पाखी: कभी पहाड़ की हर लडक़ी को आता था पाखी बनाने का हुनर, बेटी की शादी में दिया जाता था पाखी का उपहार

Spread the love

पाखी: कभी पहाड़ की हर लडक़ी को आता था पाखी बनाने का हुनर, बेटी की शादी में दिया जाता था पाखी का उपहार
सुंदरनगर से पवन चौहान की रिपोर्ट
रियासतकालीन भारत में राजा-महाराजाओं के समय में गर्मियों के दिनों में राजा के सिंहासन के अगल-बगल पाखी फेरने का यह कार्य कम से कम दो पुरुषों या दो स्त्रियों के हवाले होता था। ये लगातार पाखियां फेरते और शीतलता प्रदान करते जाते थे। दरबार में ठंडक बरकरार रहे इसके लिए एक लंबी रस्सी के सहारे दरबार में दो या तीन जगह ऊपर या नीचे पाखियां लटकी रहती थीं, जिन्हे लंबी रस्सियों के सहारे आगे-पीछे करके पूरे दरबार में ठंडक प्रदान करवाई जाती थी। यही विधि आपको कई बड़े मंदिरों में आज भी देखने को मिल जाती है। देवी-देवता के मुख्य कक्ष में जाए बगैर एक लंबी रस्सी के सहारे बाहर से ही देवी-देवता के ऊपर लगाई पाखियों को गर्मी के दिनों में भक्तों द्वारा लगातार हिलाया जाता है।
पाखी : पक्षी के पंख जैसी बनावट
गर्मी का मौसम आ गया है। अब पंखे और एसी की याद आएगी, लेकिन बिजली न हो तो फिर क्या करें? ऐसे वक्तमें याद आती है ‘पाखी’। पाखी अर्थात हाथ से चलने वाला पंखा। मुख्यत: इसे ‘बिजणी’ या ‘पंखी’ के नाम से संबोधित किया जाता है। वैसे पाखी शब्द का अर्थ पक्षी है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के मंडी में इसके नामकरण के पीछे पक्षी के पंख जैसी बनावट इसका मुख्य कारण हो सकता है। कभी जनपद में पाखी हर घर में मौजूद हुआ करती थी।
हाथों से घुमाकर गर्मी से राहत
पाखी एक ऐसी सरंचना है, जिसको हाथों से घुमा-घुमाकर गर्मी से राहत देने के काम में लाया जाता है। यह अंग्रेजी के अक्षर ‘पी’ और अंक ‘नौ’ के आकार के रूप में होती है। इसके अलावा यह कुल्हाड़ी के आकार जैसी भी होती है। इसे घुमाने के लिए जिस स्थान से इसे थामा जाता है वह एक ढीला हैंडल (लकड़ी या प्लास्टिक का) होता है। इस जगह से पाखी को पकडक़र गोल-गोल घुमाया जाता है। वैसे पहले ‘मझयाड़े’ (बांस का कार्य करने वाले) भी इसे बनाते थे, लेकिन उनमें घुमाने वाले हैंडल का अभाव रहता था। उसे हाथ से इधर-उधर हिलाकर ही ठंडी हवा का आनंद लिया जाता था। इसमें आप फोल्डिंग पाखी को भी शामिल कर सकते हैं, जो अर्धवृत जितनी खुलती है। इसे आपने बहुत बार कई फिल्मों, किसी पत्रिका की तस्वीरों आदि में अवश्य देखा होगा। यह सख्त गत्ते या प्लास्टिक से बनी होती है।
एक से एक सुंदर डिजाइन
