देव संस्कृति – यहां राजा जालिम सेन को अराधना से मिला मंडी का राजपाठ तो राजा विजय सेन का टूटा घमंड, अपने मूल स्वरूप में संरक्षित हो रहे नगरोटा गांव के सदियों पुराने दो मंदिर

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देव संस्कृति – यहां राजा जालिम सेन को अराधना से मिला मंडी का राजपाठ तो राजा विजय सेन का टूटा घमंड, अपने मूल स्वरूप में संरक्षित हो रहे नगरोटा गांव के सदियों पुराने दो मंदिर
मंडी के नगरोटा गांव से विनोद भावुक की रिपोर्ट
मंडी जिला के द्रंग क्षेत्र के नगरोटा गांव में स्थित दो सदियों पुराने मंदिरों को उनके मूल स्वरूप में संरक्षित करने की कवायद शुरू हो गई है। इस धरोहर के संरक्षण के लिए हिमाचल प्रदेश के भाषा, कला एवं संस्कृति विभाग ने श्री लक्ष्मी नारायण शिव मंदिर कमेटी को नौ लाख की राशि उपलब्ध करवाई है। इन मंदिरों के संरक्षण का कार्य भाषा, कला एवं संस्कृति विभाग के सेवानिवृत मुख्य अभियंता सी एल कश्यप और वास्तुकार हरिंद्र उपाध्याय के निर्देशन में हो रहा है। नगरोटा गाँव के ये मंदिर आपने आप में एक लम्बे इतिहास को संजोये हुए है। इन ऐह्तिहसिक स्मारकों के संरक्षण से प्रदेश की देव संस्कृति का भी संरक्षण हो रहा है।
मंदिरों को लेकर ऐतिहासिक सन्दर्भ
इन मंदिरों के ऐतिहासिक पक्ष का वर्णन विनोद हिमाचली द्वारा लिखित ‘मंडी राज्य की कहानी’ और रूप शर्मा द्वारा लिखित ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’ पुस्तकों में मिलता है। बताया जाता है कि नगरोटा गांव में दो अति प्राचीन मंदिरों का निर्माण द्रंग के राणा ने करवाया था। इन मंदिरों का उल्लेख राजा साहिब सेन (1534 – 1554 ई०) के शासनकाल में भी मिलता है। इन मंदिरों की पुनः प्रतिष्ठा मंदिर के राजा जालिम सेन (1826 -1839 ई०) ने करवाई थी।
द्रंग के राणा के बनवाये मंदिर
छोटी काशी कहे जाने वाले मंडी नगर से 18 किलोमीटर दूर जोगिंद्रनगर की ओर द्रंग नामक स्थान है। द्रंग से आईआईटी कमांद की तरफ जाने वाली संपर्क सड़क पर दो किलोमीटर दूर शीतल जल वाली बावड़ी, आम, पीपल, दाड़ू और बट के घने पेड़ों से सुसज्जित नगरोटा गांव के बीचोंबीच शिवजी और ठाकुर लक्ष्मी नारायण के अति प्राचीन शैली के मंदिर श्रद्धालुओं को बार-बार नगरोटा आने के लिए आमंत्रित करते हैं। बताया जाता है कि कभी मंडी राज्य के समीप का गांव नगरोटा बड़ा ही समृद्ध होता था। इसकी गलियों और सड़कों के नाम भी वही थे जो आज मंडी नगर के हैं। नगरोटा गांव में दो अति प्राचीन मंदिर है जो द्रंग के राणा द्वारा बनाए गए थे।
राजपाठ पाने के लिए जालिम सेन ने नगरोटा में की अराधना
