दिल्ली महानगर से आई, पालमपुर में कर्मभूमि बनाई, हिमाचल प्रदेश भाषा, कला एवं संस्कृति अकादमी की प्रस्तोता बन छाई, लेखन के लिए समर्पित चन्द्रकांता के व्यक्तित्व और कृतित्व की प्रेरककथा

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दिल्ली महानगर से आई, पालमपुर में कर्मभूमि बनाई, हिमाचल प्रदेश भाषा, कला एवं संस्कृति अकादमी की प्रस्तोता बन छाई, लेखन के लिए समर्पित चन्द्रकांता के व्यक्तित्व और कृतित्व की प्रेरककथा
जैसा कि चन्द्रकांता ने फोकस हिमाचल को बताया
हिमाचल प्रदेश भाषा, कला एवं संस्कृति अकादमी की प्रस्तोता के तौर पर चन्द्रकांता ने छोटे से कालखंड में अपनी ख़ास पहचान बनाई है। आकर्षक व्यक्तित्व और भाषा पर जबरदस्त कमांड के दम पर हर विषय को रोचक बना कर प्रस्तुत करने का हुनर रखने वाली लेखिका एवं फिल्म समीक्षक चन्द्रकाँता समाजशास्त्र और मानवाधिकार में परास्नातक हैं और पिछले एक दशक से निरंतर लेखन में सक्रिय हैं। देश की राजधानी दिल्ली जैसे महानगर को छोड़ कांगड़ा जिला के छोटे से नगर पालमपुर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले इस दम्पति की प्रेरककथा बेहद रोचक है। ‘फोकस हिमाचल’ के सम्पादक विनोद भावुक के साथ विशेष साक्षात्कार में चन्द्रकाँता ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर विस्तृत बात रखी।
पालमपुर का चुनाव क्यूँ किया?
पहाड़ और ग्राम्य संस्कृति हमेशा से हमें आकर्षित करते रहे हैं। सचिन देव बर्मन का संगीत जिसमें पहाड़ों और गाँव की गंध बसी है, हमेशा हमें स्पंदित करता रहा है। शायद पहाड़ पुकार रहे थे। विवाह के बाद हम दंपति ने आजीवन गाँव के आँचल में रहने का निर्णय किया। हम हिमाचल को अपनी कर्मभूमि बनाना चाहते थे और जब जगह के चुनाव की बात आई तो पालमपुर हमारी पहली पसंद था। कश्मीर के बाद यदि कोई जगह हमें पसंद आई तो वह पालमपुर था, कुछ वर्ष पहले हम एक व्यक्तिगत यात्रा पर पालमपुर आये थे। यहाँ के चाय के खूबसूरत बागान, रंग-बिरंगी पहाड़ी टोपियों, निर्मल कूहलों और यहाँ के मौसम से ऐसा लगाव हुआ की यहीं के होकर रह गए। ग्राम्य जीवन की अपनी चुनौतियाँ हैं, लेकिन सुकून बेशकीमती है।
दिल्ली से हिमाचल का सफर
नए सिरे से जीवन की शुरुआत करना कतई आसान नहीं था। हमारे जीवनसाथी दीपक को इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़नी पड़ी। हमें घर-परिवार छोड़ना पड़ा। सब कुछ छोड़कर हमने एक बार फिर शून्य से शुरुआत की। दीपक और हमारा जन्म, परवरिश और शिक्षा दिल्ली महानगर में ही हुई है। अपनी जड़ों से हटकर कहीं और बसने के लिए कलेजा हाथ में निकालकर रख देना पड़ता है। यह निर्णय लेने में हमें तीन वर्ष लग गए। हमें दिल्ली से मोहब्बत है, लेकिन शहरी जीवनशैली, मॉल संस्कृति और भाग-दौड़ भरा जीवन हमें कभी रास नहीं आया। जीवन को महसूस करने के लिए ठहराव चाहिए। यह ठहराव हमें हिमाचल के पेड़ों, पहाड़ों और पानी के थिरकते हुए कूहलों के बीच आकर मिला। पहाड़ों का जीवन और स्वीकृति आसान नहीं है। फिलहाल तो यहाँ की प्रकृति में घुलने- मिलने की जद्दोजहद जारी है। बाकी, संघर्ष तो प्रत्येक के जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन सब कुछ खोकर जो पाया है वह अनमोल है।
लेखन के प्रति रुचि कब से?
