दस हजार साल पुराने चावल के बीजों के संरक्षण का गवाह है छौहारा का ‘छुहारटू’, दूरदर्शी किसानों के नाम प्रतिष्ठित प्लांट जीनोम सेवियर अवार्ड  

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दस हजार साल पुराने चावल के बीजों के संरक्षण का गवाह है छौहारा का ‘छुहारटू’, दूरदर्शी किसानों के नाम प्रतिष्ठित प्लांट जीनोम सेवियर अवार्ड  

पालमपुर से विनोद भावुक की रिपोर्ट

लाल चावल की फसल लगभग 10 हजार वर्ष पुरानी आंकी जाती है। शिमला जिला के चिड़गांव,  रोहड़ू,  रामपुर,  कुल्लू घाटी, सिरमौर तथा कांगड़ा जिला के ऊपरी क्षेत्रों में उगाया जाता है। लाल चावल की किस्मों में रोहड़ू में उगाये जाने वाले लाल चावल (छुहारटू) की अपनी साख है।  शिमला जिला के छौहारा विकास खंड का पेजा गांव सदियों से लाल चावल (छुहारटू) की खेती के लिए मशहूर है। यहां पैदा होने वाले चावल की उनके विशिष्ट स्वाद और औषधीय गुणों की वजह से बाज़ार में भारी मांग रहती है। यहां के लाल चावल में विशेष पोषाहार तथा औषधीय तत्व हैं। इस क्षेत्र में लाल चावल को परंपरागत रूप में ब्लड प्रेशर, कब्ज, और ल्यूकोरिया जैसे रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता रहा है। लाल चावल (छुहारटू) उगाने वाले यहां के किसानों को  कल 11 नवम्बर को दिल्ली में केन्द्रीय कृषि मंत्री प्रतिष्ठित प्लांट जीनोम सेवियर अवार्ड के तौर पर दस लाख प्रदान करेंगे।

संरक्षण और पंजीकरण में कृषि विश्वविद्यालय का रोल

 

कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कुलपति डॉ. एचके चौधरी ने बताया कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने लाल चावल उगाने वाले किसानों को पारंपरिक लाल चावल के संरक्षण के साथ पंजीकृत करने में मदद की है। कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने लाल चावल के संरक्षण, विकास और इसकी खेती को लोकप्रिय बनाने के लिए किसानों के साथ मिल कर प्रयास किये और इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप लाल चावल की खेती के प्रति किसान जागरूक हुए। कृषि विश्वविद्यालय ने लाल चावल उगाने वाले किसानों का एक कृषक समाज बनाने में मदद की, क्योंकि यह पुरस्कार केवल कृषक समाज को दिया जाता है।

डा. अजय श्रीवास्तव और प्लांट ब्रीडर डा. आरपी कौशिक की मेहनत

प्रोफेसर चौधरी बताते हैं कि पीपीवीएफआरए के चेयरपर्सन ने कृषि विश्वविद्यालय को पत्र लिख कर सूचित किया है कि लाल चावल उगाने वाले किसानों को प्लांट जीनोम सेवियर अवार्ड के रूप में दस लाख रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाएगा। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री 11 नवंबर को लाल चावल उगाने वाले किसान समाज को 10 लाख का नगद पुरस्कार, प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट करेंगे। लाल चावल के संरक्षण में कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों डा. अजय श्रीवास्तव और सेवानिवृत्त प्लांट ब्रीडर डा. आरपी कौशिक की अहम् भूमिका रही है, जिन्होंने पिछले एक साल में किसानों को प्रासंगिक वैज्ञानिक डाटा और पुरस्कार के लिए अन्य औपचारिकताओं को पूरा करने में मदद की।

पांच साल में दस हजार किसान उगायेंगे लाल चावल

कृषि मंत्री वीरेंद्र कंवर बताते हैं कि कृषि विभाग के विशेष प्रयासों से विलुप्त होने की कगार पर पहुंची लाल चावल की खेती फिर से होने लगी है। वर्तमान में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में 1100 हेक्टेयर में लाल चावल की खेती की जा रही है, और 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार हो रही है। अगले पांच सालों में लाल चावल की खेती के अंतर्गत चार हजार हेक्टेयर क्षेत्र तथा 40 हजार क्विंटल पैदावार का लक्ष्य है। वर्तमान में 4122 किसान परिवार लाल चावल की खेती कर रहे हैं, अगले पांच सालों में 10 हजार किसानों को लाल चावल की खेती की तरफ मोड़ने का लक्ष्य है।

 


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