पृथ्वीराज राज चौहान की कुलदेवी, साक्षात प्रकट होती कोटेवाली माता

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पृथ्वीराज राज चौहान की कुलदेवी, साक्षात प्रकट होती कोटेवाली माता

नूरपुर से नंद किशोर परिमल की रिपोर्ट

 

नूरपुर उपमंडल के अंतर्गत राजा का तालाब के पूर्व में शिवालिक पहाडिय़ों के एक शिखर पर कोटे वाली माता नामक शक्तिपीठ का मंदिर स्थित है। राजा का तालाब कस्बे में मां कोटे वाली का भव्य गेट बना हुआ है। मात्र चार किलोमीटर की दूरी तय करके गुरियाल गांव में पहाड़ी के शिखर पर माता कोटे वाली का भव्य मंदिर जंगल के बीचों बीच स्थित है। अति रमणीक पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर धार्मिक श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए रहस्य का केंद्र बना हुआ है। इस स्थान की विशेषता यह है कि रात को यहां कोई भी व्यक्ति नहीं ठहर सकता। किंवदंती अनुसार, अष्टभुजा माता रात को साक्षात प्रकट होकर यहां विभिन्न लीलाएं करती हैं। यदि गलती से रात को यहां कोई रह भी जाए तो सुबह वह जीवित नहीं मिलता।

 

पृथ्वीराज राज चौहान की कुलदेवी 

 

इस मंदिर के बारे मे किंवदंती है कि 12वीं शताब्दी में दिल्लीके शासक आनंद पाल तोमर ने दिल्ली का सिहांसन अपने दोहते पृथ्वीराज चौहान को सौंपा तो आनंद पाल तोमर के संबंधियों ने दिल्ली में विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। इस विद्रोह का लाभ उठाते हुए राजस्थान में कोटा और बूंदी में पृथ्वीराज चौहान के संबंधियों ने भी विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। चारों तरफ विद्रोह से घिरे पृथ्वी राज चौहान ने हिम्मत नहीं हारी और विद्रोह को बुरी तरह से कुचल दिया। विद्रोही जान बचाकर उत्तर की तरफ सुरक्षित पहाड़ों को भागे। कोटा और बूंदीं से पृथ्वीराज चौहान के संबंधी भागकर उत्तर में शिवालिक की पहाडिय़ों में आकर छिप गए। भागते समय ये लोग अपने साथ अपनी कुल देवी को भी ले आए और पृथ्वी राज चौहान की यही कुल देवी कोटे वाली माता के नाम से मंदिर आज नूरपुर उपमंडल ही नहीं, अपितु हिमाचल से सटे पंजाब और जम्मू कश्मीर में भी प्रसिद्ध है।

 

बच्ची का गायब होना

 

 

कोटेवाली मां असंभव से असंभव कार्य को चुटकी में संभव कर देती है। यहां इस संबंध में एक चमत्कारी घटना का उल्लेख करना आवश्यक है। एक सदी पूर्व निकटवर्ती गांव की एक नन्ही बच्ची यकायक गायब हो गई। हर जगह ढूंढने पर भी उसका कहीं कोई पता नहीं चला। बहुत ढूंढने के बाद बच्ची के माता-पिता को ध्यान आया कि कोटेवाली माता से उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए मनौती मांगी थी, परंतु उसे पूरा करने की बात भूल गए थे। माता को मनौती चढ़ाने और क्षमा मांगने के तीन दिन बाद बच्ची सुरक्षित अभिभावकों को मिल गई। पूछने पर बच्ची ने बताया कि वह दादी मां के साथ रहती थी और दादी मां उसे हलवा-पुरी खिलाया करती थी। इस अपूर्व घटना को सुनकर बच्ची के परिजन और गांववासी हतप्रभ रह गए। ऐसी अनेक अलौकिक और चमत्कारी घटनाएं कोटेवाली माता के साथ जुड़ी हुई हैं।

 

श्रद्धालुओं का तांता

 

यह मंदिर 300 सीढियां चढक़र अत्यंत रमणीक एवं आकर्षक पहाड़ी पर स्थित है। यहां 20 एक दुकानें बनी हुई हैं, जहां प्रसाद व चायपान की व्यवस्था मौजूद है। यात्रियों के विश्राम के लिए धर्मशाला एवं पीने के पानी की भी सुंदर व्यवस्था है। माता रानी की भव्य मूर्ति श्रद्धालुओं को वशीभूत कर लेती है। यूं तो वर्षभर इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, परंतु नवरात्रि के दौरान यह भीड़ कई गुणा बढ़ जाती है। इस दौरान प्रतिदिन विशाल भंडारे की व्यवस्था स्थानीय मंदिर कमेटी द्वारा की जाती है। इन दिनों देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपनी मन्नत चढ़ाने और माता के दर्शन करने माता के दरबार में पहुंचते हैं।

 

मंदिर का रखरखाव

 

मंदिर की देखरेख 1971 से गुरियाल गांव की एक कमेटी कर रही है। कमेटी की देखरेख में इस ऐतिहासिक मंदिर का सौंदर्यीकरण हुआ है। गुरियाल गांव से मंदिर के चरणों तक लगभग दो किलोमीटर का दुर्गम पहाड़ी रास्ता पक्का हो चुका है और उसके आगे मंदिर तक लगभग 250 पौडिय़ां सरल चढ़ाई के लिए बनवाई गई हैं। यही नहीं, मंदिर परिसर में लंगर भवन तथा बीस दुकानें हैं। मंदिर कमेटी निरंतर विकास कार्यों में जुटी हुई है।

 

ऐसे पहुंचे मां कोटे वाली माता के दरबार

 

इस मंदिर में पहुंचने के लिए पठानकोट से तलवाड़ा रेलमार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है और सडक़ मार्ग द्वारा पठानकोट से हिमाचल के प्रवेश द्वार पर स्थित व्यापारिक कस्बे जसूर से होते हुए राजा का तालाब आसानी से पहुंचा जा सकता है। पर्यटन विभाग और प्रदेश सरकार इस धार्मिक स्थल को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करे तो यह स्थान विश्व के नक्शे पर उभर सकता है।


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