकान तक नहीं था। सारा परिवार टेंट में रहता था। मजदूरी के कई जगह आना-जाना होता था। जहां काम होता, वहीं टेंट लगा दिया जाता। टेंट में न बिजली होती और न ही पीने का पानी। मूसलाधार बारिश हो या बर्फबारी परिवार को टेंट में ही अपना गुजर बसर करना पड़ता। प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में सडक़े बिछाना भी काफी जोखिम भरा काम था। पहाड़ों के बीच रास्ता बनाकर सडक़ें बिछाने के दौरान अकसर मजदूर हादसों का शिकार हो जाते थे।
हिमाचल से बिहार, फिर हिमाचल
इस शरणार्थी परिवार को उस समय राहत मिली जब भारत सरकार ने तिब्बतियों के लिए शरणार्थी शिविर बनाने शुरू किए। तेनजिन के परिवार को मध्यप्रदेश के सरगुजा में जगह मिली। यहां दूसरे तिब्बतियों की तरह तेनजिन के माता-पिता को खेती-बाड़ी करने के लिए जमीन दी गई। सरगुजा में ही तेनजिन स्कूल जाने लगे। वे अपने बड़े भाई और दो छोटी बहनों के साथ स्कूल जाते थे। तिब्बत और हिमाचल के ठंडे मौसम में रहने के आदी तेनजिन के माता-पिता को सरगुजा की गर्मी रास नहीं आई। भीषण गर्मी से तंग आकर यह परिवार वापस हिमाचल आ गया और शिमला में बस गया।
नगर निगम शिमला में सुपरवाइजर
शिमला में एक बार फिर से तेनजिन के माता-पिता ने मजदूरी का काम शुरू किया। तेनजिन अब बड़े हो चुके थे। उन्होंने भी अपने माता-पिता के साथ काम पर जाना शुरू कर दिया। तेनजिन की उम्र उस समय 16 साल थी। उसने भी मज़दूरी करना शुरू कर दिया। तेनजिन अपने माता-पिता की तरह दिनभर मेहनत करते थे। कई सालों की मजदूरी के बाद तेनजिन को उनकी ईमानदारी और मेहनत की वजह से शिमला नगर निगम से सुपरवाइजर का काम मिल गया। बतौर ‘सुपरवाइजर’ उनकी जिम्मेदारी मजदूरों के कामकाज की निगरानी करना, हाजिरी लेना, मजदूरों को काम सौंपना, कामकाज का निरीक्षण करना तेनजिन की ड्यूटी का हिस्सा थे।
सुपरवाइजर बन गया पेटी ठेकेदार
सुपरवाइजर की ड्यूटी करते हुए तेनजिन ने ठेकेदारों के कामकाज का अध्ययन करना शुरू किया। उन्हें अहसास हो गया कि वे भी ठेकेदार बन सकते हैं। उन्होंने ठेकेदार बनने का फैसला कर लिया। उन्हें पहला ठेका सडक़ की ‘ड्रेसिंग’ करने का 600 रुपए का मिला। इस काम को करने के बाद तेनजिन का भरोसा और भी बढ़ गया। उन्होंने ठेकेदारी पर ध्यान देना शुरू किया। ठेकेदारी के लिए रजिस्ट्रेशन न होने के कारण वे पेटी ठेकेदार बन गए, लेकिन ठेकेदारों से सही समय पर पैसे न मिलने से तेनजिन को परेशानियां होने लगी।
‘डी’ क्लास से ‘ए’ क्लास का सफर
ठेकेदारों के रवैये से तंग आकर तेनजिन ने बतौर ठेकेदार अपना पंजीकरण करवा लिया। ठेकेदार बन जाने के बाद तेनजिन ने रात दुगुनी, दिन चौगुनी तरक्की की। ईमानदारी और काम में गुणवत्ता और निर्धारित समय पर काम करने के लिए तेनजिन प्रदेश के सभी सरकारी विभागों में वे मशहूर होते गए। ‘डी’ श्रेणी में से शुरू हुआ उनका कद सी श्रेणी और ‘बी’ श्रेणी से होते हुए कुछ ही सालों में ही तेनजिन ‘ए’ श्रेणी के ठेकेदार भी बन गए। अब वह करोड़ों के ठेके लेने के काबिल हो गए।
खास होकर भी आम आदमी
तेनजिन के परिवार में उनकी पत्नी दो बेटे और दो बेटियां हैं। वे कहते हैं कि उनके साथ काम करने वाला हर मज़दूर, डॉक्टर, हर कर्मचारी उनके परिवार का हिस्सा है। कामयाबी की बेहद शानदार कहानी के नायक होने के बावजूद उन्हें घमंड छू तक नहीं पाया है। वे सादगी और विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने हुए हैं। वे कहते हैं, मैं कोई बड़ा आदमी नहीं हूं। मैं छोटा आदमी हूं। ईमानदारी से काम करता हूं। लोगों की सेवा करता रहूं यही मैं चाहता हूं।
