पहाड़ के इस पत्रकार ने लाहौर में अखबारों के अन्याय के खिलाफ बुलंद की थी आवाज, महान स्वतंत्रता सेनानी इंद्रपाल के जीवन का दूसरा पक्ष

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पहाड़ के इस पत्रकार ने लाहौर में अखबारों के अन्याय के खिलाफ बुलंद की थी आवाज, महान स्वतंत्रता सेनानी इंद्रपाल के जीवन का दूसरा पक्ष
हमीरपुर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
हमीरपुर के नादौन क्षेत्र के क्रांतिकारी एवं महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित इंद्रपाल के क्रांतिकारी जीवन के बारे में तो आपने पढ़ा होगा, लेकिन लाहौर और रावलपिंडी में पत्रकार के तौर पर अखबारों के अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने के उनके जीवन के प्रसंगों से शायद ही आप वाकिफ हों। स्वतंत्रता संग्राम में कूदने से पहले इंद्रपाल ने अखबार की दुनिया में प्रबंधकों के अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी और पीडि़तों को उनके हक दिलवाने में कामयाब हुए। इन्द्रपाल के एक पुराने क्रांतिकारी साथी रूपचन्द पंडित अपने संस्मणों में लिखते हैं कि पंडित इंद्रदत्त अखबार के दिनों से ही अन्याय के खिलाफ मुखर हो गए बोलने वाले पत्रकार थे।
आंदोलन कर दिलवाई मजदूरी
रूपचन्द पंडित लिखते हैं कि लाहौर में कातिबी (लीथो प्रेस पर छपने के लिए एक विशेष कागज़ पर विशेष स्याही से लिखने का काम) सीखने के बाद इंद्रपाल अखबारों का काम करने लगे। वर्ष 1925 में उन्हें सनातन धर्म सभा रावलपिंडी के उर्दू साप्ताहिक सुदर्शन चक्र की किताबत करने रावलपिंडी पंहुच गए। कुछ समय वहां काम करने के बाद वे रावलपिंडी से वापस लाहौर आकर वह सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा के उर्दू दैनिक भीष्म में नौकर हो गए। यहां कातिबों के स्टाफ का कई महिनों की मजदूरी का बिल नहीं दिया गया तो इंद्रपाल ने कातिबों की सभा का झंडा उठाया और अखबार के प्रबंधकों के विरूद्ध प्रदर्शन शुरू कर दिया। अंत में प्रबन्धकों ने आंशिंक तौर पर कुछ दे दिला कर पीछा छुङाया।
योग्यता के अनुरूप तय करवाई आय
रूपचन्द पंडित लिखते हैं उन दिनों उर्दू के अखबारों में कातिबों की दशा दयनिय थी। संपादकों की खुशामद करने वाले कातिब तो बहुत पैसा कमा लेते थे, परन्तु स्वाभिमान रखने वाले कातिबों की मासिक आय बहुत कम बैठती थी। इससे आहत पंडित इंदपाल ने भीष्म अखबार के कातिबों की एक यूनियन बनाई और प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा संभाला। नतीजा यह हुआ कि प्रबंधन को लिखाई कि योग्यता के अनूरूप आय तय करनी पड़ी। बाद में अखबारी दुनिया छोड़ कर वे देश को आजाद करवाने के लिए क्रांतिकारियों में शामिल हो गए और कई क्रातिकारी घटनाओं में शामिल रहे।
रिहा होकर वीर प्रताप में किया काम
वर्ष 1938 में पंडित इन्द्रपाल जेल से रिहा हुए और थोड़ा सा ठीक होने पर उन्होंने वीर भारत के संपादकीय स्टाफ में कार्य करना आरम्भ कर दिया और बीमारी- कमजोरी की परवाह न करते हुए अपनी सहायता आप की। पाकिस्तान बन जाने पर लाहौर छोङकर अपने गांव नादौन लौटे तो यहां उन्होंने दहेज प्रथा, अन्ध विश्वास और दूसरी सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए एक पुस्तक छापी।
मिडिल स्कूल में स्कॉलशिप
नादौन के पंडित हरिराम के घर 5 अप्रैल 1905 को पैदा हुए इंद्रपाल बचपन से बहुत शरारती और तीक्ष्ण बुद्वि थे। उन दिनों सारे जिला कांगङा में केवल मिडिल स्कूलों की चार स्कॉलरषिप हुआ करती थी। उन्होंने मिडिल की परीक्षा देहरा गोपीपूर के स्कूल से दी और स्कालरषिप हासिल की। कुछ दिन बनी और चैकी मनीयार के स्कूलों में अध्यापक का काम किया। अचानक एक दिन सब छोड़ के लाहौर जा पंहुचे। वहां पहले घरेलू नौकर, कुछ दिन एक हलवाई की दुकान पर बर्तन मांझे और बाद में मास्टर नंदलाल कातिब के शागिर्द बन गए।
नहीं सह पाए गांधी की मौत का सदमा
क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल पंडित इंद्रपाल को जेर दफा 302/309 फांसी की सजा और दूसरी अलग- अलग दफा के अन्तगर्त आजीवन कारावास या काले पानी की सजा और 4(बी) भारतीय दंड संहिता एक्ट 6 ऑफ 1908 के आधीन 20 साल कैद की सजा मिली। हाईकोर्ट में उनकी अपील में फांसी की सजा टूटी। वर्ष 1938 में पंडित इन्द्रपाल जेल से रिहा कर दिए गए। कुछ दिनों बाद वे फिर अखबार की दुनिया में लोट आए। 1948 में जब महात्मा गांधी को गोली मार देने का समाचार सुना तो बेहोश हो गए। इरविन अस्पताल दिल्ली में एक महीना दाखिल रहने के बाद 13 अप्रैल 1948 को उनकी मृत्यु हो गई।

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