दिल्ली- चंडीगढ़ तक मशहूर शानन के जसवाल ट्राउट फॉर्म की ट्राउट फिश, उत्तराखंड का मत्स्य विभाग कर रहा है यहां की ट्राउट पर रिसर्च

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दिल्ली- चंडीगढ़ तक मशहूर शानन के जसवाल ट्राउट फॉर्म की ट्राउट फिश, उत्तराखंड का मत्स्य विभाग कर रहा है यहां की ट्राउट पर रिसर्च
जोगिन्द्रनगर से सत्य प्रकाश की रिपोर्ट
मंडी जिला के जोगिन्द्रनगर के शानन स्थित जसवाल ट्राउट मछली फॉर्म की पहुंच न केवल हिमाचल प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित पूरे उत्तरी भारत में है। इस फॉर्म में तैयार होने वाली ट्राउट मछली के दीवाने न केवल देसी व विदेशी पर्यटक हैं, बल्कि देश की जानी- मानी राजनैतिक हस्तियां भी रहीं हैं। जसवाल ट्राउट फॉर्म शानन ट्राऊट उत्पादन में हिमाचल प्रदेश में एक अहम स्थान रखता है। जसवाल ट्राउट फॉर्म के संचालक राजीव जसवाल और संजीव जसवाल कहते हैं कि यह फॉर्म उनके परिवार के लिए स्वरोजगार का एक बड़ा माध्यम बन गया है। आज वे प्रतिवर्ष लाखों रूपये का ट्राउट मछली का कारोबार कर रहे हैं। जसवाल ट्राउट फॉर्म में उत्तराखंड राज्य का मत्स्य विभाग ठंडे पानी में पैदा होने वाली ट्राउट मछली पर विशेष शोध कार्य कर रहा है। शोध कार्य के दौरान मछलियों के लिए खुराक, ट्रिपलोयड़ के साथ-साथ बीज का भी विशेष वितरण किया जाता है।
बीस साल में हासिल की कामयाबी
जसवाल बंधु कहते हैं कि वर्ष 2001 में कॉर्प मछली पालन से शुरू किया था, जो बाद में ट्राउट पालन के तौर पर बड़े कारोबार में तबदील हो गया । भौगोलिक परिस्थितयों को देखते हुए कॉर्प मछली पालन की जगह ट्राउट मछली उत्पादन की ओर मुड़े, जिसके बेहतर परिणाम सामने आए। ट्राउट पालन को उस समय नए पंख लग गए, जब उन्होंने इसकी हैचरी में भी सफलता प्राप्त कर ली। वर्ष 2003 में ट्राउट हैचरी तैयार होने से उनके मछली उत्पादन के काम को ओर अधिक बल मिला तथा अब दोनों भाई मिलकर इसे आगे बढ़ा रहे हैं।
ट्राउट हैचरी का सफर प्रयोग
जसवाल भाई कहते हैं कि उनकी हैचरी में 98 प्रतिशत तक की सफलता मिली है, जिससे उन्हे आय का अन्य बड़ा स्त्रोत मिल गया है। हैचरी को आधुनिक तकनीक प्रदान करते हुए उन्होने तुर्की से लाए गए वर्टिकल इंक्युबेटर स्थापित किये हैं, जो संभवता पूरे देश में यह पहला प्रयास है। ट्राउट हैचरी में किये गए बेहतर प्रयासों के चलते उन्हे वर्ष 2019 में बिलासपुर में आयोजित कार्यक्रम में बेस्ट हैचरी आवार्ड से भी नवाजा जा चुका है।
हर साल लाखों में हो रही कमाई
संजीव व राजीव जसवाल का कहना है कि उनकी तैयार की गई ट्राउट की पहुंच राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित उत्तर के भारत के अनेक राज्यों तक है। वर्तमान में वे प्रतिवर्ष लाखों की ट्राउट का उत्पादन कर रहे हैं और हैचरी से भी हर साल औसतन 3 से 4 लाख रूपये तक की आय भी प्राप्त हो रही है। हैचरी से तैयार बीज आसपास के मछली उत्पादक खरीदते हैं, वहीं उत्तराखंड राज्य में भी भेजा जाता है। ट्राउट का एक बड़ा भाग आसपास ही बिक जाता है, जबकि मांग होने पर इसे दूसरे राज्यों व बड़े शहरों को भी भेजा जाता है।
टैंकों के लिए मिला अनुदान
संजीव जसवाल व राजीव जसवाल को ट्राउट मछली पालन के लिए सरकार से टैंक निर्माण को अनुदान भी मिला है। उन्होंने वर्ष 2003- 04 के दौरान आठ टैंकों का निर्माण किया, जिसके लिए प्रति टैंक 20 हजार रूपये बतौर अनुदान सरकार से मिले। मछली पालन के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने पर वर्ष 2014 में चौंतड़ा में आयोजित किसान मेले में उन्हे प्रगतिशील किसान अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है, जिसमें उन्हे 10 हजार रूपये का नकद पुरस्कार मिला है।
600 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन
मतस्य विभाग के सचिव डॉ. एस, एस गुलेरिया कहते हैं कि प्रदेश में 31 मार्च, 2020 तक ट्राउट मछली पालन से 592 मछुआरे जुड़े हुए हैं, जो 1166 रेसवेज से 600 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन कर रहे हैं। चंबा, कांगड़ा, मंडी, कुल्लू, किन्नौर, सिरमौर तथा शिमला में ट्राउट मछली पालन किया जा रहा है। प्रधानमंत्री संपदा मत्स्य योजना के तहत सरकार ने प्रति इकाई अनुदान राशि को एक लाख रूपये तक बढ़ा दिया है, जिससे अब किसानों को अनुदान के तौर अधिक धनराशि प्राप्त होगी।
ट्राउट यूनिट के लिए सरकारी मदद
डॉ. एस, एस गुलेरिया कहते हैं कि ट्राउट मछली पालन के क्षेत्र में तीन लाख रूपये तक की युनिट पर अब सामान्य परिवारों को 40 प्रतिशत तक 1.20 लाख, जबकि महिला एवं अनुसूचित जाति व जनजाति परिवार को 60 प्रतिशत तक 1.80 लाख रूपये तक का अनुदान टैंक निर्माण को प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त बीज, खुराक व परिवहन सहायता के तौर पर सामान्य परिवार को एक लाख रूपये जबकि महिला एवं एससी व एसटी परिवार को डेढ़ लाख रूपये तक का अनुदान जो अढ़ाई लाख प्रति युनिट के तहत दिया जा रहा है। साथ ही ट्राउट हैचरी निर्माण की प्रति इकाई 50 लाख रूपये की लागत के आधार पर सामान्य परिवार को 40 प्रतिशत तक अधिकत्तम 20 लाख जबकि महिला तथा एससी व एसटी परिवार को 60 प्रतिशत तक अधिकत्तम 30 लाख रूपये तक के सरकारी अनुदान का प्रावधान किया गया है।

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