कंस्ट्रक्शन कंपनी की शुरुआत
तेनजिन ने अब अपनी खुद की तेनजिन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी खोल ली। वे अपनी कंपनी के जरिये हिमाचल में बिजली, भवन निर्माण, लोक-निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ व चिकित्सा जैसे अलग-अलग विभागों के लिए काम करने लगे। सरकारी ठेके लेने के साथ तेनजिन ने कई सारी परियोजनाओं का काम किया। उनकी कंपनी ने कई सारे होटल, अस्पताल, शिक्षा संस्थान बनाए। निर्माण-उद्योग में तेनजिन की कंपनी ने खूब धन-दौलत और शोहरत कमाई है। उनकी कंपनी हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी और मशहूर कंस्ट्रक्शन कंपनियों में एक है। कंस्ट्रक्शन कामों के जरिए अब तेनजिन सालाना करोड़ों का कारोबार कर रहे हैं।
कंस्ट्रक्शन के मुनाफे से अस्पताल
रक्तदान शिविर लगाने वाले एक समाजसेवी ने तेनजिन को खुद का अस्पताल शुरू करने का सुझाव दिया था। सुझाव अच्छा लगा तो उन्होंने अपने एक डॉक्टर मित्र से सलाह-मशवरा किया। मित्र की बात को मानते हुए तेनजिन ने अस्पताल बनवाने का काम शुरू कर दिया। तेनजिन इस बात का खास ख्याल रखते हैं कि अस्पताल में मरीजों की हर मायने में सही देखभाल की जाए। किसी भी सेवा के लिए वाजिब शुल्क ही लिया जाए। मरीजों के परिवारवालों से भी मिलकर वे उनकी भी तकलीफें जानते हैं। गरीब लोगों को मुफ्त में इलाज करने के निर्देश भी तेनजिन ने अस्पताल वालों को दे रखे हैं। तेनजिन कहते हैं, मैंने समाजसेवा के मकसद से अस्पताल खोला है। कंस्ट्रक्शन के काम से जो मुनाफा होता है उसका एक बड़ा हिस्सा मैं अस्पताल में लगा देता हूं।
शिमला में अस्पताल, दिल्ली में होटल
कंस्ट्रक्शन के काम में अपना लोहा मनवाने वाले तेनजिन ने जिस भी काम में हाथ डाला, उसी में अपनी विशेष पहचान बनाई है। शिमला में अस्पताल के अलावा तेनजिन ने दिल्ली में एक होटल भी खोला है। उन्होंने शिमला में अपनी एक इंडस्ट्री भी शुरू की है, जिसमें लोहे और लकड़ी का काम होता है। इस कारखाने में मशीनों की मरम्मत का काम भी किया जाता है। मूल रूप से ये कारखाना कंस्ट्रक्शन से जुड़े कामों में मदद के लिए बनाया गया है।
छिपा कर नहीं करते कोई कारोबार
कारोबारी के तौर तेनजिन ने पारदर्शिता की वजह से एक अलग पहचान बनाई हैं। वे दूसरे कई कारोबारियों के उल्ट अपने साथियों को ये बता देते हैं कि उन्हें किस काम से कितनी कमाई हो रही है। वे छुपाकर कारोबार करने में विश्वास नहीं रखते। तेनजिन की एक और बड़ी ख़ूबी ये भी है कि वे दिन में 14 से 16 घंटे काम करते हैं। काम चाहे कंस्ट्रक्शन का हो या अस्पताल का, तेनजिन सभी जगह जरूरत के हिसाब से समय देते हैं। वे कहते हैं, मुझे काम करने में मजा आता है। मैंने कभी थकावट महसूस नहीं की। मैं लोगों से भी यही कहता हूं भगवान ने जो तुम्हें काम दिया है उसे अच्छे से करो। ये मत सोचो कि दूसरे को क्या काम मिला है। जो तुम्हारा काम है उसे एन्जॉय करो।
मेहनत के दम पर हासिल किया मुकाम
