प्राचीन थैला: कभी पहाड़ की संस्कृति मेें बड़े काम आता था, अब घुम्मंतू गद्दियों या गुज्जरों के पास ही रह गया ‘खालड़ू’

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प्राचीन थैला: कभी पहाड़ की संस्कृति मेें बड़े काम आता था, अब घुम्मंतू गद्दियों या गुज्जरों के पास ही रह गया ‘खालड़ू’
सुंदरनगर से पवन चौहान की रिपोर्ट
आवश्यकता अविष्कार की जननी है। यह बात पूरी तरह से सत्य है। काफी समय पहले जब सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का कोई साधन न था तो इसके लिए आदमी ने एक साधन का अविष्कार किया, जिसे नाम दिया गया ‘खालड़ू’। ‘खालड़ू’ अर्थात खाल से निर्मित। यह वह साधन है, जिसमें चीजों को डालकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है। यह खाल भेड़/ भेड़ू/ बकरा/ बकरी किसी की भी हो सकती है। जिस समय बोरियां नहीं थी तब खालड़ू बोरी का कार्य करता था। इसे कई तरह से इस्तेमाल में लाया जाता था। इसमें पीने का पानी भरकर लाया जाता था। यह लोहार के लिए धौंकनी का कार्य करता है। इससे लस्सी भी लगाई जाती थी। घी के संग्रहण के लिए यह कार्य करता था। पुआल जब अपनी भेड़-बकरियों संग पहाड़ की ऊंचाई नापते हैं तो वे इसमें अपनी जरुरत का हर सामान डालकर ले जाते हैं। प्लेन इलाकों में इसका मुख्य कार्य अनाज को घराट तक ले जाना और उसमें आटा डालकर लाने का होता था।
दिनचर्या का एक मुख्य हिस्सा था खालड़ू
खालड़ू पहले हमारी दिनचर्या का एक मुख्य हिस्सा था, लेकिन आज इसका इस्तेमाल पहाड़ी इलाकों में पुआल, गद्दी या गुज्जरों के पास ही रह गया है जो पहाड़ों की चोटियों पर उनकी जरुरत की हर वस्तु को ले जाने में उनका साथी बनता है। मैदानी इलाकों में लोगों ने इसे बहुत पहले से तिलांजलि दे दी है। इसका स्थान अब बोरी या अन्य कंटेनरों ने ले लिया है। चाहे कुछ भी हो खालड़ू हमें बुजुर्गों से उनके खालड़ू के साथ बिताए दिन और इससे जुड़ी उनकी कई बातों को ताजा कर देता है तथा हमें उस वक्त के कठिन जीवन की कई झलकियां प्रस्तुत करता है।
चमड़ा न रहकर मोटा कपड़ा बन जाता खालड़ू
खालड़ू घर के किसी भी कार्य को निपटाने में अहम भूमिका अदा करता था। इसको पहाड़ी क्षेत्रों के अलावा मैदानी इलाकों में हर घर में प्रयोग में लाया जाता था। बोरी आदि की सुविधा पहुंचने के साथ ही इसका प्रयोग भी धीरे-धीरे समाप्त हो गया। खालड़ू के बिषय में एक बात सामने आती है कि जो लोग शाकाहारी हैं वे इसमें रखी चीज को कैसे खाते होंगे? बुजुर्ग तर्क देते हैं कि परिस्थिति के अनुसार सबको ढलना ही पड़ता है। उस वक्त की स्थितियां ही ऐसी थी कि हमारे पास इसका कोई विकल्प न था। दूसरी बात यह कि खालड़ू जिस प्रक्रिया से गुजरता है, वह उसे एक चमड़ा न रहकर एक मोटे कपड़े का रुप दे देता है।
दो विधियों से तैयार होता खालड़ू
खालड़ू को तैयार करने की खास विधि होती है। बकरे या भेड़ू को काटने के बाद उसे किसी छोटे पेड़ या अन्य किसी साधन के द्वारा (जहां से लटकाने पर वह जमीन को न छूए) लटका दिया जाता है। उसके बाद उसके चारों पैरों की चमड़ी काट ली जाती है और फिर जैसे हम कपड़े उतारते हैं वैसे उसकी पूरी चमड़ी उतार ली जाती है। इसके बाद खालड़ू बनाने का कार्य शुरु होता है। इसको मुख्यत: दो विधियों से तैयार किया जाता है। जिसमें एक साधारण विधि और दूसरी रंगाई विधि है।
