पवित्र मणिमहेश झील पर स्नान से पहले जरूरी हैं डूग्गा सार में माता भरमाणी के दर्शन, ब्रह्मा की पुत्री ब्रह्माणी के नाम पर बसा था ब्रह्मपुर

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पवित्र मणिमहेश झील पर स्नान से पहले जरूरी हैं डूग्गा सार में माता भरमाणी के दर्शन, ब्रह्मा की पुत्री ब्रह्माणी के नाम पर बसा था ब्रह्मपुर
भरमौर से लौट कर कपिल मेहरा की रिपोर्ट
देवभूमि हिमाचल में हजारों ऐसे मंदिर हैं, जिनकी अपनी अलग ही महत्ता और पहचान है। चंबा जिले के भरमौर में अगर आप शिव धाम चैरासी या मणिमहेश के दर्शन करना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको माता ब्रह्माणी अर्थात भरमाणी के दर्शन करने चाहिए। ऐसा माना जाता है कि चैरासी मंदिर या मणिमहेश यात्रा से पहले माता ब्रह्माणी के दरबार में हाजिरी लगाना जरूरी है, क्योंकि, कभी ब्रह्मपुर के नाम से प्रख्यात भरमौर में ब्रह्मा की पुत्री ब्रह्माणी का वास हुआ करता था। भगवान भोले नाथ ने माता ब्रह्माणी को यह वरदान दिया था कि जो भी व्यक्ति मेरे दर्शन के लिए मणिमहेश आएगा, वह पहले माता ब्रह्माणी के दर्शन करेगा, तभी उसकी यात्रा सफल होगी।
डूग्गा सार में बना है मंदिर
भरमौर की पहाड़ियों के एक छोर पर डूग्गा सार नामक स्थान पर स्थापित माता ब्रह्माणी के दर्शनार्थ के लिए यूं तो साल भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन मणिमहेश यात्रा के दौरान तो यहां लोगों का तांता लग जाता है और लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है। हालांकि, आजकल कोरोना महामारी के चलते मंदिर में आवाजाही बंद है। कहा जाता है कि माता ब्रह्माणी को नवदुर्गा में ब्रह्मचारिणी का रूप स्वीकारा गया है और माता ब्रह्माणी के नाम पर ही ब्रह्मपुर यानी भरमौर की स्थापना हुई थी। मंदिर के पुजारी रवि कुमार शर्मा का कहना है कि माता ब्रह्माणी भरमौर वासियों की कुलदेवी है और यहां पर साल भर यज्ञों एवं भंडारों का आयोजन होता रहता है।
शिव के अनुरोध पर बदला स्थान
कहा जाता है कि माता ब्रह्माणी कभी चैरासी मंदिर भरमौर के प्रांगण में विराजमान हुआ करती थी। माता ब्रह्माणी यहां स्थित एक विशालकाय देवदार वृक्ष के समीप तपस्या किया करती थी। माता ब्रह्माणी ब्रह्मा की बेटी है। एक दिन स्वयं भगवान भोलेनाथ अपने 84 सिद्धों के साथ यहां आए और इस स्थान पर एक रात बिताने के लिए यहां रूक गए। माता ब्रह्माणी जब भ्रमण के बाद यहां लौटी तो यहां विराजमान 84 सिद्धों को देखकर क्रोधित हो उठीं। माता के पूछने पर भगवान भोले नाथ स्वयं प्रकट हुए और कहा कि माता निराश न हों मेरे ये 84 सिद्ध केवल एक रात यहां ठहरेंगे। लेकिन, सुबह होने पर माता ने देखा कि उसके परिसर में 84 सिद्धों के स्थान पर 84 शिवलिंग स्थापित हो गए हैं। माता के क्रोधित होने पर भोलेनाथ पुनः प्रकट हुए और माता ब्रह्माणी से कहा कि अब यह स्थान चैरासी धाम के नाम से प्रख्यात होगा और माता आप किसी दूसरी जगह पर चली जाएं। उन्होंने माता ब्रह्माणी को वरदान दिया कि आज के बाद जो भी भक्त मेरे दर्शन के लिए चैरासी धाम या मणिमहेश यात्रा के लिए आएगा वह सबसे पहले माता ब्रह्माणी के दर्शन करेगा तभी उसकी यात्रा संपूर्ण मानी जाएगी।
कुंड में स्नान करने से दूर होती व्याधियां
भोले नाथ के इस वचन के साथ माता ब्रह्माणी डूग्गा सार नामक स्थान पर चली गईं। भरमौर की उंची पहाड़ी पर स्थित इस स्थान से 84 मंदिर बिल्कुल नहीं दिखता है। क्योंकि माता ने कहा था कि अब मैं ऐसे स्थान पर डेरा जमाउंगी जहां से चैरासी परिसर बिल्कुल भी दिखाई न दे। तभी से लोग इस स्थान को भरमाणी कह कर भी पुकारते हैं। मंदिर के पुजारियों के अनुसार मंदिर परिसर में माता के चरणों से होकर निकलने वाला जल एक कुंड में एकत्रित होता है और इसमें स्नान करने से लोगों की कई व्याधियां दूर होती हैं। यह भी माना जाता है कि कुंड के शीतल जल से स्नान करने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। खासकर मणिमहेश यात्रा के दौरान यहां लोगों को लाइनों में लगकर कुंड में स्नान करना पड़ता है और माता ब्रह्माणी के दर्शन के लिए भी लंबी कतारें लगती हैं। इस दौरान यहां 24 घंटे निःशुल्क लंगर की सुविधा समाजसेवी संगठनों की ओर से उपलब्ध करवाई जाती है। यह मंदिर ट्स्ट के अधीन है और यहां पर ठहरने के लिए लोगों के सहयोग से सराय का निर्माण भी करवाया गया है।
हर तरफ मनमोहक है नजारा
माता ब्रह्माणी मंदिर के लिए पैदल यात्रा के दौरान गांव मलकौता में लकड़ी से निर्मित प्राचीन मकान लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। खास बात यह है कि इन लकड़ी के मकानों के नीचे लोग अपने पशु बांधते हैं और पहली मंजिल पर आवास रखते हैं। हालांकि, समय के बदलाव के कारण कई लोगों ने पक्के मकान भी बनवाने शुरू किए हैं, लेकिन ये भी छतनुमा ही बनाए गए हैं। इसके साथ ही भरमौर के हैलीपैड से जब हम गांव की चढ़ाई शुरू करते हैं तो एक छोर पर सेब के बगीचे और देवदार के वृक्ष इसकी सुंदरता को चार चांद लगाते हैं। गांव में कहीं-कहीं अखरोट, खुमानी और नाशपाती के पेड़ भी लगे हैं। गांव के एक छोर पर हनुमान जी का मंदिर भी स्थापित है, जहां पर सुबह-शाम पूजा अर्चना होती है।
ऐसे पहुंचे माता के मंदिर
चंबा से 62 किलोमीटर दूर भरमौर पहुंचने पर यहां से अगर पैदल जाना होतो वाया मलकौता गांव होकर हम अढ़ाई-तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर माता ब्रह्माणी के मंदिर पहुंच सकते हैं। वहीं, गाड़ी या दोपहिया वाहन से भी वाया संचूई या मलकौता से होकर माता भरमाणी के मंदिर पहुंचा जा सकता है।
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(कपिल मेहरा, गांव व डाकखाना जवाली, जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश। मोबाइल नंबर 9816412261)

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