पहाड़ के लोक संगीत में छाई, पहाड़ के ‘बिस्मिल्ला खान’ सूरजमणि की शहनाई

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पहाड़ के लोक संगीत में छाई, पहाड़ के ‘बिस्मिल्ला खान’ सूरजमणि की शहनाई

 

वीरेंद्र भारद्वाज की रिपोर्ट

 

शहनाई वादन से अपनी खास पहचान बनाने वाले पहाड़ के ‘बिस्मिल्ला खान’ कहे जाने वाले सूरजमणि को मलाल है कि अब पहाड़ पर इस वाद्ययंत्र को बजाने की बारीकियां सीखने को कोई तैयार नहीं है। सूरजमणि एक ऐसा नाम, जिनकी शहनाई की धुन के बाद ही प्रदेश के बड़े महोत्सवों की शुरुआत होती है। यहां तक कि फिल्म अभिनेता सन्नी देयोल भी सूरजमणि की शहनाई के कायल होकर इन्हें अपने साथ काम करने का मौका दे चुके हैं, लेकिन सूरजमणि को अपनी विरासत संभालने वाला कोई नहीं मिल रहा है। हालांकि, प्रदेश में और भी कई लोग हैं जो शहनाई बजाते हैं, लेकिन छोटे से प्रदेश में शहनाई वादन में सूरजमणि ने जो मुकाम हासिल किया है, वह तारीफ-ए-काबिल है।

 

नौ साल की उम्र में सीखी शहनाई

 

शहनाई, वो वाद्ययंत्र, जिसकी मधुर धुन जहां कहीं भी बजती है, लोगों को पता चल जाता है कि शुभ काम शुरू हो गया है। आज बिरले ही लोग बचे हैं जो शहनाई वादन में निपुण हैं और अपनी इस कला के दम पर अपनी पहचान बनाए हुए हैं। इन्हीं में से एक हैं सूरजमणि। मंडी जिला के गोहर उपमंडल के चच्योट गांव निवासी सूरजमणि ने मात्र 9 वर्ष की आयु में शहनाई बजाना शुरू कर दिया था। शहनाई वादन की कला उन्होंने अपने ताया से सीखी। आज प्रदेश का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा, जहां सूजरमणी की शहनाई की धुन न गूंजी हो। प्रदेश में जितने भी बड़े महोत्सव होते हैं वहां सूरजमणि को विशेष तौर पर शहनाई वादन के लिए बुलाया जाता है।

 

चार हजार से भी अधिक पहाड़ी गानों में शहनाई वादन

सूरजमणि की शहनाई के बाद ही ज्यादातर महोत्सवो के आगामी कार्य शुरू होते हैं। सूरजमणि अब तक हिमाचल प्रदेश के चार हजार से भी अधिक पहाड़ी गानों में शहनाई वादन कर चुके हैं। यहां तक की फिल्म अभिनेता सन्नी देयोल भी सूरजमणि की शहनाई के कायल हैं। बीते वर्ष सन्नी देयोल मनाली में अपने बेटे करण देयोल की फिल्म ‘पल-पल दिल के पास’ की शूटिंग के लिए आए हुए थे। फिल्म में जब उन्हें शहनाई की धुन की जरूरत पड़ी तो उन्होंने सूरजमणि का साथ लिया। सूरजमणि ने शहनाई वादन के दम पर अपना नाम तो कमा लिया, लेकिन अब उन्हें अपनी इस विरासत को सहेजने वाला कोई नहीं मिल रहा। सूरजमणि की मानें तो अब इस काम में मान-सम्मान घटता जा रहा है, जिसके कारण युवा इस ओर नहीं आ रहे हैं।

चैत्र में बजती थी हर घर शहनाई

चैत्र महीना विशेष तौर पर शहनाई वादन के लिए माना जाता था और उस दौरान यह घर-घ र जाकर शहनाई बजाते थे, लेकिन आज यह परंपरा विलुप्त होती जा रही है। सूरजमणि की मानें तो यदि सरकार कोई म्यूजिक एकेडमी खोले तो वह सभी को शहनाई वादन की कला सिखाने के लिए तैयार रहेंगे। पहाड़ की इस परंपरा एवं संस्कृति को बचाने की आवश्यकता है। शासन को इन वाद्य यंत्रों के वादन के संवर्धन को कारगर नीति तैयार करनी चाहिए। कार्यशाला के माध्यम से पूर्वजों की इस धरोहर को आगे बढ़ाने के लिए इसमें रुचि रखने वाले युवाओं को प्रशिक्षण देने के लिए कारगर योजना तैयार की जानी चाहिए। ऐसी व्यवस्था की दरकार है कि ग्राम पंचायतों में ही इन वाद्ययंत्रों के वादन का प्रशिक्षण मिले।


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