‘त्रयांगल’ : हाथ की चौड़ाई जैसा कई गुणा ज्यादा चीजों को अपने अंदर समेटने वाला अनूठा कृषि औजार

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‘त्रयांगल’ : हाथ की चौड़ाई जैसा कई गुणा ज्यादा चीजों को अपने अंदर समेटने वाला अनूठा कृषि औजार
सुंदरनगर से पवन चौहान की रिपोर्ट
बुजुर्ग सुनाते हैं कि जब घडिय़ां नहीं थीं तब वे आसमान में एक साथ निकलने वाले तीन तारों के समूह से ही समय का पता लगाते थे। यह तीन तारे एक ही सीध में होते थे, जो सुबह चार या पांच बजे के बीच उत्तर दिशा से निकलते थे। इन तीन तारों की एक सीध वाली सरंचना के चलते बुजुर्ग इन्हे ‘त्रयांगल’ कहकर पुकारते थे। ‘त्रयांगल’ बनाने की बात तब जहन में आई होगी, जब हमारे हाथों की उंगलियों या हथेली बड़ा कार्य करने के लिए छोटी पडऩे लगी होगी। त्रयांगल के बनने पर इसकी इन तीन या फिर पांच उंगलियों ने मनुष्य के कार्य को बहुत आसान बना दिया था। ‘त्रयांगल’ को एक सिरे से पकडक़र उसके दूसरे उंगलीनुमा सिरे की सहायता से हाथ की चौड़ाई जैसा कई गुणा बढ़ाकर ज्यादा चीजों को उसके अंदर समेटा जा सकता था, जिसके कारण कार्य आसान बन जाता था। पुराने समय में बहुत-सी चीजें ऐसी थीं जो हमारे कार्य को आसान बनाती थीं। उस समय इस मशीनी युग का प्रभाव न था। मनुष्य द्वारा हर कार्य अपनी-अपनी सुविधा और साधनों से तय होता था, जिसमें मनुष्य द्वारा स्वंय तैयार की गई ये चीजें उसकी हर तरह से मदद करती थीं। इन्ही चीजों में एक नाम है ‘त्रयांगल’।
ऐसा होता था ‘त्रयांगल’
त्रयांगल बांस की नली के एक हिस्से से बनी वह सरंचना है जो बांस को किसी एक विशेष लंबाई में काटकर तैयार किया जाता है। यह बांस की एक पतली फट्टी वाला वह डंडा होता है जिसे एक किनारे से तय लंबाई में तीन या पांच हिस्सों में फाड़ा जाता है। इन्हे त्रयांगल की उंगलियों की संज्ञा से भी नावाजा जाता है। इन फाड़े गए हिस्सों को हल्का-सा फैलाने हेतु बांस की या फिर किसी अन्य कम भार वाली लकड़ी के छोटे से हिस्से को इस्तेमाल में लाया जाता है। इसे ‘लुह्कड़ी’ कहा जाता है। इस बांस या लकड़ी के टुकड़े में तीन या फिर पांच छेद (सुविधानुसार) गरम गोल लोहे की सहायता से किए जाते हैं ताकि उस टुकड़े को फिर इन बांस की फाड़ी गई डंडियों में सही तरीके से पिरोया जा सके।
‘ख्वाड़े’ से ‘त्रयांगल’ का खास नाता
‘ख्वाड़े’ (घर के नजदीक जमीन का वह खुला हिस्सा जहां फसल के कार्य से लेकर शादी-ब्याह या अन्य उत्सव का हर कार्य निपटाया जाता है) में जब ‘प्रेअर गाहेआ’ (हर मौसम की फसल से दाने निकालने की प्रक्रिया) जाता था और कनक के दाने निकाले जाते थे, उस समय त्रयांगल का बहुत इस्तेमाल रहता था। जब बैलों द्वारा गोल- गोल घूमकर पुल्लियों की मंडाई के बाद कनक की ये पुल्लियां भूसे में परिवर्तित हो जाती थीं तो उसके साथ ही दाने भी मिक्स हो जाते थे। इन दानों को फिर से अलग करने के लिए त्रयांगल का अहम रोल था।
उस दौर का बहुत ही बेहतरीन तरीका
त्रयांगल की सहायता से भूसे को हवा में उछाला जाता था और एक तरफ से दो औरतें या आदमी चादर के दोनों सिरों को पकडक़र और फिर उसे आगे-पीछे हवा में लहरा कर हवा के झोंके तैयार करते थे। इसे ‘झोली’ कहा जाता है। जैसे ही भूसा हवा में उछलता तो वह उस हवा के बहाव के कारण भूसा और दानों को अलग-अलग कर देता था। एक या दो व्यक्तित्रयांगल की सहायता से भूसे को हवा में उछालते जाते और हवा देने वाले अपना काम करते जाते थे। यह जरुर उस समय बहुत समय खपाने वाला काम था, लेकिन हालात और परिस्थितियों के चलते यह तरीका उस समय के हिसाब से बहुत ही बेहतरीन था। समय बीतने के साथ ‘झोली’ के कार्य को हाथ से चलने वाले पंखों ने आसान कर दिया।