पाखी का ‘सी’ या ‘डी’ अक्षर वाला ऊपर का हिस्सा बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह वह हिस्सा है, जिससे पाखी की खूबसूरती दर्ज होती है। इस हिस्से को तैयार करने का कार्य महिलाएं करती हैं। पाखियों का यह भाग सीमेंट वाली बोरी या सेबे (जूट) की बोरी को इसमें फंसाकर और फिर उसमें सुंदर-सुंदर डिजाइन बनाकर तैयार किया जाता है। इसे कई विधियों और डिजाइनों द्वारा तैयार किया जाता है, ताकि पाखी की खूबसूरती में कोई कमी न रहे। ‘सी’ और ‘डी’ वाले अंदर के हिस्से को बनाने के बाद उसके बाहर बॉर्डर में मुख्यत: रंग-बिरंगे कपड़ों या ऊनी धागों से उसे सजाया जाता है जिससे पाखी की सुंदरता में और भी निखार आ जाता है। यह बाहरी हिस्सा हवा को ज्यादा मात्रा में समेटने में सहायता करता है। पाखी को सजाने के लिए माला के मनकों, कई प्रकार के रंगों से लेकर अन्य सजावटी सामान का इस्तेमाल किया जाता है।
सजाने के तरीके से ठाठ का अंदाजा
मंडी के महादेव गांव की सौजी देवी कहती हैं कि पाखी के ऊपर वाले हिस्से को संवारने या बुनने में लगने वाला समय इसमें इस्तेमाल किए गए तरीके या सामग्री के हिसाब से लगता है। यदि क्रोसिए से बनाना हो तो दिनभर के अन्य कार्यों के साथ इसे लगभग चार दिन, यदि धागे या प्लास्टिक की तारों की बुनाई करनी हो तो एक से दो दिन और यदि खूब सारे डिजाइन को लेकर इसे बुनना हो तो समय उसी हिसाब से तय होता है। पहले पाखी को बनाना हर लडक़ी व हर महिला को आता था। यह हुनर परंपरागत तरीके से वें पीढ़ी दर पीढ़ी सीखती जाती थीं। पाखी को बेटी की शादी में उसके अन्य जरुरत के सामान के साथ दिया जाता था। पाखी की बुनाई से लेकर उसमें इस्तेमाल की गई सामग्री से सजाने के तरीके तक किसी के ठाठ का अंदाजा भी लगाया जाता था।
संस्कृति का एक अटूट हिस्सा
पाखी हमारी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा था। पाखी का जिक्र हमारे हर समाज के लोक गीतों में बराबर आता है। हरियाणा के एक लोक गीत में पाखी (बिजणा) का जिक्र देखिए-
‘‘मेरा नौ डांडी का बिजणा
मेरे ससुर जी ने दिया गढ़वा
झणा झण बाजै ए! बीजणा
मेरे सास कहवै हे बहू! पीसले…
पाखी से पहले की व्यवस्था
बुजुर्गों के अनुसार, पाखी से पहले शरीर को ठंडक प्रदान करने के लिए किसी गत्ते या फिर ऐसी ही कोई आयताकार या वर्गाकार (थोड़ी सख्त) वस्तु का इस्तेमाल किया जाता था, जिसे हाथ में थामे आगे-पीछे या ओर-परे हिलाकर ठंडी हवा का सुख लिया जाता था। इससे हाथ या बाजू में जल्द ही थकान हो जाती थी। इसी व्यवस्था को आसान और सुविधाजनक बनाया पाखी ने। इससे अब एक स्थान से घुमाकर आराम से, पूरे गोल दायरे में हवा बांटी जा सकती थी। जबकि गत्ते वाले तरीके से सिर्फ दो तरफ को ही इस ठंडी हवा का रुख मोड़ा जा सकता था।
पाखी से एयर कड़ीशन तक
वर्तमान में विज्ञान की तरक्की ने कई पड़ावों को पार करते हुए बेशक, पाखी से एसी तक का सफर तय कर लिया है, लेकिन आज की पीढ़ी के लिए पाखी एक खिलौने की तरह ही है। वह व्यक्ति जिसने पाखी का इस्तेमाल जीवन भर किया होगा, यदि उसे आज यह दिख जाए तो वह उस मुश्किल वक्तकी सैर पर निकल जाता है जहां पाखी की ठंडी हवाएं, उसकी सारी थकान को छूमंतर करने के लिए तैयार बैठी हैं।
————————————————
– पवन चौहान, गांव व डा. महादेव, तहसील सुंदरनगर, जिला मंडी, हिमाचल प्रदेश- 175018
मो.: 098054 02242, 094185 82242

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *