पुस्तक समीक्षा : विसंगतियों के बावजूद जीवन जीने की ललक से ‘गुलमर्ग गुलज़ार होगा’

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पुस्तक समीक्षा : विसंगतियों के बावजूद जीवन जीने की ललक से ‘गुलमर्ग गुलज़ार होगा’

 

समीक्षक, डॉ सुरेश सिंघल, प्राध्यापक अंग्रेजी, स्टारेक्स विश्वविद्यालय, गुडगांव

 

हिंदी साहित्याकाश में चमकने वाली प्रकाशपुंज, उम्मीदों और जीवंतता से भरपूर एक मुखर स्वर और हिंदी- अंग्रेजी साहित्य की एक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. प्रियंका वैद्य का कहानी संग्रह ‘गुलमर्ग गुलज़ार होगा’ साहित्य निधि की संवृद्धि में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। चौंतीस कहानियों के इस संग्रह का शीर्षक इन कहानियों का मूल स्वर है। ‘गुलमर्ग’ एक ऐसा प्रभावशाली प्रतीक है, बिम्ब है, जिसकी जड़ें जमीन में बहुत गहरे तक फैली हुई हैं तथा जिसकी चेतना का विस्तार असीमित है। ज्यों- ज्यों ये  कहानियां परत दर परत खुलती चलती हैं, त्यों- त्यों इनके कथानक की कथात्मकता की विविधता की महक भी पाठक को सुश्वासित करती चलती है।

 

प्रस्तुत कहानी संग्रह के शीर्षक ‘गुलमर्ग गुलज़ार होगा’ में निहित अनुप्रयास की गूंज दूर तलक सुनाई देती है। यह गूँज है ‘उम्मीद’ की, एक ‘नई सुबह की’, ‘इंतज़ार’ खत्म होने की, बसंत आने की, बर्फ पर ‘धूप खिलने’ की। ‘गुलमर्ग’ प्रतिनिधित्व करता है जीवन के दोनों पहलुओं नकारात्मकता और सकारात्मकता का। यह ‘गुलमर्ग’ एक और प्रतिनिधित्व करता है। एक ‘जंगल’ का, ‘सन्नाटे’ का,’ अकेलेपन’ का, ‘संवेदनहीनता’ का, ‘निराशा’ का, ‘बंधन’ का, ‘प्रतीक्षा’ का, ‘संघर्ष’ का। वहीँ, दूसरी ओर इसके विपरीत प्रवृत्तियों का। इन कहानियों का अंत जीवन की नकारात्मक प्रवृत्तियों से न होकर सकारात्मक संदेश के साथ होता है, यह इन कहानियों की विशेषता कही जा सकती है।

ये कहानियां समर्पित हैं उन लोगों को जिन्होंने सपने देखने की जुर्रत तो की लेकिन उन्हें साकार नहीं कर पाए या फिर कशमकश का सामना करना पड़ा। ये समर्पित है उन लोगों के दर्द को, उनके दिलों की धड़कनों को, उनके इर्द-गिर्द फ़ैली विसंगतियों को, उस सुबह को जिसके ‘इंतजार’ में वे आधे- अधूरे इंसान हो गए हैं, लेकिन अपनी जिजीविषा के कारण जीवन की लड़ाई से हार नहीं मानते। इन पात्रों के जीवन जीने की ललक देखते ही बनती है। उनके संघर्ष के पीछे, कोशिश के पीछे, प्रेरणा के पीछे, निरंतर विसंगतियों से भरी स्थितियों का सामना करने के पीछे इनके माता-पिता का आशीर्वाद तो है ही, साथ ही इनका अपना सामर्थ्य, अपना मनोबल, अपनी बलवती इच्छा और उम्मीद का भी योगदान है। इसी कारण इन कहानियों का मुख्य स्वर नकारात्मक न होकर सकारात्मक रूप में  मुखरित हुआ है।

 

