पहाड़ की कहावतों और कविताओं में सिमट कर रह गई सर्दी में गर्मी, गर्मी में ठंडक देने वाली ‘खिंद’, पीढ़ी दर पीढ़ी का इतिहास समेटे रहती है ‘खिंद’

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पहाड़ की कहावतों और कविताओं में सिमट कर रह गई सर्दी में गर्मी, गर्मी में ठंडक देने वाली ‘खिंद’, पीढ़ी दर पीढ़ी का इतिहास समेटे रहती है ‘खिंद’
सुंदरनगर से पवन चैहान की रिपोर्ट
इन्सान ने गुफाओं से निकलकर जब घर बनाए और अपना तन ढांपने रखने के लिए कपड़े तो इसी प्रक्रिया में काफी अरसे तक पहनने के बाद इन बेकार हुए कपड़ों का उसने सही इस्तेमाल करना भी सीख लिया। जाड़े के दिनों में रात को जब वह ठंड से ठिठुरता तो इस सर्दी से बचने के लिए अन्य प्राकृतिक सुविधाओं से एक कदम आगे बढक़र अपने लिए ‘खिंद और खन्दोल्हु’ बनाए। खिंद अर्थात रजाई और खन्दोल्हु अर्थात तलाई। दोनों को बनाने-संवारने का तरीका एक-सा ही था, लेकिन खिंद का आकार बड़ा और खन्दोल्हु का छोटा होता था। खिंद थोड़ी मोटी होती थी।
लाहौल-स्पीति में ऊनी कपड़ों की ‘खिंद’
ख्ंिाद को हिमाचल के मंडी, कांगड़ा, चंबा, ऊना, हमीरपुर और बिलासपुर जिले में ‘खिंद’, कुल्लू में ‘खिंद’ व ‘खिंदड़ू’, शिमला में ‘खिन्दता’, सोलन में ‘खीन्टु’, सिरमौर के गिरिपार इलाके में इसे ‘खिन्द्तु’ बाकी दूसरे इलाकों में ‘खींदड़ा’, अपर किन्नौर में ‘बैम’ व ‘बोलदन’ और लोअर किन्नौर में ‘तुमरा’ व ‘लकदो’, लाहौल-स्पीति में ‘क्यरे’ नाम से पुकारा जाता था। किन्नौर और लाहौल-स्पीति में खिंद व खन्दोल्हु बनाने के लिए मुख्यत: ऊनी कपड़े ही उपयोग में लाए जाते थे। जबकि अन्य स्थानों में इसे हर प्रकार के कपड़ो से तैयार किया जाता था।
गरीब के घर में बची ‘खिंद’
खिंद व खन्दोल्हु विभिन्न आकार-प्रकार और तरह-तरह के पुराने कपड़ों की मोटी तह है, जिसका इस्तेमाल इस आधुनिक युग से पहले हर घर में सर्दी और गर्मी में ओढऩे और बिछाने के लिए होता था। आज कई आधुनिक सुख-सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, लेकिन इसके बावजूद भी हिमाचल के कई घरों में आज भी खिंद व खन्दोल्हु का इस्तेमाल यदा-कदा कर लिया जाता है। विशेषतौर पर, गरीब परिवारों में तो अवश्यमेव।
आप भी बनाईए खिंद
आदमी कपड़े को पहनने या पुराने होने या फटने के बाद उन्हें किनारे रख देता था। जब ऐसे कपड़ों की संख्या बहुत हो जाती तो तैयारी होती खिंद व खन्दोल्हु बनाने की। पहले गरीबी के कारण और आज ऐसी सुविधाएं न होने के कारण यह कार्य स्वंय ही निपटाकर अपने ओढऩे व बिछाने के लिए खिंद व खन्दोल्हु तैयार किए जाते थे। इसके लिए सबसे पहले जितने भी पुराने कपड़े होते थे उन्हें इस तरह से फाड़ दिया जाता कि वह चैरस, आयताकार, वर्गाकार या फिर अन्य आसानी से सही सिलाई की जा सकने वाला रूप ले सके। इन कपड़ों को इस तरह से फाड़ा जाता ताकि बटन, चेन या अन्य चुभने वाला हिस्सा जैसे कॉलर, मोहरी, कफ आदि न रहे।
सबसे पहले आधार बनाने का काम
