प्रेरक – मिलिए हिमाचल प्रदेश के इकलौते अधिवक्ता से जो 22 सालों से हिंदी में कर रहे प्रेक्टिस, हाईकोर्ट में हिंदी को मान्यता के लिए संघर्ष, नरेन्द्र शर्मा अदालत में लगा ले हिंदी के माथे पर बिंदी, देश की अदालतों में अभी तक है राष्ट्रीय भाषा से पक्षपात

Spread the love

प्रेरक – मिलिए हिमाचल प्रदेश के इकलौते अधिवक्ता से जो 22 सालों से हिंदी में कर रहे प्रेक्टिस, हाईकोर्ट में हिंदी को मान्यता के लिए संघर्ष, नरेन्द्र शर्मा अदालत में लगा ले हिंदी के माथे पर बिंदी, देश की अदालतों में अभी तक है राष्ट्रीय भाषा से पक्षपात
सुन्दरनगर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
आइए आपका परिचय करवाते हैं हिमाचल प्रदेश के उस इकलौते अधिवक्ता से जो पिछले 19 सालों से अदालतों में अपने मामलों की पैरवी हिंदी में करते आ रहे हैं। यहां तक कि वह दावों, प्रतिदावों और याचिकाओं को भी हिंदी में ही बनाते हैं । जिला एवं सत्र न्यायलय मंडी में कार्यरत अधिवक्ता नरेन्द्र शर्मा हिमाचल प्रदेश के पहले वकील हैं, जो न्यायलय का सारा कामकाज हिंदी भाषा में करते हैं। यह अपनी मातृभाषा के प्रति उनका जज्बा ही है कि वह अनेकों परेशानियों से गुजरने के बाद भी अपनी वकालत का तमाम कार्य हिंदी भाषा में ही करते आ रहे हैं। न्यायलयों में हालांकि सारा कार्य अंग्रेजी भाषा में ही होता है, लेकिन नरेन्द्र शर्मा के हिंदी में लिखे गए दावों, प्रतिदावों और याचिकाओं को भी अदालतों में मान्य किया जाता है।
सब जज दुर्गा सिंह खेनल से मिली प्रेरणा
सुन्दरनगर निवासी नरेन्द्र शर्मा का कहना है कि देवनागरी (हिंदी) में विधि व्यवसाय उन्होने वकालत की पढाई के बाद वर्ष 1999 में सुंदरनगर न्यायलय के सब जज दुर्गा सिंह खेनल के कार्यकाल में उनकी प्रेरणा से शुरू किया था। वे बताते हैं कि जब जज साहब की बदली हुई थी तो उन्होने कहा था कि हिंदी हमारी मातृभाषा के साथ-साथ संविधान के अनुसार राष्ट्रिय भाषा भी है, इसलिए हिंदी में विधि व्यवसाय जारी रखना।
विरोध के बावजूद नहीं डगमगाये
नरेन्द्र शर्मा के मुताबिक हिंदी में वकालत करने पर उन्हे कई कठिनाइयां आई और हिंदी के विरोध में कई स्वर भी उठे, लेकिन उन्होने इनका सामना करते हुए हिंदी में वकालत का कार्य जारी रखा। वह जिला स्तर तक के कोर्ट का पूरा कार्य वाद, प्रतिवाद, पुनरावेदन, पुर्ननिरिक्षण आदी का कार्य हिंदी में ही करते हैं।
हिमाचल हाई कोर्ट में नहीं हिंदी को मान्यता
नरेन्द्र शर्मा ने बताया कि भारतीय संविधान की धारा 343 के तहत देवनागरी (हिंदी) को राष्ट्रिय भाषा का दर्जा दिया गया है। पठित राजभाषा अधिनियम 1963 की धार 7 के तहत हिंदी भाषी राज्यों उतर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि के उच्च न्यायलयों में हिंदी को मान्य कर लागू कर दिया गया है, लेकिन हिंदी भाषा राज्य हिमाचल प्रदेश ने अभी तक उच्च न्यायलय में मान्यता नहीं मिल सकी है। प्रदेश के उच्च न्यायलय में भी हिंदी को मान्यता दी जानी चाहिए।
अंग्रेज भी थे हिंदी के पक्षधर
नरेन्द्र बताते हैं कि अंग्रेजी शासन में पंजाब सरकार ने 18 जनवरी 1906 की अधिसूचना संखया 316 जारी की थी, जिसके तहत हिन्दी भाषी क्षेत्र के जिला न्यायलयों की भाषा के रूप में हिंदी को मान्यता दी थी। जिसकी झलक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 345 में देखी जा सकती है। साल 1976 में सीपीसी में जिला न्यायलय के कार्य की भाषा के रूप में हिंदी को मान्यता दी गई है। प्रदेश उच्च न्यायलय के न्यायमुर्ति एम आर वर्मा ने साल 2000 में एक अपील के फैसले में जिला न्यायलय की भाषा हिन्दी घोषित की है।
हिमाचल सरकार भी करे पहल
नरेन्द्र शर्मा के अनुसार पंजाब भू राजस्व नियम 44 के तहत एसडीएम, तहसीलदार को हिन्दी में निर्णय करने के निर्देश हैं। भारतीय संविधान व राजभाषा अधिनियम की धारा 7 के तहत हिन्दी भाषी क्षेत्र के राज्य उतर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान सरकारों ने उच्च न्यायलय में हिन्दी भाषा को राष्ट्रपति की मंजूरी से मान्यता दिलवाई है। लेकिन हिन्दी भाषी राज्य होने के बावजूद हिमाचल प्रदेश की सरकार ने प्रदेश उच्च न्यायलय में हिन्दी की मान्यता को लेकर आज तक कोई पहल नहीं की है।
हिंदी के संघर्ष के लिए ‘हिमाचली एक्सीलेंसी’ अवार्ड
हिंदी में वकालत करने वाले नरेन्द्र शर्मा को ‘हिमाचली एक्सीलेंसी’ अवार्ड से भी सममानित किया चुका है। उनका कहना है कि भारतीय संविधान की धारा 348 के तहत उच्चतम न्यायलय और सभी उच्च न्यायलयों में हिंदी को मान्यता दी जानी चाहिए, जिससे हिंदी भाषा सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय भाषा का प्रतीक बन सके और संविधान निर्माताओं का हिंदी को राजभाषा बनाने का सपना साकार हो सके।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *