पाकिस्तान के शेखपुरा किले आखिरी सांसे लेती कांगड़ा कलम

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पाकिस्तान के शेखपुरा किले आखिरी सांसे लेती कांगड़ा कलम
मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट
दुनिया में अपनी विशेष शैली को लेकर मशहूर कांगड़ा कला का गौरव पाकिस्तान के शेखपुर किले में आज भी देखा जा सकता है। इस किले की ीीवारें और छत पर कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग के अदभुत चित्र उकेरे गए हैं, लेकिन संरक्षण के अभाव में यहां कांगड़ा कलम आखिरी सांसे ले रही है। वर्तमान में अब इस किले के मुख्य प्रवेश द्वार को छोडक़र कहीं भी मुगल-युग की वास्तुकला का कोई संकेत नहीं दिखाई देता। हालांकि किले में स्थित महारानी दातार कौर की एक छह मंजिला हवेली लाहौर के मोरी गेट के अंदर स्थित नौनिहाल सिंह की हवेली के समान है, लेकिन इस हवेली में लगे बेशकीमती लडक़ी के दरवाजे, खिड़कियां और छत दीमकों की जद में है। किले में उकेरी गई महान कांगड़ा शैली की पेंटिंग के रंग धुंधले पड़ चुके हैं। बेशक इस ऐतिहासिक इमारत के संरक्षण के लिए पाकिस्तान पुरातत्व विभाग ने कदम उठाए हैं, लेकिन इस मुगलकालीन धरोहर को सहेजना कोई आसान काम नहीं है।
जहांगीर के शासनकाल में बना शेखपुर का किला
वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित शेखपुरा किला मुगल सम्राट जहांगीर के शासनकाल के दौरान बनाया गया था। हालांकि, इस तत्थ के समर्थन में कोई निर्णायक सबूत नहीं हैं, लेकिन, जहांगीर की आत्मकथा तुजुक-ए-जहांगीरी में इस बात का उल्लेख है 1607 ईस्वी में सम्राट ने हिरन मीनार में आखेट यात्रा के दौरान सिकंदर मोइन को इस किले के निर्माण का काम सौंपा। अनुभवी पुरातत्त्ववेत्ता ,एवं इशान एन नदीम के मुताबिक सिख राज के उदय के पहले यह किला ग्रामीण इलाकों में लूटपाट करने वाले डाकुओं की छिपने की जगह में बदल चुका था।
बदलते रहे किले के मालिक
सन 1797 में लाहौर पर आक्रमण के दौरान दुर्रानी राजा शाह जमान ने लुटेरों के कब्जे वाले इस किले को घेर लिया था। राजा की यहां से विदाई के बाद इस किले का कब्जा इंदर सिंह नाम के एक डकैत के पास रहा। बाद में महाराजा रणजीत सिंह के सहयोगी सिंह ने इस किले पर हमला किया डकैत इंदर सिंह को मौत की सजा सुनाई। इसके बाद यह किला भाई सिंह के पास आ गया। 1808 में जब महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने हमला बोला तो यह किला साहिब सिंह और सहाय सिंह के कब्जे में आ गया।
महाराजा रणजीत ने जागीर में पत्नी को दिया किला
महाराजा रणजीत सिंह ने दस किले को अपनी पत्नी के दातार कौर जागीर के रूप में दे दिया। दातार कौर को राज कौर और युवराज खडक़ सिंह की माँ के रूप में भी जाना जाता है, वह अपने जीवन के आखिरी सालों तक इसी किले में रहीं। दातार कौर ने इस किले के पुर्नवास में अहम रोल अदा किया और इसमें जीवन के रंग भर दिए। इस हवेली की पहली मंजिल पर दो कक्षों में दातार कौन ने कांगड़ा चित्रकला से सजावट की।
अंग्रेजों ने किले में कैद की महारानी
19 वीं सदी के मध्य में जब भारत की सत्ता ब्रिटिश सरकार के हाथ में आई शेखपुरा के किले को अंग्रेजों ने महाराजा के अंतिम रानी एवं महाराजा दलीप सिंह की मां जिंदन कौर को हाउस अरेस्ट के लिए इस्तेमाल किया। 9 अगस्त 1847 को पंजाब में ब्रिटिश सरकार के रेजिडेंट सर हेनरी लॉरेंस मांटगोमेरी ने गवर्नर जनरल को लिखे पत्र में महारानी को पंजाब से देश निकाला देने का सुझाव दिया। उनकी सिफारिश पर युवा महाराजा दलीप सिंह लाहौर किले के महल से शालीमार गार्डन में भेज दिया गया और महारानी को शेखपुरा के किले में कैद कर दिया गया। 15 मई 1848 की दोपहर को महारानी को किले से हटा दिया गया। उसके बाद महारानी ने नेपाल और लंदन में निर्वासित जीवन व्यतीत किया।
अब पाकिस्तान पुरातत्व विभाग के पास किला
ब्रिटिश शासन के दौरान इस किले को 1851 से 1849 तक गुजरांवाला जिले के एक प्रशासनिक मुख्यालय के रूप में इस्तेमाल किया गया। जब मुख्यालय को गुजरांवाला शहर में बदला गया तो यह किलो एक सैन्य चौकी के रूप में भी कुछ कुछ समय प्रयोग में लाया गया। 1918 में शेखपुरा नया जिला बना तो यह किला नए जिले का पुलिस मुख्यालय बना। 1947 में भारत के विभाजन के बाद इस किले को भारत के पंजाब से पाकिस्तान गए अप्रवासियों ने अस्थाई बसेरे के रूप में प्रयोग किया। इसके बाद अतिक्रमणकारियों का इस पर कब्जा रहा। वर्ष 1967 में यह किला पाकिस्तान पुरातत्व विभाग के कब्जे में आया, लेकिन अभी तक किले का संरक्षण होना बाकि है।

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