कारोबार की दुनिया में खूब धन-दौलत और शोहरत कमाने के साथ-साथ अपनी बेहद खास पहचान बनाने वाले तेनजिन का मजदूरों से प्यार कोई रहस्य नहीं। तेनजिन को करीब से जानने वाला हर कोई शख्स मजदूरों के प्रति उनकी अनुरक्ति और आसक्ति को महसूस कर सकता है। मजदूरों के प्रति उनके अनुराग का कारण भी कोई ढकी-छिपी बात नहीं है। वे एक समय मजदूर थे, वो भी दिहाड़ी मजदूर। 16 साल की उम्र से उन्होंने मजदूरी करनी शुरू की थी। सडक़े बिछाने का काम उन्होंने कई दिनों तक किया था। तेनजिन ने मेहनत, संघर्ष और ईमानदारी के दम पर कारोबार किया और बड़े कारोबारी बने। उन्होंने कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में खूब नाम कमाया।
रोटी का संघर्ष
तेनजिन का परिवार जब हिमाचल प्रदेश में मजदूरी का काम किया करता था तब सर्दी के मौसम में सारा परिवार दिल्ली चला जाता था। हिमाचल में सर्दी के दौरान कड़ाकेकी ठंड होती थी और कई दिनों तक आसमान से बर्फ भी गिरती थी। सर्दी में अकसर कंस्ट्रक्शन का काम बंद हो जाता था और रोजी-रोटी की तलाश में परिवार दिल्ली का रुख करता था। दिल्ली में तेनजिन के माता-पिता और भाई-बहन एक कारोबारी से हर सुबह कपड़े खरीदकर लोगों में बचते थे, इससे घर-परिवार चलता था। कई सालों तक तेनजिन के परिवार को रोजी-रोटी के लिए शिमला और दिल्ली के बीच आना-जाना रहा।
पसीज जाता है अंदर का मजदूर
तेनजिन जब किसी मजदूर को सडक़ बिछाने का काम करता हुआ देखते हैं तो वे उसके पास जाकर उसका हालचाल जानना नहीं भूलते। अगर उन्हें पता चलता है कि किसी मजदूर को कोई तकलीफ है तो वे उसे दूर करने में अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं भी छोड़ते। बिछाने वाले मजदूरों और निर्माण कर्मियों से तेनजिन को काफी लगाव है। वे इन मजदूरों को अपने दिल के काफी करीब पाते हैं और उनकी परेशानियों को दूर करना अपना फर्ज समझते हैं। तेनजिन जब कभी किसी भी मजदूर को मिट्टी, पत्थर ढोता हुआ देखते हैं तो वे बीते वक्त की यादों में खो
जाते हैं।
उम्मीद से बढक़र मिली मुराद
तेनजिन की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वे खतरों से नहीं घबराते हैं। जहां कहीं कोई खतरे वाला काम होता है वे सबसे आगे होते हैं। तेनजिन खुद साइट पर जाकर मजदूरों की मदद करते हैं। भगवान और दलाई लामा पर अटूट आस्था और विश्वास रखने वाले तेनजिन कहते हैं, मुझे डर नहीं लगता है। मुझे ऊपर वाले पर विश्वास है। जब तक उनका आशीर्वाद है मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। वे कहते है, मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं यहां तक पहुंचूंगा। मैं बस मेहनत करता गया। मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हंू हिमाचल प्रदेश की सरकार का और यहां की जनता का, जिन्होंने मुझ पर भरोसा किया और मुझे काम दिया। मैं आज जो भी हूं इन्हीं लोगों की वजह से हूं।
सादगी से भरा जीवन दर्शन
कामयाबी के इस सफर में तेनजिन सादगी से लबरेज हैं और व्यवहार और सद्व्यवहार उनके आभूषण हैं। वे आज भी जमीन से जुड़े हुए हैं। समाजसेवा उनकी आदत हैं। वे जरूरतमंदों के लिए फिक्रमंद रहते हैं। अपने से जितना कुछ हो सकता हैं, वे लोगों की मदद करते हैं। एक कारोबारी के साथ परोपकारी इनसान के तौर पर भी उनकी पहचान है। समाजसेवा के मकसद से ही उन्होंने शिमला में एक बड़ा अस्पताल बनाया है। 50 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में वाजिब शुल्क पर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *