दो करोड़ पचास लाख पहले के जीवन की गवाही देता सुकेती फॉसिल पार्क, जिस स्थान पर मिले जीवाश्म, वहीँ स्थापित किया संग्राहलय कनाडा के कैलगरी पार्क और अमेरिका के डायनासोर नेशनल मोन्यूमेंट्स के शिवालिक पर्वतमाला में दुनिया का तीसरा और एशिया का पहला मेरुदंडधारी जीवाश्म पार्क

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दो करोड़ पचास लाख पहले के जीवन की गवाही देता सुकेती फॉसिल पार्क, जिस स्थान पर मिले जीवाश्म, वहीँ स्थापित किया संग्राहलय
कनाडा के कैलगरी पार्क और अमेरिका के डायनासोर नेशनल मोन्यूमेंट्स के शिवालिक पर्वतमाला में दुनिया का तीसरा और एशिया का पहला मेरुदंडधारी जीवाश्म पार्क
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
शिवालिक पर्वतमाला में स्थित सुकेती फॉसिल पार्क दो करोड़ पचास लाख साल पहले के जीवन की गवाही देता है। सुकेती फॉसिल पार्क एशिया का एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां मेरुदंडधारी प्राणियों के जीवाश्मों का संग्राहलय उसी स्थान पर स्थापित गया है, जहां कभी वे मूल रूप से पाए जाते थे। कनाडा के कैलगरी पार्क और अमेरिका के डायनासोर नेशनल मोन्यूमेंट्स के साथ दुनिया का तीसरा और एशिया का पहला मेरुदंडधारी जीवाश्म उद्याम सिरमौर जिला के कालाअम्ब से पांच किलोमीटर सुकेती गांव में सौ एकड़ जमीन पर स्थित विकसित किया गया है।
ज्यूलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया करता है रखरखाव
सुकेती फॉसिल पार्क में उस युग के जीवों की वास्तविक आकार की फाइबर ग्लास की आकृतियां प्राकृतिक परिवेश में स्थापित की गई हैं। सैबरे टूथ टाइगर, हिप्पोपोटेमस, जाइंट लैंड टारटायज, जाइंट एलिफेंट, चार सींगों वाला जिराफ और घडयाल की आकृतियां प्रदर्शित की गई हैं। इस क्षेत्र और आस पास मिले जीवाश्मों को संग्रहालय में रखा गया है। इस पार्क का निर्माण ज्यूलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया में प्रदेश सरकार से मिल कर किया है और इसका रखरखाव ज्यूलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया करता है।
वर्तमान जीवन के विकास की कहानी
इस फॉसिल पार्क के जरिये दो करोड़ पचास लाख साल पहले के जीवन की परिकल्पना कर वर्तमान जीवन के विकास की कहानी को समझा जा सकता है। उस समय जब जीवन हिमयुग से गुजर रहा था, शिवालिक के स्तनधारी या तो नष्ट हो चुके थे अथवा दूसरे स्थानों की और चले गए थे। उस काल में जो जीव जीवित नहीं बचे, उनके अवशेष जीवाश्म के रूप में शिवालिक पहाड़ियों में बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं।
मानव प्रजाति का सबसे पुरातन रूप
यह जीवाश्म गवाही देते हैं कि कभी शिवालिक पहाड़ियों में घोड़े, कैटल्स, हाथी, सुअर, जिराफ, वनमानुष, हिप्पोपोटेमी, रेनोसोरस, घडियाल, लैंड टरटायज के अलावा नर वानर की प्रजातियां जिनमें मनुष्य की आदि प्रजाति ड्रायोपिथैक्स व रैमापिथैक्स (मानव प्रजाति का सबसे पुरातन रूप जिसमें चेहरे और दांत आदि विकसित हुए) का वजूद रहा है।
शिवालिक में जीवाश्मों की खोज का काम
यमुना और गंगा नदियों के बीच स्थित दोआब में साल 1830 में कैप्टन प्रोबी कायूटले ने नहर बनाने के लिए खुदाई का कार्य शुरू किया तो उस वक्त स्तनधारी जीवाश्म मिले। प्रोबी कायूटले ने जीवाश्म प्राणी विज्ञान के वैज्ञानिक हयूग फ़ैलकोनर ने दो दशक तक इस पर अध्ययन किया। कई ब्रिटिश भू विज्ञानिक इस जगह के प्रति आकर्षित हुए और वे इन जीवाश्मों को ब्रिटिश म्यूजियम के लिए ले गए।
मेरुदंडधारी जीवाश्मों का विशाल भण्डार
आजादी के बाद जियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के भू विज्ञानिकों को अपने अध्ययन के दौरान मारकंडा नदी के आस- पास शिवालिक पर्वतमाला में मेरुदंडधारी जीवाश्मों का विशाल भण्डार मिला। प्रागौतिहासिक काल के मेरुदंड जीवों के अध्ययन के लिए इसे उपयुक्त स्थल माना गया। जियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के तत्कालीन उप महानिदेशक उत्तर क्षेत्र एमके चौधरी ने प्रदेश सरकार के सहयोग से यहां फॉसिल पार्क बनाने की पहल की और दस सालों की कड़ी मेहनत के बाद साल 1971 में यह पार्क देशवासियों को समर्पित किया गया।

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