‘पहाड़ी कलम’ के ‘माणिक’- मनाकु ने रंगों में ढाल दी जयदेव की गीत गोविदम्, 12वीं सदी की साहित्यिक रचना को 18वीं सदी में चित्रकला में अनुवाद करने का बिरला उदाहरण

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‘पहाड़ी कलम’ के ‘माणिक’- मनाकु ने रंगों में ढाल दी जयदेव की गीत गोविदम्, 12वीं सदी की साहित्यिक रचना को 18वीं सदी में चित्रकला में अनुवाद करने का बिरला उदाहरण
गुलेर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
आप जानते हैं कि ‘गीत गोविन्दम’ 12 अध्यायों वाला एक गीति काव्य है, जिसे चौबीस भागों में विभाजित किया गया है। इसके रचयिता 12वीं शताब्दी के अमर कवि जयदेव हैं। इस कृति में रचयिता ने धार्मिक उत्साह के साथ श्रृंगारिकता का सुन्दर संयोजन किया है। इसमें राधा और कृष्ण की प्रेम लीला और उनके अलगाव की विरह-वेदना का वर्णन किया गया है। कवि ने संगीत और नृत्य की अपनी प्रवीणता, भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति, ज्ञान और श्रृंगार के प्रति अपनी समझ का चित्रण किया है। क्षेत्रीय संस्करणों एवं अनूकृतियों के अलावा इस कृति पर चालीस से भी अधिक टीकाएं उपलब्ध हैं। इसका भारत की सभी भाषाओं में अनुवाद होने के साथ कई यूरोपीय भाषाओं में भी अनुवाद किया गया है। 12वीं सदी में संस्कृत में रचि गई इस अमर कृति को छह सौ साल बाद 18वीं सदी में गुलेर रियासत के महान चित्रकार मनाकु ने रंगों में ढालने का अदभुत काम कर दिखाया था। बेशक पहाड़ी कलम के इस ‘माणिक’ के बारे में पहाड़ की नई नस्लें कम जानती हों, लेकिन यह ऐतिहासिक तत्थ है कि विलक्षण चितेरे मानकु ने रामायण पर आधारित लंका की घेरेबंदी और भागवत् पुराण की कथाओं को चित्रों की जुबानी पेश कर कला की दुनिया को अनूठा उपहार दिया है।
मनाकु ने रंगों में उतार दी जयदेव की परिकल्पना
12वीं सदी में संस्कृत के पदों में रची गई ‘गीत गोविंदम्’ पर आधारित 1730 के आसपास रचे गए माणकू के चित्र राधाकृष्ण के प्रेम की गहरी भक्तिपरक एकात्मकता का प्रमाण हैं। चित्रों में दर्ज साक्ष्य के हिसाब से राज परिवार की एक महिला मालिनी के आदेशानुसार इन चित्रों की रचना की गई। राधा और कृष्ण की प्रेम लीलाओं और उनके अलगाव की विरह-वेदना, संगीत और नृत्य की की प्रवीणता, भगवान विष्णु के प्रति भक्ति, ज्ञान और श्रृंगार के प्रति कवि जयदेव की समझ को मनाकु के चित्रों में महसूस किया जा सकता है। मानकू के रंगों की जादूगरी देखिए कि आदर्श भक्त के रूप में कवि जयदेव को भी अपने चित्रों में उतार लाए।
पिता के पदचिन्हों पर लाडले
18 वीं सदी में मुगल साम्राज्य बिखराव की ओर था और बाहरी हमले बढने लगे थे। दिल्ली के कलाकरों की बिरादरी बेजार हो गई। कई कलाकार जीवनयापन दूसारी रियासतों के कला प्रेमी राजाओं के आश्रय में जा बसे। चितेरे पंडित सिउ गुलेर के राजा दलीप सिंह के समय में गुलेर में बस गए। उन्होंने रामायण पर आधारित चित्र श्रंृखला का निर्माण किया। राजा दलीप सिंह की मृत्यु के बाद पडितं. सिउ और उनके दोनों बेटे नैनसुख और मनाकु कांगड़ा के महाराजा संसारचंद कटोच के दरबार में आ गए। पिता के बाद बेटों ने भी चित्रकला को नया शिखर दिया। मानकु के छोटे भाई नैनसुख बाद में जम्मू दरबार में जा बसे, लेकिन मनाकु और उनके बेटे कौशल और पलटू कांगड़ा सियासत के चितेरे रहे।
‘मनाकु ऑफ गुलेर’में पढिय़े कला की उड़ान
पहाड़ी कलम के विश्वप्रसिद्ध जानकार डॉ. बीएन गोस्वामी ने अपनी पुस्तक ‘मनाकु ऑफ गुलेर’ में मानकू के कला के संसार को समझने के लिए न केवल उनकी कृतियों को गहरे से समझने की काशिश की, बल्कि इस चित्रकार के जीवन को करीब से जानने की उनकी ललक उन्हें हरिद्वार तक ले गई। उन्होंने तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद हरिद्वार में सरदारी राम राखा के बही खाते में मानकू के बारे में विवरण ढूंढ निकाला। डॉ गोस्वामी लिखते हैं कि मानकू विलक्षण कलाकाkर था और बाएं हाथ से चित्र बनाता था। राधा को तिलक देते कृष्ण के चित्र में यह झलकता है। डॉ गोस्वामी की किताब में जहां मनाकु और उनके चित्रों का ब्योरा है, वहीं उनके बारे में विभिन्न विद्वानों की राय भी है। डॉ गोस्वामी मनाकु के भाई नैनसुख पर भी पुस्तक लिख चुके हैं।

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