जबसे स्मृति है खुद को लिखते हुए ही देखा है। बचपन में पिताजी को बेकार पड़े कागजों की कश्ती बनाते हुए और उन पर व्यंग्यनुमा कविता व लेखन करते हुए देखा था। पिताजी बस की टिकिट के पीछे भी कुछ न कुछ रोचक शब्द या चित्र अंकित कर दिया करते थे। लेखन का संस्कार उन्हीं से मिला। स्कूल कॉलेज के दिनों में हमने डायरी खूब लिखी है। स्त्री, समाज और प्रेम पर खूब कविताएँ लिखीं उस दौर में। एक मित्र के सुझाव पर कोई दशक भर पहले ब्लॉग लिखना शुरू किया। सामाजिक मुद्दों और सिनेमा पर खूब लिखा। जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, प्रजातंत्र, कंटेम्परेरी लिटरेरी रिव्यू में लेख और फ़िल्म समीक्षा प्रकाशित होती रहीं। कई साझा कविता संग्रह भी आये लेकिन पुस्तक प्रकाशन के लिए हमने कभी पहल नहीं की।
लेखन की दुनिया
एक दशक से निरंतर लेखन कर रहे थे वह और बात है की लेखकीय गुटबाजी के चलते उस पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। खेमों में बाँटना हमें मंजूर नही था। हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक डॉ बजरंग बिहारी तिवारी जी के लगातार प्रोत्साहन के बाद हमने इस संदर्भ में विचार किया। विश्व पुस्तक मेला 2020, दिल्ली में हमारे प्रथम काव्य-संग्रह “आई ऑब्जेक्ट I OBJECT” का लोकार्पण हुआ है। यह हिंदी व अंग्रेजी का द्विभाषी कविता संग्रह है जिसका अंग्रेजी अनुवाद हमारे जीवनसाथी दीपक ने किया है। फिलहाल एक कहानी संग्रह और हमारा पहला उपन्यास ‘ग्रीक लव’ प्रकाशनाधीन है। यह उपन्यास समलैंगिकता पर आधारित है और समाज को इस मुद्दे पर वैधानिक व संवैधानिक आलोक में जानकारी देने के लिहाज से लिखा गया है। समलैंगिक समुदाय की परख संवेदनशील दृष्टिकोण से की जानी चाहिए। हमने लगभग पचास से भी अधिक फ़िल्मी गीत और फिल्मों के लिए कुछ स्क्रिप्ट भी लिखी हैं। कई वर्षों की मेहनत है। एक एल्बम पर काम चल रहा था गीत भी रिकार्ड हुए लेकिन लॉकडाउन की वजह से बनती हुई बात बिगड़ गई। प्रयास जारी हैं।
कार्यक्षेत्र
हमने कभी खुद को किसी काम तक सीमित नहीं किया। हमें लिखना अच्छा लगता है। आजकल एंकरिंग का लुत्फ़ उठा रहे हैं। यह नैसर्गिक है हमने कहीं से नहीं सीखा हाँ निरंतर खुद को माँजा अवश्य है। कोई भी साक्षात्कार लेने से पहले हम खुद उस विषय पर पढ़ते हैं, तैयारी करते हैं जब तक की संतुष्ट नहीं हो जाते। एक घंटे की बातचीत के लिए हम तीन दिन और कभी कभी एक सप्ताह भी चीजों को खंगालते रहते हैं । हमें प्रकृति से गहरा लगाव है। हमें आर्ट और क्राफ्ट करना बेहद पसंद है। हम बेकार पड़ी वस्तुओं से क्राफ्ट बनाते हैं। हम सड़क पर या बगीचे में बेकार पड़ी कोई भी चीज सहेज कर रख लेते हैं। हमारी दो अलमारियां ऐसी ही बेकार फेंक दी गयी चीजों से भरी पड़ी हैं। हम चित्रकारी भी करते हैं। कभी डिजाइनर मोमबती बनाते हैं तो कभी हैंडमेड साबुन। हमें पोस्टर बनाना भी पसंद है। एक अरसे तक हमने लोगो भी डिजाइन किए हैं। कभी संसाधन जुटा सके तो एक आर्ट स्कूल खोलना चाहेंगे। हमने हमेशा से एक सपना देखा है ऐसे बुजुर्गों के लिए घरोंदा बनाने का जिनके पास आश्रय नहीं है। हम उन सब बुजुर्गों का घर बनना चाहते हैं जो बेघर हैं। आखिर कभी इन्हीं कांपती हुई उँगलियों ने हमारे नन्हे क़दमों को सहारा दिया था।
अब तक के सम्मान
अभी तो लेखकीय यात्रा की शुरुआत है। सीखने की प्रक्रिया चल रही है। वर्ष 2019 मंई भारतीय अंतरराष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव, कोलकाता में अपना विज्ञान गीत सुनाने का अवसर मिला था। इसने खूब सुर्खिया बटोरीं, ख़ुशी की बात है की यह विज्ञान पर लिखा गया पहला रैप गीत था। इंडिया इंटरनेशनल साइंस वर्ष 2019 में यश पब्लिकेशन की प्रेम काव्य प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला था। इसी वर्ष हिन्द युग्म और कहानियाँ. कॉम की प्रतियोगिता में हमारी दो कहानियाँ अव्वल स्थान पर रही और पुरस्कृत हुई। आश्वस्त करने वाला प्रसंग यह था की इन कहानियों का चयन पाठकों की पसंद के आधार पर किया गया था। वर्ष 2020 में ‘प्रतिलिपि कथा प्रतियोगिता’ में हमारी कहानी “जनाना” को प्रथम पुरस्कार दिया गया है। दस हजार रुपए की राशि भी पुरस्कार स्वरूप दी गई। लेखन के अतिरिक्त मीडिया क्षेत्र में योगदान के लिए फ़रवरी 2021 में ‘सुकेत साहित्यिक संस्था’ सुंदरनगर द्वारा सम्मानित किया गया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2021 के सुअवसर पर मीडिया के क्षेत्र में योगदान के लिए फोकस हिमाचल व हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी द्वारा ‘स्त्री शक्ति सम्मान’ भी दिया गया। पुरस्कार खुशी और प्रोत्साहन देते हैं। हमारे लिए पाठकों की स्वीकृति, प्रतिक्रिया और उनका प्रेम ही सबसे बड़ा पुरस्कार है।
आगे की क्या योजना है?
