धार्मिक पर्यटन – यहां कुदरत ने खुद किया मंदिर का निर्माण, खुद निर्मित होती हैं रयस्यमयी पींडियां, सुल्याल़ी के डिंबकेश्वर महादेव

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धार्मिक पर्यटन – यहां कुदरत ने खुद किया मंदिर का निर्माण, खुद निर्मित होती हैं रयस्यमयी पींडियां, सुल्याल़ी के डिंबकेश्वर महादेव
गुलेर से नंदकिशोर परिमल की रिपोर्ट
प्राकृतिक गुफा परिसर में सैंकड़ों पिंडियां कुदरती पिंडियां रूप में बनी हुई हैं। ये रहस्यमयी पिंडियां खुद ही निर्मित होती हैं और अनेकों अपने ही विलुप्त होती रहती हैं। यह क्रम आज से नहीं, बल्कि युग युगांतरों से चल रहा है। पहाड़ की छत से झर— झर करती निर्मल जलधाराएं निरंतर इन सभी पिंडियों का जलाभिषेक करती रहती हैंं। सर्दियों में भारी धुंध के कारण इस गुफा का प्राकृतिक दरवाज़ा पूरी तरह बंद दिखता है। इस प्राकृतिक दृश्य को देखकर हर कोई बेसुध और मंत्रमुग्ध रह जाता हैं। कांगड़ा जिला की नूरपुर तहसील में स्थित सुल्याल़ी गांव की पहचान वहां के डिंबकेश्वर महादेव से है। इस कुदरती मंदिर से इस गांव की पहचान प्रदेश, देश और विदेश में बनी हुई है। यह गांव नूरपुर चंबा मार्ग पर स्थित है । विराजमान इस आलेख में डिंबकेश्वर महादेव के प्राकृतिक मंदिर के रहस्यों से पर्दा उठाने की कोशिश करेंगे।
खड्ड के किनारे एकांत गुफा में मंदिर
सुल्याल़ी गांव से लगभग 300 फीट नीचे गहराई में खड्ड के किनारे एकांत स्थान पर स्थित बेहद पुराना अलौकिक अति सुन्दर डिंबकेश्वर महादेव का मंदिर अनोखा अजूबा है। इसका वर्णन कलम की शक्ति से परे है। ऐसा सुंदर नैसर्गिक स्थान आपने शायद ही पहले कभी देखा होगा और शायद ही इसकी परिकल्पना की होगी । यहां एक बार आप पहुंच गए तो आपका मन लौटने को करेगा ही नहीं। यह मंदिर किसी मानव के प्रयास से नहीं बनाया, गया बल्कि गुफानुमा मंदिर रहस्यमयी ढंग से प्रकृति की अनूठी देन है ।
कहते हैं हरिद्वार में निकलता है जल
त्रिलोकेश महाराज की इस करामाती गुफा से थोड़ी ऊंचाई पर दाईं ओर एक अन्य कई मीटर लंबी गुफा स्थित है, जिसमें झर झर करता निर्मल स्वच्छ जल प्रवाह होता रहता है। यह जल कहां जाता है, किसी को भी पता नहीं। कहते हैं यह हरिद्वार में निकलता है। इस दृश्य को देखकर यूं लगता है मानों गंगाधर की जटाओं से स्वयं मां गंगा प्रवाहित हो रही हो। यह मनमोहक दृश्य अवर्णनीय है ।
कान्हां ने चराई यहां गऊएं
किवदंती के अनुसार द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण डिंबकेश्वर धाम में गुप्त रूप से गौएं चराने यहां आते थे। सतयुग में यह स्थान गौधाम नाम से विख्यात था। यहां आज भी शीतला, चिंतापुरनी और सरस्वती देवियां गुप्त रूप से वास करती हैं ।
डिंबकेश्वर महादेव के समीप नीचे लगभग बीस फीट की ऊंचाई से निर्मल झरना कुंडनुमा स्थान पर गिरता है जिसे घडय़ाल कहते हैं। किंवदंती के अनुसार एक सिद्व महात्मा ने इस घडय़ाल में डुबकी लगाकर यहां जलसमाधि ले ली थी। कहते हैं इसी कारण इस स्थान का नाम डिंबकू पड़ गया।
चेचक के रोगी करते थे स्नान
मान्यता है कि घडय़ाल में एक डुबकी लगाकर मनुष्य के जन्म जन्मांतरों के सभी पाप धुल जाते हैं । ऐसी भी मान्यता है कि पूर्व काल में चेचक जैसी भयंकर महामारियों से छुटकारा पाने के लिए लोग घडय़ाल के पवित्र जल और डिंबकेश्वर महादेव की शरण में आते थे और निरोगी हो कर लौटते थे । यही नहीं, जिज्ञासुओं की जिज्ञासा यहां आकर शांत होती है और तत्वज्ञान की लालसा रखने वाले महापुरुषों को तत्वज्ञान प्राप्त होता है।
त्यौहारों पर होती है रौनक
यूं तो यह एकांत स्थान मानो महादेव की तपस्या करने के लिए महात्माओं की तपोभूमि है, जो रोजमर्रा की जिंदगी के शोर शराबे से एकदम दूर है । विशेष अवसरों जैसे नवरात्रि, शिवरात्रि आदि अनेक त्यौहारों पर दूर – दराज के स्थानों से भारी भीड़ यहां जुटती है। श्रद्धालु घडय़ाल के पवित्र जल में स्नान कर के डिंबकेश्वर महादेव की पिंडियों में नतमस्तक हो कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।
महात्मा करते मंदिर की संभाल
इस अनुपम स्थान की देखरेख स्थानीय लोगों के सहयोग से यहां रहने वाले महात्मा लोग ही करते हैं। सिध्द योगी महात्मा इस स्थान पर घोर तप साधना में जीवन व्यतीत करते हुए यहां आने जाने वाले श्रध्दालुओं के लिए सुविधा उपलब्ध कराते हैं । सन् 1455 से अब तक आठ महातेजस्वी महात्माओं ने यहां शिव अराधना करते हुए अमरत्व प्राप्त किया है। इन सभी महात्माओं की समाधियां यहां सुशोभित हैं। वर्तमान में बाबा दिनेश गिरि महाराज सन 2006 से इस स्थान पर विराजमान हैं।
नरवदेश्वर लिंग की स्थापना
हाल ही में स्थानीय गांव के पूर्व न्यायाधीश बीडी शर्मा ने नर्वदा से मंगवाए गए विशेष शिवलिंग ‘नर्वदेश्वर महादेव’ के नाम से स्थापना की गई है। यह शिवलिंग यहां आने वाले श्रध्दालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन गया है ।
सरकार और पर्यटन विभाग से अपेक्षाएं
हिमाचल प्रदेश की सरकार तथा पर्यटन विभाग से अपेक्षा की जाती है कि इस स्थान को विशेष रूप से विकसित किया जाए ताकि अधिक से अधिक श्रध्दालुओं और देश विदेश के पर्यटकों को आकर्षित किया जा सके। विडंबना की बात तो यह है कि पर्यटन विभाग मात्र औपचारिकताएं निभा कर अपने पावन कत्र्तव्य से इतिश्री कर लेता है ।सरकार को न तो ऐसे मनमोहक स्थानों की सूचना देता और न ही उनके विकास के लिए उचित बजट की मांग करता ।
संपर्क -: नंदकिशोर परिमल, सेवा निवृत्त प्रधानाचार्य
सत्कीर्ति निकेतन गुलेर, तह. देहरा, जिला. कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश पिन 176033
मोबाइल : 9418187358

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