नमक मिला कर रगड़ाई
पहली विधि में खाल पर छडक़ (धान के छिलके का बारिक हिस्सा) के साथ नमक मिलाकर उसे खाल पर (दोनों तरफ) अच्छी तरह से रगड़ा जाता है। यह इस तरह से लगाया जाता है ताकि यह खाल पर हर जगह पहुंच जाए। इसके साथ फटकरी व हींग का भी प्रयोग किया जाता है ताकि गंध न रहे। इस सब के बाद खाल को फोल्ड करके तीन-चार दिन गामने (नमी प्रदान करना) के लिए रख दिया जाता है। चार दिन के बाद बालों को खींच कर निकाला जाता है तथा उसकी खूब मंडाई (गंूथना) की जाती है। पूरी ऊन निकालने के उपरांत उस पर कड़वा तेल लगाया जाता है और फिर से उसे गामने के लिए रख दिया जाता है। गामने की इस प्रकिया के दौरान उसकी साथ ही साथ हाथ और पैर से मंडाई भी की जाती रहती है, ताकि तेल पूरी तरह से उसमें समा जाए और उसे नरम बना दे। इसके बाद उसे अच्छी तरह से धो लिया जाता है। फटकरी, कच्ची हल्दी, तराम्बल के दूध का प्रयोग किया जाता है ताकि उसमें गंध न रहे। यह पूरी प्रकिया हफ्ता-दस दिन में पूरी हो जाती है। इसके बाद उसकी टांगों आदि की खुली जगह को सिल दिया जाता है और गर्दन वाला हिस्से को सामान डालने के लिए खुला रख दिया जाता है।
चूने के पानी में खाल को डालना
दूसरी रंगाई विधि है। इस प्रकिया में खाल को चूने के पानी में डाल दिया जाता है। इसे तब तक इस पानी में डाल कर रखा जाता है जब तक खाल फूल न जाए। इस तरीके से उसके बाल आसानी से निकल जाते हैं। इसके बाद अलग बतज़्न में बारीक पीसे हुए आंवले के पत्तों को पानी में मिलाया जाता है और इस खाल को इसमें डाला जाता है। फिर रोजाना इस खाल को बाटना (निचोडऩा) पड़ता है। बाटने के बाद इसे खींचा जाता है ताकि इसमें कोई सिलवट न रहे। यह प्रकिया लगभग चार-पांच दिन चलती है। इसमें खाल साफ अर्थात सफेद रंग की हो जाती है। इसके बाद इसको एक तरफ से सिल लिया जाता है। फिर सामा या बान के छिलके के पानी को इस खाल में आधा भर कर लटका दिया जाता है। जो पानी उस खाल से टपकता रहता है उसे फिर दोबारा उसी खाल में अब दूसरी तरफ से खाल को खोलकर डाल दिया जाता है। यह प्रक्रिया दो दिन में पूरी हो जाती है। बजुर्गों के अनुसार इस विधि से बना खालड़ू सबसे मजबूत और टिकाऊ होता था और यह कई बर्षों तक चलता था। इस तरह से चमड़ी की गंध पूरी तरह से समाप्त हो जाती थी। दो दिन के बाद पानी निकालने के उपरांत फिर इस खाल को नरम करने के लिए तेल मल दिया जाता है और इसकी खूब मंडाई की जाती है। खाल को धोने के उपरांत फिर इस खाल को अच्छी प्रकार से सील कर उसे खालड़ू का रुप दे दिया जाता है। इस प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग दो सप्ताह का समय लग जाता है।
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– पवन चैहान
गांव व डाकघर महादेव,
तहसील- सुन्दरनगर, जिला-मंडी (हि0 प्र0)-175018
फोन : 098054 02242, 094185 82242

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