कपड़ों को फाडऩे के बाद शुरू होता था खिंद और खन्दोल्हु को बनाने का अगला पड़ाव। सबसे पहले अच्छे-अच्छे, साफ– साफ और सुंदर कपड़ों को बनाई जाने वाली खिंद तथा खन्दोल्हु के आकार (एक चद्दर की तरह) में सील दिया जाता था। यह इनका आधार बनता था। अब सभी कपड़ों के टुकड़ों को खिंद व खन्दोल्हु की चैड़ाई और लंबाई के अनुसार तह लगाकर एक-दूसरे के ऊपर, हर किनारे को कवर करते हुए रख दिया जाता था। कपड़ों की उपलब्धता और इन दोनों की मोटाई के हिसाब से ये तहें ऊपर और ऊपर उठती जाती थीं। जब एक मुकम्मल आकार मिल जाता तो उसके बाद फिर एक सही-सही, साफ- साफ खिंद के आकार के कपड़े को सुई के सहारे सिलकर खिंद और खन्दोल्हु के ऊपर से ढकने के लिए तैयार किया जाता था।
नगंदणे का काम देता हाथों को दर्द
फिर ऊपरी कवर और निचले कवर के साथ ही सारी तहों को सिलने (नगंदणे) का कार्य शुरु किया जाता था। इन तहों में से सुई को ऊपर से नीचे फिर नीचे से ऊपर हर नगंदे को ध्यान से दिया जाता था, ताकि तहें खराब न हों। यह कार्य हाथों में दर्द पैदा कर देता था। इन्हें सिलने के लिए मोटी सुई और मुख्यत: मोटा सफेद धागा ही प्रयोग में लाया जाता था। यदि इन्हे बनाते समय कपड़ों की कमी पड़ती थी तो आस-पड़ोस से कपड़े मांग लिए जाते या फिर कपड़ों की जगह सेबों (जूट) वाली बोरियां बीच में डालकर इन्हे सही आकार दिया जाता था।
खिंद बनाने के लिए ज्वारी
कपड़े फाडऩे से सिलने तक यदि समय की बात करें तो दो आदमी एक दिन में खिंद या खन्दोल्हु तैयार कर सकते थे। पहले हर गांव, इलाके, हर समाज में मिलकर कार्य करने का प्रचलन था जिसे ‘ज्वारी’ कहा जाता है। जब किसी के घर में विवाह, उत्सव, जन्मदिन या अन्य कार्यक्रम आने वाला होता था तो घर में मेहमानों के सोने, ठहरने के लिए जब लगता कि बिस्तरों की कमी पड़ेगी तो वे खिंद व खन्दोल्हु बनाने के लिए ‘ज्वारी’ करते थे। इसमें उनका कार्य उचित समय पर आसानी से हो जाता था और आगंतुकों को भी कोई परेशानी नहीं होती थी। बता दें उस समय टैंट हाउस का दूर-दूर तक कोई भी प्रावधान नहीं था।
आसान नहीं खिंद की धुलाई
धरती पर मंजरी के ऊपर बिछाने और ओढऩे तथा पूरे वर्ष भर इस्तेमाल करने के बाद जब खिंद व खन्दोल्हु मैले हो जाते थे तो इन्हे धोना भी एक जटिल कार्य था। ये क्योंकि बहुत सारी परतों से बना एक मोटा कपड़ा था इसलिए इसे धोने के लिए अत्याधिक पानी के साथ वॉशिंग सोडा, डिटरजेंट की आवश्यकता रहती थी। साथ ही इसमें डिटरजेंट भी उचित मात्रा में मिला होना चाहिए। डिटरजेंट की अंदर तक खपत के लिए खिंद व खन्दोल्हु को पानी से खूब भिगोया जाता था ताकि वह इनके अंदर तक सही तरीके से पहुंच सके। इन्हे धोने की शुरुआत में पूरी खिंद व खन्दोल्हु में डिटजेज़्ंट छिडक़ा जाता फिर उन्हे हर तह के साथ फोल्ड किया जाता। इनके हर फोल्ड में डिटजेज़्ंट छिडक़ा जाता। इन्हे फिर कुंछ दिनों तक कुरझणे (जब तक मैल आसानी से निकलने लायक न बने) के लिए फोल्ड करके रख दिया जाता था। यदि डिटजेज़्ंट नहीं होता था तो डोडे (रीठा) को पीसकर इस्तेमाल में लाया जाता था। यही नहीं, इन्हे धोने के लिए राख का भी इस्तेमाल किया जाता था।
बुजुर्गो का हर्बल तरीका
जब न रीठा हो, न ही डिटरजैंट, न ही वॉशिंग सोडा तो उसके लिए बुजुर्गों ने एक बहुत ही बढिय़ा तरीका खोज निकाला था। यह था खिंद-खन्दोल्हु को पशुशाला में पशुओं के नीचे बिछा देना और फिर उन्हें घास से ढक देना। ये कई दिनों तक पशुओं के नीचे ही पड़े रहते थे। इनके ऊपर पशु गोबर और गौंत्र बराबर करते रहते थे। यह प्रक्रिया डिटरजैंट, वॉशिंग सोडा और रीठा का ही रोल अदा करती थी। जब कुछ दिनों तक गौंत्र से भीगने के बाद इन्हें निकाला जाता तो यह पूरी तरह से पशुओं के गौंत्र से सने हुए होते। ये उस समय बहुत भारी होते। लेकिन इस प्रक्रिया से इन खिंदों में गौंत्र आदि की वास पड़ गई होती थी। अब उनका धुलना लाजमी हो जाता था। धोने के लिए खुला पानी चाहिए होता था। इन्हे धोने के लिए घर के पास में बहने वाली साफ पानी की खड्ड या नाले की ओर प्रस्थान करते थे।