ये कहानियां जन्म लेती हैं हिमाचल के पहाड़ों की तलहटियों में, बस्तियों में, गाँवों में जहां वे  सजती- संवरती हैं, खिलखिलाती हैं, गुनगुनाती हैं, बचपन से यौवन में पाँव रखती हैं, जीवन की कशमकश का, जीवन के संघर्ष का सामना करती हैं। अकेलेपन, दर्द, वियोग के थपेड़े सहती हैं। ये कहानियां विषयवस्तु के विविध आयामों की चासनी में रस- बस कर अपना उम्मीदों से भरा सफर तय करती हैं। कभी ये मौसम के बदलने का इंतजार करती हैं और कभी सन्नाटे के पिघलने का। ‘कभी-कभी खुद की खोज में नदी की लहरों को जीने और खोये आस्तित्व को तलाश करने निकल जाती हैं‘ (96), ‘पूर्णता और खालीपन दोनों के बीच की दूरी को तय करने में लग जाती है‘(97)।

प्रियंका वैद्य की कहानियों की बुनावट भावनात्मक हृदय का सचेत बौधिक विन्यास है। इनकी सभी कहानियों का कथानक बेजोड़ है। इन कहानियों में विचरण करना एक तरह से अपने ही  अंतर्मन में विचरण करने के समान है जो करुणा, प्रेरणा, प्रेम, आत्मीयता जीवंतता, स्वच्छंदता आदि जीवन के विभिन्न पहलुओं से रूबरू करवाता है। प्रियंका वैद्य की  कहानियों के लगभग सभी पात्र उच्चतर मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण दिखाई देते हैं। जीवनदर्शन की, अस्तित्ववाद की, कल्पना और यथार्थ की, व्यवहारिक जीवन की अनेक भावनाएं  बहुत ही सहज रूप से दिखाई देती हैं, जो सरलता से अपना मंतव्य प्रस्तुत करती हुई सलीके से जीवन जीने का सलीका बताती हैं, मार्ग प्रशस्त करती हैं। अधिकांश पात्र बेहद सहज और सीधे- साधे प्रवृति के हैं। प्रियंका वैद्य एक ऐसी साहित्यकार हैं जो बिना लाग- लपेट के बेहद सहज भाव से अपने मन की सुरंग से बाहर आकर अभिव्यक्त करती हैं।

 

कहानियों की गूंज सिर्फ हमें ही नहीं, बल्कि इन कहानियों के किरदारों को भी सचेत करती हैं कि यदि उन्हें ‘तेजाबी’ माहौल में ‘खौफ’ से बचना है तो उन्हें ‘जिजीविषा’ के साथ एक ‘नये  आसमान की तलाश’ करनी होगी, ‘ प्रश्नचिन्हों’ के हल तलाशने होंगे, जीवन की ‘पगडंडियों’ पर ‘निरंतर’ चलना होगा और अन्धकार को पछाड़ते हुए ‘होली के रंगों’ से स्वयं को रंगना होगा। ये कहानियां सन्देश देती हैं कि यह तभी संभव है जब ये किरदार बिना किसी कशमकश के वक्त की पैमाइश करते हुए, ‘पतझड़’ के मौसम में भी ‘रिश्तों की डोर’ थामे ‘सतरंगी आसमान’ पर नजरें गड़ाए, घर लौटते अंधेरे में लालटेन द्वारा रोशनी का पैगाम देते हुए सरहद के इस पार घर वापसी करेंगे और ‘बिखरे तिनकों’ को समेटे एक घौसला बनाने की ललक लिए हुए, गुलमर्ग को गुलज़ार करने की जिद ठान लेंगे।

 

इन कहानियों के दृश्य- परिदृश्य इस प्रकार के अनेक बिम्बों और प्रतीकों से सुसज्जित हैं जो कि घर वापसी करते समय किरदारों का मार्गदर्शन करते हैं। संग्रह की सर्वप्रथम कहानी ‘गुलमर्ग गुलजार होगा’ में ‘धुंध’, ‘खामोशी’, ‘सन्नाटा’, ‘अंधेरा’, ‘दर्द’, ‘डर’, ‘वेदना’, ‘विलाप’, ‘क्रूरता’, ‘तड़प’ आदि बिम्ब किरदारों की नकारात्मकता को दर्शाते हैं, किंतु वे ‘उम्मीद’ नहीं छोड़ते और ‘इंतजार’ करते हैं जब तक कि परिस्थियां उनके उन्मुक्त प्राण नहीं डाल देती और जिंदगी जीवंत हो नहीं लहलहाती। इन पात्रों में गाइड के लिए गुलमर्ग की पहाड़ियों से भागना उसी प्रकार असंभव है जिस प्रकार कामू के सिसीफस के अभिशप्त पात्र के लिए पहाड़ पर चढ़ते- उतरते रहने की व्यवस्था के चलते भागना असंभव था। इसी ‘गुलमर्ग’ प्रतीक में बिम्ब के सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं।