राजा जालिम सेन का भाई ईश्वरी सेन था, जिसके निसंतान ही स्वर्ग सिधार जाने से मंडी के राज्य की राज गद्दी रिक्त हो गई। अपने जीवनकाल में जालिम सेन अपने भाई के विरुद्ध रहा और भाई के मरने के उपरांत उसने मंडी की प्रजा को यह जताने के लिए, कि वह अपने भाई का बड़ा ही आज्ञाकारी था, उसकी मृत्यु के उपरांत सारे धार्मिक कार्य संपन्न करवाए। इधर, ईश्वर सैन के वंशज भी मंडी राज्य की गद्दी प्राप्त करने के लिए काफी दौड़-धूप कर रहे थे। जालिम सेन अपने गांव हुलु लौट आया जो कि नगरोटा के समीप ही था। जालिम सेन प्राय नगरोटा आकर यहां स्थित मंदिरों में मंडी का राज्य प्राप्त करने के लिए आराधना करता रहता था। एक दिन जालिम सेन ने लक्ष्मी नारायण जी के मंदिर में आकर अपनी आराधना के उपरांत कहा, ’हे भगवान मेरी पुकार भी सुनो।‘ उसने भगवान शिव से यह प्रार्थना की कि अगर वह मंडी का राजा बन गया तो इन मंदिरों की पुनः प्रतिष्ठा करेगा।
राजा बनकर मंदिरों को किया पुनः प्रतिष्ठित
कहा जाता है कि जालिम सेन अब मंडी लौट आया और मित्र की प्रेरणा से जालिम सेन अमूल्य भेटों के साथ पंजाब के महाराजा महाराणा रंजीत सिंह के पास पहुंचा। रंजीत सिंह ने जालिम सेन से कहा कि जिस दिन वह मंडी रियासत के तीन लाख हमारे शाही खजाने में जमा करवायेंगे, उसी दिन मंडी की राजगद्दी उसकी होगी। जालिम सेन ने पूरा कर दिखाया, जिसके उपरांत रंजीत सिंह ने जालिम सेन को मंडी का राजा नियुक्त कर दिया। राजगद्दी संभालने के उपरांत खुश होकर राजा जालिम सेन हाथी पर सवार होकर नगरोटा गांव में पहुंचा तथा यहां पूजा अर्चना कर मंदिरों को पुनः प्रतिष्ठित किया।
नगरोटा में टूटा विजय सेन का घमंड
मंदिरों के संदर्भ में बताया जाता है कि एक समय मंडी का राजा विजय सेन (1851 – 1902 ) का अभिमान भी नगरोटा आकर समाप्त हुआ था। लक्ष्मी नारायण की शक्ति के परीक्षण के लिए राजा नगरोटा आया और विधि विधान से पूजा अर्चना करने के बाद जब पुजारी राजा को सुफल के रूप में पुष्प देने लगा तो राजा ने कहा कि मुझे ठाकुर के हाथों सुफल लेना है। राजा ने मूर्ति के आगे हाथ कर दिए। उसी समय मूर्ति के गले में पड़ी पुष्प माला में से एक पुष्प गिर कर राजा के हाथ में आ गया। राजा इस आश्चर्यचकित घटना के बाद मंडी लौट गए, लेकिन उसी रोज से जन साधारण में लक्ष्मी नारायण के प्रति आस्था और विश्वास और भी गहरा हो गया।
पूजा के लिए कश्मीर घाटी से बुलाये गए पंडित
कभी इस गांव के ब्राह्मण राजा के राज पुरोहित हुआ करते थे। बताया जाता है कि इन मंदिरों में पूजा अर्चना के लिए पंडित कश्मीर घाटी से विशेष तौर से बुलाये गए थे। बताया जाता है कि होली के अवसर पर लक्ष्मी नारायण को सुखपाल पर बैठा कर मसेरन गांव में स्थित महामाई चामुंडा के दरबार में ले जाया जाता था। वहां वे महामाई चामुंडा के साथ होली खेलते थे। शाम के समय सभी गांववासी चौहटा होलिका दहन की परम्परा निभाते थे। कहा जाता है कि यहाँ की मूर्तियां बद्रीनाथ की मूर्तियों से मेल खाती हैं। नगरोटा स्थित शिव मंदिर को लेकर गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि यह मंदिर लक्ष्मी नारायण मंदिर से भी पुरातन है। वर्तमान में मंदिर में पूजा अर्चना और रखरखाव पुजारी स्वर्गीय पदमगर्भ के पौत्र और मंदिर कमेटी के सदस्य करते हैं।

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