पढ़िए हवा में उडऩे वाले तिब्बती और कशिमाई गुटके का कनेक्शन, त्रिवेणी संगम रिवालसर में बौद्व संदर्भों की तलाश की कोशिश

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पढ़िए हवा में उडऩे वाले तिब्बती और कशिमाई गुटके का कनेक्शन, त्रिवेणी संगम रिवालसर में बौद्व संदर्भों की तलाश की कोशिश
मंडी से समीर कशयप की रिपोर्ट
छोटी-छोटी पहाडियों में अवस्थित मंडी रियासत का इतिहास करीब 1100 एडी के बाद की सेन वंशावली के कारण लगभग ज्ञात है, लेकिन यहां के प्राचीन इतिहास के बारे में अभी भी ज्यादा जानकारी प्रकाश में नहीं आई है। हालांकि कुल्लुत, त्रिगर्त (कांगडा) और चंबा के इतिहास के बारे में इससे पहले की जानकारियां उपलब्ध हैं। यह कैसे हो सकता है कि ब्यास नदी घाटी की कोई सभ्यता नहीं रही हो, जबकि सभ्यताएं नदियों के किनारे ही बसी हों।
बौध ग्रंथों में आज का मंडी है तब का जोहार या सोहार
मंडी में सेन वंश के आने से पहले यहां पर स्थानीय प्रमुखों (राणाओं) का जिक्र मिलता है, जिन पर अधिपत्य जमा कर उनकी जमीनों पर मंडी रियासत की बुनियाद रखी गई। मंडी के इतिहास के प्राचीन समय को जानने के लिए बौध जानकारियां कारगर हो सकती हैं। बौध ग्रंथों में मंडी का जिक्र जोहार या सोहार नाम से आता है। बौध जानकारियों के मुताबिक जोहार नाम का राज्य मंडी और रिवालसर क्षेत्र में था। जहां पर गुरू पदम संभव ने तपस्या की थी। स्थानीय लडक़ी मंदरवा उनकी शिष्या बनी। लडक़ी के परिजनों को उसका सानिध्य रास न आने के कारण दोनों को कष्ट पहुंचाने की कोशिश की।
हवा में उडऩे वाले तिब्बती और कशिमाई गुटके के प्रसंग का कनेक्शन
मनमोहन (आईसीएस) लिखित मंडी के इतिहास में राजा सिद्धसेन के समय की एक घटना का जिक्र है। घटना के मुताबिक एक तिब्बती उड़ता हुआ आता था और राजा के महल के साथ वाली पहाडी पर रूकता था। जब विश्राम करते उसकी आंख लग गई तो राजा ने उसके उस गुटके (किताब) को कब्जे में ले लिया, जिसकी मदद से वह उडता था। आंख खुलने पर उनसे राजा से गुटका लौटाने का अनुरोध किया कि वह हरिद्वार से गंगाजल लेकर तिब्बत जाता है। दयालु राजा ने तिब्बती को गुटका लौटा दिया। जब वह तिब्बत पहुंचा तो राजा तारानाथ देरी का कारण पूछा। सुन कर राजा दंग रह गया कि करिशमाई गुटके को प्राप्त करने के बाद भी कोई लौटा दिया। सिद्धसेन दयालुता से प्रसन्न गुटका उन्हें भेंट कर दिया। सिद्वसेन से राज्य विस्तार से बजाये अघ्यात्मिकता को शांत किया।
नागार्जुन चट्टान : बौध धर्म की संकेतक और सूचक
मंडी शहर के टारना मुहल्ला में नागार्जुन चट्टान भी स्थित है। नागार्जुन बौध धर्म के प्रसिद्ध गुरू रहे हैं। हालांकि वह दक्षिणी भारत से संबंध रखते थे, लेकिन इतिहास इस बारे में सपष्ट है कि बौध दर्शन के विद्वान तथा दार्शनिक उत्तरी भारत, पंजाब और पेशावर तक फैले थे और उनका उत्तरी भारत में काफी प्रभाव रहा है। हो सकता है कि बौध दार्शनिक नागार्जुन, नागसेन, असंग आदि अनेकों बौद्ध विद्वानों से यह क्षेत्र परिचित रहा हो। ऐसे में मंडी में नागार्जुन चट्टान का होना यहां पर बौध धर्म की उपस्थिति का संकेतक और सूचक तो लगता ही है।
खुआराणी मंदिर : मंडी नगरी में बौधों की आस्था का केंद्र
मंदरवा के प्रसंग में एक याद और कहानी मंडी के खुआराणी मंदिर से भी जुडी है। बताते हैं कि यहीं राजा ने पर मंदरवा और गुरू पदम संभव को कुंए में फैंक दिया गया था और कुंए को आग के हवाले कर दिया था। बावजूद इसके वे सुरक्षित रहे। इसलिए इस जगह को खुआराणी कहा जाता है। इस मंदिर के प्रति बौद्व धर्म के अनुयायियों की गहरी आस्था है और इस स्थल पर बौद्ध श्रद्धालु दर्शन करने के लिए जरूर आते हैं। इसके अलावा विक्टोरिया पुल के नजदीक पुरानी मंडी में व्यास नदी किनारे की एक गुफा को लेकर भी बौद्व धर्म के अनुयायियों में खास आकर्षण है। देश- विदेश से मंडी आने वाले बौद्व अनुयायी इस गुफा के दर्शन करना भी नहीं भूलते हैं।
तिब्बत के राजा तारानाथ के नाम पर पड़ा टारना का नाम!
टारना की पहाडी में माता श्यामाकाली का मंदिर है, जिसे श्याम सेन के समय में बनाया गया था। लोगों का कहना है कि मंदिर में तारा माता है, इसलिए इसे टारना या तारना भी कहा जाता है। बौध काली को ही तारा मानते हैं। हिंदू धर्म में भी तारा माता की पूजा काली के रूप में ही होती है। टारना बौधों की आस्था का केंद्र है। एक और संकेत यह भी मिलता है कि टारना पहाडी का नाम मंडी के राजा सिद्ध सेन से मधुर संबंध होने के कारण तिब्बत के राजा तारानाथ के नाम पर पडा हो जो बाद में टारना बन गया हो।
तिब्बत में संकट के दौरान जोहार भेजे गए धार्मिक ग्रंथ
ऐतिहासिक स्त्रोत बताते हैं कि तिब्बत में संकट आने पर गुरू पदम संभव को वहां बुलाया गया और उन्होंने उस संकट को दूर किया था। यह भी पता चलता है कि तिब्बत में संकट के दौरान वहां के धर्मग्रंथों व साहित्य को सुरक्षित रखने के लिए जोहार भेज दिया गया। बौध धर्म के अनुयायियों को विश्वास है कि यह धार्मिक शिक्षाएं जोहार में कहीं रखी गई हैं।
सांस्कृत्यायन के प्रयासों को निकर्ष पर पहुंचाएं कौन
शोध की कमी के चलते मंडी के प्राचीन इतिहास की कडियां नहीं जोडी जा सकी हैं। अधिकतम बौद्ध संदर्भ तिब्बती भाषा में होने के कारण इनसे सूत्रों को जोडने में सफलता नहीं मिल पाई है। हालांकि प्रसिद्ध इतिहासकार, लेखक व अध्येता राहुल सांस्कृत्यायन ने इस दिशा में भागीरथी प्रयास किए थे, लेकिन उनके प्रयासों को निष्कर्षों तक पहुंचाने का अहम कार्य इतिहासकार शायद अभी तक नहीं कर पाए हैं।

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