 

‘क्या नए चिनार के पत्ते निकल गए होंगे? गुलमर्ग पर धूप खिली होगी? पतझड़ कब खत्म होगी? इस रात की कोई सुबह है क्या? इन सभी प्रश्नों के उत्तर इन वाक्यों के द्वारा प्रेषित किए गए हैं-

‘गुलमर्ग गुलजार होगा।

गुलमर्ग गुलजार होगा।‘

अंततः ‘इंतजार’ खत्म होता है। सैम्यूल बैकेट के ‘वोटिंग फॉर गोडो’ के बिलकुल विपरीत ‘उम्मीद’ पूरी होती है। गुलमर्ग गुलजार होता है और अनुप्रास की यह गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती है कि लौटना होगा मरुस्थल से पुन: झरने की तरह, रोपना होगा अपने भीतर वटवृक्ष क्षमा और प्रेम का, भूलना होगा वेदनाओं को जो प्रेम के मार्ग में बाधा हैं। छतरी को मजबूत करना है … सभी को अपने सानिध्य में समेट लेती है।‘ (81)

 

प्रियंका वैद्य की कहानियां एक ऐसे माहौल में सांस लेना चाहती हैं जब अकाश से जमीन के बीच एक अदृश्य – सी, एक अनसुनी- सी रूहानियत महसूस होती है, महसूस किए जा सकने वाले सुकून का फैलाव होता है, जिसमें किरदार उन्मुक्तता और जीवंतता के साथ जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। किन्तु इस के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ता है, यह राह उनके लिए आसान नहीं है। रिश्तों के ताने-बाने बुनते, कशमकश से जूझते और रिश्तों की उलझन में उलझे ये पात्र अपने अन्दर की छ्टपटाहट को विभिन्न प्रकार से अभिव्यक्त करने को आतुर हैं।

 

ठिठुरती शामों के धुंधलके, सुबह की धूप की किरणें, पक्षियों का कलरव. झरनों की निरंतर बहती  लहरों का संगीत, पहाड़ों की सुरमयी सरहदें सब मिलकर इन कहानियों के माहौल को एक अजीब सी रूहानियत, सन्नाटा, खामोशी प्रदान करते हैं और ऐसे में पात्र अपनी अस्मिता की खोज में हे जाते हैं। इस संग्रह की कहानियों के किरदारों के हाथों से जिन्दगी मनो छूट- छूट जाती हो, फिसल- फिसल जाती हो। पकड़ने की कोशिश, पकड़ कर फिर उसे जीने की कोशिश और वो भी एक  जिजीविषा के साथ, उल्लास के साथ।

 

महिला पात्रों के जीवन जीने की कशमकश भी जिन्दगी को पाने की है। जीवंतता को पाने की, अस्मिता को पाने की है। अपने ढंग से जीना है, दूसरों के नहीं। इसके लिए जीवन तोहफों का ढेर नहीं, सोने- चांदी के आभूषण नहीं। उन्हें तो बस वे लम्हे चाहिए जो उनके अपने हों। उन्हें ऐसे लम्हे चाहिए जो जीवन से भरे हों। उन्हें पति की बाहों का हार चाहिए न कि हीरे जवाहरात  का। उन्हें सानिध्य चाहिए न कि वैविध्य। उन्हें तलाश है ऐसे लम्हों की जो पूरी जिंदगी को कभी खत्म न होने वाली ‘बांसुरी की सुरीली तान’ बना दे। तभी वे विशाल जगत को छोड़ अनंत को अपनाते हुए आनंद को पा सकेंगीं, मुक्ति के द्वार की ओर कदम बढ़ाएंगी।