पशुओं से लिया जाता काम
भारी-भरकम खिंद व खन्दोल्हुओं को खड्ड तक ले जाने के लिए एक- दूसरे के कंधों पर लकड़ी के सहारे दो आदमी उठाकर ले जाते थे। जब इन्हे उठाने के लिए आदमी न मिलते तो इसका एक और बेहतर विकल्प था भैंस या कट्टु। इन जानवरों को जब चराने के लिए ले जाते तो वे इनको उनके ऊपर लादकर खड्ड तक पहुंचाते थे। वहां साफ पानी में इन्हे खूब तसल्ली के साथ पैरों, हाथों से मरोड़-मरोडक़र या फलटी से पीट-पीटकर धोते। धोने और छलने के बाद फिर इन्हे पत्थरों के ऊपर सूखने के लिए रख दिया जाता था।
खास मौसम में धुलती खिंद, रिपेयर भी मांगती
शाम को वापसी पर फिर इन्हें घर लाकर किसी तार या फिर लकड़ी आदि के ढेर के ऊपर कुछ दिनों के लिए उस जगह पर सूखने के लिए रख दिया जाता था जहां धूप अच्छी तरह से आती हो। बता दें कि इनको धोने का उचित समय गर्मी और बरसात का मौसम था। सूखने के बाद हर वर्ष फटी हुई खिंद व खन्दोल्हुओं की रिपेयर करना भी इसी का ही एक हिस्सा था।
इसलिए धोनी पड़ती खिंद
पुराने समय में खिंद-खन्दोल्हु हर घर में मौजूद रहते थे। उस समय चारपाइयां नहीं होती थीं। सभी परिवारजनों का सोना अमुमन धरती पर ही होता था। इसलिए खिंद-खन्दोल्हु धरती पर ही खजरे या पराली की मंजरी के ऊपर ही बिछाई और ओढ़ी जाती थी जिस कारण उसका जल्दी मैला होना स्वाभाविक था।
खिंद रखने की जगह
सुबह उठकर सभी खिंद व खन्दोल्हु को घर में बनी एक खास जगह पर टांग देते थे। छत की कडिय़ों के साथ मजबूत रस्सियों के सहारे एक सीधी, साफ और मजबूत लकड़ी को क्षैतिज स्थिति में टांगा गया होता था जिस पर सभी खिंद-खन्दोल्हुओं को लाद दिया जाता था। आज की तरह उस समय इन्हे रखने के लिए बैड-बॉक्स या बड़ी-बड़ी अलमारियां नहीं हुआ करती थी। छोटे संदूक होते थे जिनमें कपड़े या दूसरा कोई अन्य खाने-पीने वाला सामान ढककर रखा जाता था।
गर्मी में ठंडी, सर्दी में गर्म
मंडी जिला के महादेव गांव के बुजुर्ग चेतराम जी के अनुसार, ‘बेशक, आज की रजाई, तलाई और गद्दे की भांति खिंद-खन्दोल्हु थोड़े भारी होते थे, लेकिन इनका उपयोग बहुत स्वास्थ्यवर्धक था। ये सर्दी में गर्म और गर्मी में ठंडक का अहसास कराते थे।’
रचनाओं में खिंद-खन्दोल्हु
हिमाचल में खिंद व खन्दोल्हु कहावतों (जैसे- जुंआ पीछे खींद नी फुकणी), लोकगीतों, कथाओं में तो शामिल है ही। इसके अलावा खिंद-खन्दोल्हु को कवियों ने अपनी कविताओं में जिस खूबसूरती के साथ रचा है वह काबिलेतारीफ है। उनके लिए खिंद व खन्दोल्हु मात्र एक बिछौना या ओढऩे मात्र की वस्तु नहीं, बल्कि कई संवेदनाओं की परतों का समूह है। हिमाचल के यायावर और कवि रतन चंद निर्झर की कविता में ‘खिंद’ कुछ इस तरह से अपनी उपस्थिति देती है-
मां जब भी
उधेड़ती है
फटी पुरानी खिंद
हर नगंदों लीरो के साथ
चुपचाप करती है बातचीत
आंखों में घिर आता है
यादों का खारा जल
भीग जाता है चादरु का कोना…..