‘त्रयांगल’ एक, काम अनेक
त्रयांगल का सिर्फ एक ही कार्य नहीं था, अपितु और भी कार्यों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था। जब भूसे या फिर छोटे आकार में कटे हुए ‘टांडहों’ (मक्कीके पौधे) को एक तरफ को खिसकाना हो, फिर आगे या पीछे ले जाना हो या फिर इकठ्ठा करना हो तो आवश्यकतानुसार त्रयांगल की सहायता से इस कार्य को अंजाम दिया जाता था। जब भूसे की ढेरी लगानी होती है तो भी त्रयांगल का इस्तेमाल किया जाता है। यह कार्य आज भी किया जाता है लेकिन अब यह बहुत ही कम देखने को मिलता है। मशीनों के चलते इसका उपयोग कम रह गया है। अब किसान पशुओं के चारे को सीधा ही बड़ी-बड़ी बोरियों में भरकर ‘तालड़ी’ या फिर किसी शैड के नीचे रख देता है। बावजूद इसके मैदानी इलाकों के बजाय पहाड़ी इलाकों में त्रयांगल का इस्तेमाल फिर भी काफी किया जाता है।
‘ड्रमी’ का साथी बना ‘त्रयांगल’
1964-65 में जब कनक को ‘गाहने’ के लिए ‘ड्रमी’ बाजार में आई तो किसान का काम बहुत आसान हो गया। अब उसे ख्वाडे में पुल्लियों के ढेर को रखकर और उसके ऊपर बैलों को न घुमाकर सीधा ही छोटी-छोटी पुल्लियों को ड्रमी में डालकर भूसा निकाल लिया जाता था। ड्रमी को डीजल वाले इंजन और बिजली की सहायता से चलाया जाता था। एक ओर से पुली को डालकर दूसरी ओर से भूसा और दाने निकल जाते थे, जैसा थ्रैसर द्वारा होता है। लेकिन यह फिर भी भिन्न था। इसमें एक कमी यह जरुर थी कि इसके दाने निकलने वाले हिस्से से दानों के साथ मोटे ‘डाह्ंगल’ (डं_ल) और भूसा निकलने वाले मुहाने से भूसे के साथ दाने भी निकल जाया करते थे। उन दानों को भूसे से अलग करने के लिए ड्रमी के भूसे वाले मुहाने पर त्रयांगल की सहायता से दाने वाले भूसे को उछालकर दानों और भूसों को अलग कर दिया जाता था। यह कार्य ‘गाहते’ वक्तकर लिया जाता था। इसके लिए दो व्यक्तियों की आवश्यता होती थी जो दोनों तरफ आमने-सामने खड़े होकर इस दाने वाले भूसे को उछालते रहते थे और भूसा निकलने वाले मुहाने से निकलने वाली हवा की सहायता से दाने और भूसा अलग-अलग हो जाते थे।
‘थ्रैसर’ के चलते त्रयांगल को रेस्ट
बाद में जब थ्रैसर आए तब त्रयांगल को एक लंबा आराम मिल गया। अब यह सिर्फ तालड़ी में रखे जाने वाले भूसे को आगे खिसकाने और आंगन या अन्य जगह पर रखे गेहूं या मक्की आदि के भूसे को इक_ा करने और फैलाने के ही काम आता है। अलग-अलग इलाकों में त्रयांगल को अपनी बोली के अनुसार अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। हिमाचल के बहुत से इलाकों में इसे ‘त्रयांगल’ तो पंजाब में इसे ‘पंजरयाला’ कहा जाता है। आज समय बदला है और कृषि मशीनों का युग आ गया है, लेकिन त्रयांगल पर नजर पड़ते ही बुजुर्ग अपने अतीत की इस सुविधा को देखकर मन ही मन आज भी बहुत प्रसन्न हो जाते हैं।
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-पवन चौहान, गांव व डा. महादेव, तहसी सुन्दरनगर, जिला मंडी, हिमाचल प्रदेश।
मो: 098054 02242, 094185 82242

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