दिलेराम की मनयारी से चमके हरि कृष्ण मुरारी, टांकरी के इस गुरु ने धर्म संस्कृति, अध्यात्म व ज्योतिष पर भी किया है लेखन कार्य 

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दिलेराम की मनयारी से चमके हरि कृष्ण मुरारी, टांकरी के इस गुरु ने धर्म संस्कृति, अध्यात्म व ज्योतिष पर भी किया है लेखन कार्य 
कांगड़ा भूपेंद्र जम्वाल, भूपी की रिपोर्ट
कांगड़ा घाटी की मशहूर लोककथा ‘दिले राम की मनयारी’ की पहाड़ी खंड काव्य में रचना कर हरि कृष्ण मुरारी ने खूब वाहवाही लूटी है। पहाड़ी काव्य संग्रह, ‘धरती सुरण बनाणी’ , ‘मकड़ी का जाला’, ‘पछैण’, पहाड़ी नाटक ‘बड़े स्याणे लोक,’ पहाड़ी कहानी संग्रह ‘पिंजरे दा पंछी’ जैसी उनकी रचनाओं में कांगड़ा की धौलाधार धाटी की सौंधी- सौंधी महक है। हैं। उन्होंने धर्म संस्कृति, अध्यात्म व ज्योतिष पर भी लेखन कार्य किया है। अकाशवाणी शिमला व धर्मशाला से उनकी पहाड़ी व हिंदी कविताओं तथ्रा कहानियों का पाठ हो चुका है। काव्य गोष्ठियों में अपनी रचनाओं से वे खूब तालियां बटोरते हैं।
टांकरी लिपि के प्रशिक्षक एवं गुरू
हरि कृष्ण मुरारी की पहचान टांकरी लिपि के प्रशिक्षक एवं गुरू के तौर पर है। उन्होंने भारत सरकार के केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से कई विद्वानों को टाकरी का प्रशिक्षण दिया है। प्रदेश सरकार के सहयोग से 7 स्टूडेंट्स को एक साल तक टांकरी का प्रशिक्षण दिया है। गेयटी थियेटर शिमला में पांड़लिपि मिशन के अंतर्गत प्रदेश विश्वविद्यालय के एमफिल व पीएचडी के स्टूडेंट्स को टांकरी का प्रशिक्षण दिया है। उन्होंने ‘सांभ’ संस्था से मिल कर टांकरी की लिपि तैयार की है। टांकरिया दी पाठशाला, टांकरी लिपि प्रवेशिका व टांकरी हिंदी जैसी पुस्तकें भी लिखी हैं।
कई भाषाओं के जानकार, कई संस्थाओं से जुड़ाव
हरि कृष्ण मुरारी लेखन, प्रकाशन, रंगमंचीय गतिविधियों, लोक साहित्य संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, शोध एवं अध्ययन में लंबे अर्से से जुड़े हुए हैं। वे देवनागरी, गुरूमुखी टांकरी व रोमन लीपियों का ज्ञान रखते हैं और पहाड़ी, हिंदी, पंजाबी व अंग्रेजी के जानकार हैं। वे ‘प्रिया’ संस्था दिल्ली, कांगड़ा महिला सभा रैत, न्यू हॉप पालमपुर, कांगड़ा लोक साहित्य परिषद नेरटी व नगरोटा बगवां की ‘आशा’ संस्था से जुड़े हैं।
काम को मिले कई सम्मान
16 फरवरी 1953 को कांगड़ा जिला की शाहपुर विधानसभा के रैत कस्बे में साधारण परिवार मेें पैदा हुए हरि कृष्ण मुरारी के 67 साल का जीपनखंड एक कल्चर एक्टिविस्ट का रहा है। वे कभी राजकाज की भाषा रही टांकरी के चुनिंदा जानकारों में से एक हैं। उन्होंने टांकरी को जिंदा करने के लिए अहम भूमिका अदा की है। लोक साहित्य में उनके काम के लिए 1997 में राज्य स्तरीय पहाड़ी साहित्य सम्मान प्रदान किया गया। 2009 में उन्हें ठाकुर मौलू राम जींवत पहाड़ी भाषा एवं संस्कृति राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

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