धरोहर: कहीं चंचल सरोलवी की कैसेटों और डायरियों में कैद होकर न रह जाए चंबा जनपद लोक गायन, सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए लगा दिए जीवन के चालीस साल, चंबा के लोकसंगीत का बिरला कल्चर एक्टिविस्ट

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धरोहर: कहीं चंचल सरोलवी की कैसेटों और डायरियों में कैद होकर न रह जाए चंबा जनपद लोक गायन, सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए लगा दिए जीवन के चालीस साल, चंबा के लोकसंगीत का बिरला कल्चर एक्टिविस्ट
चंबा से विनोद भावुक की रिपोर्ट
चंबा जनपद के लोकगीत और लोककथाएं जितने मार्मिक और कर्णप्रिय हैं, उतनी ही इस जनपद में सदियों से गाई जाती रहीं शिव, राम चंद्र और कृष्ण की भक्ति गाथाएं अध्यात्म की गहन अनुभूति का एहसास करवाती हैं। आधुनिकता की दौड़ में जब लोकसंगीत बीते जमाने की बात होने लगा है, संगीत का एक साधक पिछले चालीस साल से चंबा के लोकसंगीत के संरक्षण में जुटा है। चंबा के कल्चरल एक्टिविस्ट चंचल सरोलवी चार दशक से चंबा लोक संस्कृति के विभिन्न आयामों लोकगीत, लोक गाथा गीत, रामायण, महाभारत, शिव पुराण, नाग लीला लोक कथा को लेखन और ऑडियो कैसेट्स के रूप में संरक्षित करते आ रहे हैं। उनके इस खजाने में चंबा के ऐसे पुराने लोकगीत मौजूद हैं, जो अब कहीं सुनाई नहीं देते।
चंचल सरोलवी चाहते हैं कि इस सांस्कृतिक विरासत का पुस्तकों के रूप मेंं संरक्षण हो, लेकिन धनाभाव के चलते वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि कहीं चंबा जनपद लोक गायन चंचल सरोलवी की कैसेटों और डायरियों में कैद होकर न रह जाए।
कई लोकगायकों के किंग मेकर रहे सरोलवी
चंचल सरोलवी ने चंबा के पहाड़ी लोकसंगीत को नई पहचान दी है। उन्होंने लोकगीत को जनमानस तक पहुंचाने के लिए ‘सीता कैसेटÓ शाम म्यूजिक कंपनी सहित हिमाचल प्रदेश की कई म्यूजिक कंपनियों के साथ दर्जनों ऑडियो- वीडियो कैसेटें बनाकर बाजार में उतारीं। उनके ख्ुाद के रचे कई गीतों ने तहलका मचा दिया। चंचल सरोलवी ने कई लोक गायकों को मंच भी प्रदान किया। वे चंबा जनपद की लोकसंस्कृति व लोकगायन को समझने के लिए गहरे उतरे। अब उन्होंने चंबा की लोक संस्कृति को जनमानस तक पहुंचाने के लिए अपना यूट्यूब चैनल ‘हिमाचली लेटेस्ट रिकॉड लॉन्च किया है।
अभावों में बीता बचपन
चंबा शहर के साथ सटे गांव सरोल में श्री रतन चंद और श्रीमती नेनो देवी के घर पैदा हुए चंचल सरोलबी का बचपन आर्थिक तंगी में गुजरा। स्कूल सरकारी स्कूल सरोल से आठवीं कर सीनियर सेकेंडरी स्कूल कियाणी से मेट्रिक करने के लिए दाखिला लिया। इसी बीच में उनकी माता गंभीर रूप से बीमार हो गईं। मां की बीमारी के कारण उसे बीच- बीच में स्कूल छोडऩा पड़ता था। भाई- बहनों और माता के लिए खाना बनाना और उनकी देखभाल करना चंचल के जिम्मे आ गया। पढ़ाई ठीक नहीं कर पाने के कारण मैट्रिक में फेल हो गए, फिर प्राइवेट स्टूडेंट के तौर पर मेट्रिक पास कर हाई सेकेंडरी पार्ट 1 में दाखिला लिया। इसी दौरान लैब टेक्नीशियन के तौर पर सेलेक्शन हो गई।
कोरिया और चीन तक दिखाया हुनर
चंचल को बचपन से ही संगीत से लगाव था। स्कूल स्तर पर जिला और राज्यस् तरीय सांस्कृतिक कार्यक्रमो में प्रथम स्थान प्राप्त किया। लोक कला मंच चंबा के माध्यम से सांस्कृतिक दल के साथ कार्यक्रम किए। बांसुरी, ढोलक, नगाड़ा बजाने में माहिर चंचल को प्रदेश भाषा एवं संस्कृति विभाग तथा भाषा कला संस्कृति अकादमी की ओर से भारत के लगभग सभी राज्यों अपनी कला का हुनर दिखाने का अवसर मिला। दिल्ली दूरदर्शन पर भी उनके हुनर का प्रसारण हुआ। भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल और भारतीय सबन्ध परिषद के सौजन्य से साल 1986 में सांस्कृतिक दलों के साथ दक्षिणी कोरिया और चीन में अपनी संस्कृति को प्रदर्शित करने का अवसर मिला।
लेखन में हासिल की महारत
चंबा के प्रसिद्ध साहित्यकार हरी प्रसाद ‘सुमन, रणपतिया जी, भगत राम दिवेदी, हरीश चंद्र और चमनलाल ‘चमन से प्रेरित होकर चंचल सरोलवी ने लिखना शुरु किया। दैनिक वीर प्रताप से लिखने की पहल हुई। पहली कविता हिंदी में ‘धुंधली सी परछाई 5 सितंबर 1984 को प्रकाशित हुई। फिर लेख व कहानियां प्रकाशित होने लगे। साल 1990 में डॉक्टर विद्या चंद ठाकुर ने जिला भाषा अधिकारी का कार्यभार संभाला तो पहाड़ी में लिखने की प्रेरणा मिली। हिंदी और पहाड़ी में साहित्यिक सांस्कृतिक लेख, कविताएं सोमसी, हिमभारती, बागर, जनपक्ष मेल, गिरिराज, चंबा डायरी, इतिहास दिवाकर, वीर प्रताप, पंजाब केसरी, दैनिक जागरण, दिव्य हिमाचल में प्रकाशित होने लगे।
ंपारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संगीत- साहित्य साधना
चंचल सरोलवी ने नवंबर 1986 में मेडिकल सीनियर लैब टेक्नीशियन पद पर डलहोजी में सर्विस जॉइन की। उन्होंने पांगी, चुराह, सलूणी, डलहोजी, व भटिभात में सेवाएं प्रदान की। मेडिकल कॉलेज चंबा से चीफ लैब टेक्नीशियन पद से कार्यभार मुक्तहुए। साल 1991 मैं पिताजी के स्वर्गवास होने पर घर की जिम्मेदारी उन पर आ गई। परिवार को संभालते हुए सभी भाई- बहनों की शादियां भी करवाई। मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद इमानदारी से सरकारी सेवाएं देने के साथ चंचल सरोलवी संगीत और साहित्य साधना में जुटे रहे। वे आज भी उसी ऊजा व उत्साह से अपने मिशन में जुटे हैं।

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