पिता से विरासत में मिली नुआल़ा गायन की लोककला के संरक्षण में दो दशक से जुटे भरमौर के शिक्षक सुरेंद्र पटयाल पालमपुर से ललिता कपूर की रिपोर्ट

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पिता से विरासत में मिली नुआल़ा गायन की लोककला के संरक्षण में दो दशक से जुटे भरमौर के शिक्षक सुरेंद्र पटयाल
पालमपुर से ललिता कपूर की रिपोर्ट
पेशे से शिक्षक सुरेंद्र पट्याल चंबा के भरमौर जनपद के मशहूर नुआल़ा गायन की लोककला के संरक्षण में दो दशक से जुटे हैं। उन्हें यह लोक गायन की कला अपने पिता से विरासत में मिली है। उनके पिता स्व. श्री धर्म सिंह पटयाल अपने दौर में देवों के देव महादेव को समर्पित अनूठे लोक गायन नुआल़ा के जाने- माने कलाकार थे, जिन्हे चम्बा ही नहीं कांगडा में भी लोग अच्छी तरह से जानते थे। एमए बीएड करने के बाद शिक्षक नियुक्त होने के बाद सुरेंद्र ने साल 2000 में नुआल़ा गायन की लोककला के संरक्षण की पहल की और तब से लेकर वे पिछले 21 सालों में भरमौर ही नहीं चम्बा, कांगडा, मंडी, शिमला और चंडीगढ़ जैसे स्थानों पर सैंकड़ों बार नुआल़ा गायन से अपनी लोककला का लोहा मनवा चुके हैं। बता दें कि शिव भगवान को समर्पित नुआल़ा में लोक गायन की अनूठी कला जनजातीय क्षेत्र भरमौर की एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है।
तीसरी क्लास, देश भक्ति का गीत और प्रथम पुरस्कार
जब सुरिंदर पट्याल राजकीय प्राथमिक पाठशाला भरमौर में तीसरी कक्षा में पढ़ते थे, तब स्कूल में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 15 अगस्त के दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम में देश भक्ति गीत ‘मेरे देश प्रेमियों आपस में प्रेम करो देश प्रेमियों’ गाने का अवसर मिला। उनकी प्रस्तुति सबसे बढ़िया थी और इस के लिए उन्हें कार्यक्रम में प्रथम पुरस्कार मिला। स्कूल में मिला यह सम्मान एक छोटे से बच्चे को संगीत और गायन के क्षेत्र में बड़ा करने के लिए प्रेरित कर गया और गायन अब उनके जीवन का अहम् हिस्सा हो गया।
नुआल़ा गायन को सीखने- समझने की ललक
पिता जब नुआल़ा गायन करते तो बचपन में सुरेंद्र उसे बड़े ध्यान से सुनते। जब भी समय मिलता, वह बजुर्गों के साथ नुआल़ा गायन का शोक पूरा करते। इस सांगत से शिक्षक सुरेंद्र पट्याल को गायन की इस विधा को सीखने और समझाने का मौका मिलता। हालांकि बचपन से ही उन्हें लोग गायन में रस मिलता था, लेकिन शिक्षा और करियर के चलते वे चाह कर भी अपने इस शौक को पूरा नहीं कर पाते थे। कहीं दिल में पिता की सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढाने की बात दिल में गहरे घर कर गई थी। सुरेंद्र बेशक पढ़ाई के बाद शिक्षक बन चुके थे, लेकिन नुआल़ा गायन के प्रति गहरा लगाव था। चाहे वे गायन नहीं करते थे, लेकिन जहां भी नुआल़ा गायन होता वे सुनने पहुंच जाते।
ऐसे मिला गायन का अवसर
सुरेंद्र पटयाल कहते हैं कि साल 2000 में जब अध्यापक के तौर पर तुन्दाह के बन्नी स्कूल में कार्यरत थे, तब वे एक घर में नुआल़ा गायन सुनाने गए। सनद रहे कि नुआल़ा गायन में चार लोक गायक शामिल होते हैं। पहला ढोल वाला और दूसरा डगे वाला जो ग्रैन् लगाते हैं। मतलब जो पहले गाते हैं। तीसरा थाली मगडू वाला और चौथा कणसी वाला। तीसरा और चौथा लोक गायक बाद में बोल को दोहराते हैं। सुरेंद्र पटयाल कहते हैं इक उस रोज किसी कारणवश उस गायक मंडली का एक बंदा नहीं आया था, जो ढोल बजाता था और ग्रैन् लगाता था। उसकी जगह सुरेंद्र को गायन के लिए बिठाया गया। यह उनके जीवन का पहला नुआल़ा गायन था। यहीं से लोक गायन की दिशा में सुरेंद्र को राह मिल गई।

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