 

इन महिला पात्रों का संघर्ष यह है कि कहीं वे यह न भूल जाएँ कि ‘उनकी भी एक दुनिया है’ (103), उनका भी अपना एक ‘आस्तित्व’ है, अपनी पहचान है। सब कुछ देने के बदले में वे चाहती हैं तो ‘अनंत स्नेह’ और सच्ची आत्मीयता। वे किसी बंधन में बंधना नहीं चाहती, उन्हें किसी एक स्थान पर ‘ठहरने’ की आदत नहीं है, वे ‘बाहर निकलना’ चाहती हैं। वे अपना पोषण चाहती हैं, शोषण नहीं। वे समर्पण के लिए तत्पर हैं, लेकिन अपहरण के लिए नहीं। जहां विवाद न हो बल्कि संवाद हो, अभिव्यक्ति हो। क्योंकि खुद को खुश रखना है तो खुद के पास रहना, खुद को जीना जरूरी है।

 

इन महिलाओं को, जिनमें ज्यादातर तो दांपत्य जीवन से संबंधित हैं या फिर अभी अविवाहित हैं, कल्पना के पंखों पर सवार होकर खुले आकाश में उड़ान भरना चाहती हैं, उन्मुक्तता और स्वछन्दता का जीवन जीना चाहती हैं। जिन्हें अच्छा लगता है अकेले पहाड़ियों पर चढ़ना, खुद से बातें करना, घंटों बारिश को देखना, मीलों पैदल चलना। यह महिलाएं, पत्नियां, बेटियां अक्सर शिकायत करती हैं कि उनके अपनों ने ही क्यों उन्हें खालीपन को भरने की जगह अकेले पश्चाताप की अग्नि में जलने को छोड़ दिया?  इस अग्नि को बुझाने के लिए बारिश को आत्मसात कर जीना जरूरी था, लेकिन दुर्भाग्यवश प्यार की बारिश की बौछारें उन्हें भिगो नहीं पाती – न अंदर से, न बाहर से।

 

इन्हें यह मंजूर नहीं कि इनके जीवन की डोर किसी और के हाथ में हो। ये नहीं चाहती कि दूसरे लोग इनका दिल जीतने के बजाये इन पर अपना अधिकार जमायें। किसी ओर के आसमान  में उड़ने के बजाय अपनी जमीन की दायरों को बढायें। और यह सबकुछ यें ‘जीवन के तूफानों से संघर्ष करके’ ही हासिल करती हैं। (113)

 

इन कहानियों में अभिव्यक्त समस्याएं, सुख-दुख, मनोभाव, रिश्ते- नाते आदि सब अपने लगते हैं। कुछ कहानियों में वृद्ध मां-बाप की व्यथा अभिव्यक्त की गई है, जिनमें वे अपने बच्चों से अलग रहकर अकेलेपन का दर्द भोग रहे हैं। बेटे-बेटियों को भी अपने माता-पिता का ख्याल न रख पाने का पश्चाताप सालता रहता है। उनके अकेलेपन को नहीं भर पाने की कशिश काँटा बन चुबती रहती है। पिता की वेदना को नहीं समझने, उनके साथ बैठ कर कभी खाना नहीं खाने की भूल पश्चाताप बनकर रह जाती है।

 

प्रस्तुत कहानियां हमारे जाने-पहचाने बाहरी- भीतरी प्रवेश से गुजरती हैं, हमारी ही संस्कृति और संस्कारों में पली-बढ़ी हैं, इसलिए यह अपनी सी लगती हैं और अभिप्रेत प्रभाव छोडती हैं। इन कहानियों में कथा कहने का ढंग बहुत ही कलात्मक है, क्योंकि कथा सीधे वृतांत  की तरह नहीं चलती, इसमें कलात्मक मोड़ आते रहते हैं। भाषा का प्रभाव और शब्दों का प्रयोग भी प्रभावशाली है। भाव और विचार सघन होने के बावजूद भी ये पारदर्शी और अत्यंत पठनीय हैं।

 


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