पिछले वर्ष लॉकडाउन का समय रचनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। फ़िलहाल कविता, कहानी और व्यंग्य की कुछ पुस्तकों का संपादन पूरा किया है। लेखन के साथ संपादन और पुस्तक समीक्षा का कार्य भी जारी है। अच्छा लगता है जब लेखक और पाठक आपके काम को सम्मान देते हैं। प्रत्येक महीने कई डाक पुस्तकों की आती है ताकि उन पुस्तकों की समीक्षा की जा सके। समीक्षा के काम ने हमें भी एक सजग पाठक बना दिया है। जिम्मेदारी और बढ़ गई है। संपादन पर बात करें तो एक श्रमसाध्य कार्य है लेकिन इससे संतुष्टि मिलती है। साथ ही, महिला लेखकों के संस्मरण संपादित करने की योजना है। शीघ्र ही हमारा प्रथम उपन्यास और प्रथम कहानी संग्रह प्रकाशित होने वाला है। आने वाले दिनों में हिंदी साहित्य को समर्पित हमारी वेबसाइट www.gajagamini.in को और समृद्ध करने की योजना है। इसके अतिरिक्त कई वर्षों से मीडिया चैनल मैटिनी बाक्स के लिए एंकर की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। पिछले दो वर्षों से अपना एक स्टूडियों बनाने पर काम कर रहे हैं जहाँ साक्षात्कार लिए जा सकें। यह योजना अब अंतिम चरण में है। फिलहाल हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी में प्रस्तोता की भूमिका में हैं जिसे खूब सराहना मिल रही है। पालमपुर में एक महिला लाइब्रेरी पर काम करने की योजना भी है।
पृष्ठभूमि और संदेश
हमारा जन्म दिल्ली में हुआ। समाजशास्त्र और मानवाधिकार में परास्नातक किया है। लगभग एक दशक तक दिल्ली के एक एनजीओ के साथ जुड़कर काम किया है। आठ वर्ष पहले अंतरजातीय विवाह हुआ। यह प्रेम विवाह था जिसमें दहेज या किसी किस्म का लोक दिखावा शामिल नहीं था। विवाह और उसका उत्सव किसी का निजी चुनाव है लेकिन सादगी में जो सौन्दर्य है वह शोर और दिखावे में कहाँ! इस संदर्भ में आपके अखबार के माध्यम से मेरी युवाओं से भी अपील है की समाज की सड़ी-गली परंपराओं में हस्तक्षेप करें और देश व समरस समाज के निर्माण में अपना सहयोग दें। संस्कृति के व्यापक हित में युवाओं को समाज को नई और सार्थक दिशा देने की पहल करनी होगी।
अवसाद से सृजन तक
अंत में, हमने जीवन के पांच वर्ष अवसाद में बिताए हैं और यही ग्रहण किया है कि सफलता असफलता कुछ नहीं होती, आप अपना नजरिया बदलिए आपके लिए जिन्दगी के मायने बदल जाएंगे। नकार और चीजों को अवसरों को खोने के क्रम में हमने जीवन से धेर्य रखना सीखा है। वही सीख आपको सौंप रहे हैं – आप जीवन में जो भी कामना रखते हैं उसकी माप वक़्त की सीमाओं से मत कीजिए, सपने देखते रहिए, पूरे हुए तो ठीक नहीं हुए तो आप उड़ना तो सीख ही जाएंगे। सकारात्मकता जीवन की कुंजी है। जिए और जीवन दें।
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चंद्रकांता
पालमपुर, हिमाचल प्रदेश
chandrakanta.80@gmail.com

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