…………………………………….
मैं जान गया था
मां क्यों रोती है
खिंद उधेड़ती बार
मां देखती है अपनी आंखों से
पीढ़ी दर पीढ़ी का इतिहास।
कवि प्रभात शर्मा ने भी खिंद को अपनी पहाड़ी कविता में बहुत बेहतरी से रचा है। वे बताते हंै कि दिल्ली विश्वविद्यालय के एक शोघार्थी ने अपने शोघ के लिए उनकी कविता को मांगा था। यह बात खिंद के महत्व और उसके विज्ञान को दर्शाती है। इस पहाड़ी कविता की एक बानगी देखिए-
रंग वरंगे पुराणे कपड़े
चिट्टे धागै अपुचै जकड़े।
गुदड़ भरी ने खिन्द बणाई
ये है भाइयो गरीबां दी रजाई।
……………………………………….
‘प्रभात’ तु बी खिन्दा दी कदर जाण
थलैं बछा जां ऊपर ताण
कडक़ तौंन्दी जां ठंडे ठाण
खिन्द बचान्दी सबनी दे प्राण।
अब किताबों में पढि़ए खिंद
आज खिंद और खन्दोल्हु बहुत ही कम या कहें न के बराबर ही उपयोग में लाई जाती है। लेकिन वर्तमान में इन्हे ओढऩे के लिए तो नहीं बिछाने के लिए कई घरों में इस्तेमाल किया जाता है। अब इन पुराने कपड़ों से मशाीनों द्वारा गद्दे आदि ही बनाए जाते हैं या फिर चद्दरें। आज मनुष्य के पास हर सुविधा है। उसे अब कई प्रकार की नरम व गरम रजाइयां बाजार में आसानी से मिल जाती हैं। वह अब खिदों और खन्दोल्हुओं को अपने ऊपर ओढऩे व बिछााने में शर्म और दिक्कत महसूस करता है। लेकिन आज का बुजुर्ग अब भी इनके महत्व को भलिभांति समझता है। ये उस जमाने में लोगों के सच्चे, पक्के, मीठे और संतुष्ट नींद के गवाह थे। आज जब भी कहीं खिंद-खन्दोल्हु बुजुर्गों को दिख जाते हंै तो ये उन्हे उस अतीत की सुनहरी यादों में ले जाते हैं, जब दिन भर के कार्यों की थकान के बाद ये उन्हे अपनी पनाह में लेकर मीठे सपनों की सैर पर ले जाते थे।
– पवन चैहान, गांव व डॉ. महादेव, तहसील-सुन्दरनगर, जिला-मंडी
हिमाचल प्रदेश- 175018
मो0: 098054 02242, 094185 82242

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2 thoughts on “पहाड़ की कहावतों और कविताओं में सिमट कर रह गई सर्दी में गर्मी, गर्मी में ठंडक देने वाली ‘खिंद’, पीढ़ी दर पीढ़ी का इतिहास समेटे रहती है ‘खिंद’

  1. Purane time ki yaad dila di main jahan rehta hun bahan to ni hoti yh pr jab bhi main nani ghr jata to bahan main yhi bolta ki rzai ni chahiye khind he do usme mja aata
    Ek chiz or hoti bahan usko bolte “Bandri” uske upr sona or upr se khind yaad aa gyi aaj bo dino ki thanks to share sir.

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