टोटल रिकॉल – एक्स्ट्रा प्लेयर बन गया टीम का कप्तान और कप्तानी में जीत कर दिखाया 1964 के टोक्यो ओलंपिक में हॉकी का गोल्ड मैडल

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टोटल रिकॉल – एक्स्ट्रा प्लेयर बन गया टीम का कप्तान और कप्तानी में जीत कर दिखाया 1964 के टोक्यो ओलंपिक में हॉकी का गोल्ड मैडल

 

ऊना से वीरेंद्र शर्मा वीर की रिपोर्ट

 

1964 के टोक्यो ओलंपिक में हॉकी का गोल्ड मैडल जीतने वाली टीम इंडिया के कैप्टन रहे चरणजीत सिंह का 93 साल की उम्र में निधन हो गया और एक स्टार प्लेयर सदा- सदा के लिए मैदान छोड़ गया। टीम इंडिया को शिखर पर ले जाने वाले चरणजीत सिंह के व्यक्तित्व से जुड़ी यादें हमेशा उनके चाहने वालों को रोमांचित और प्रेरित करती रहेंगी। साल 1964 के टोक्यो ओलंपिक में अपने पुराने प्रतिद्वन्दी पाकिस्तान को फाइनल में 1-0 से हराकर गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम जब देश लौट कर तत्कालीन राष्ट्रपति राधा कृष्णन से मुलाकात कर रही थी तो राष्ट्रपति ने टीम के कैप्टन से कहा कि एक गोल से जीते हुए भी कोई जीत होती है यह सुनकर दो मिनट के लिए मानो सारे सन्न गए, लेकिन तत्काल फॉर्म में लौटते हुए चरणजीत सिंह ने कहा, ‘सर विक्ट्री इज विक्ट्री’।

 

शास्त्री बोले टोक्यो जीतकर आना, हारे तो मर जाऊंगा

3 साल पहले 88 साल की उम्र में अधरंग की बीमारी से जीत कर आने वाले चरणजीत सिंह ने ‘फोकस हिमाचल’ के साथ एक विशेष साक्षात्कार में बताया था कि टोक्यो ओलंपिक के लिए रवाना होने से पहले टीम इंडिया ने तत्काल प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मुलाकात की।  तब शास्त्री बोले कि तुम बड़े खिलाड़ी हो, टोक्यो जीत के आना। मैं छोटा आदमी हूं, अगर तुम हार गए तो मैं मर जाऊंगा। टीम इंडिया ने जब फाइनल में अपने चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को हराया, उस समय प्रधानमंत्री हिसार में एक कार्यक्रम में थे। इस जीत की सूचना रेडियो के माध्यम से खुद प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने राष्ट्र को दी। घर लौट कर टीम इण्डिया राष्ट्रपति मिलने गई तो पारंपरिक तौर पर  नगाड़े बजाकर टीम का भव्य स्वागत किया गया।

 

एक्स्ट्रा प्लेयर बन गया टीम का कप्तान

 

टोक्यो ओलंपिक के लिए टीम इंडिया का हैदराबाद में कैंप लगा। चरणजीत सिंह टीम में 12वें खिलाड़ी के तौर पर शामिल किए गए। अखबारों में उनको नजरअंदाज करने की खबरें जमकर छपी। कैम्प के समापन तक उनकी टीम में चौथे खिलाड़ी के तौर पर जगह पक्की हो गई। इसके बाद टीम इंडिया का कैंप श्रीनगर में लगा। श्रीनगर के कैंप के बाद चरणजीत सिंह नंबर एक पर पहुंच गए और उन्हें टीम इंडिया की कप्तानी सौंप दी गई। उनकी कप्तानी में टीम इंडिया ने ओलंपिक गोल्ड पर कब्जा किया।

 

अर्जुन अवार्ड के संग पदमश्री से सम्मानित

 

22 अक्टूबर 1928 को ऊना जिला के मेडी में पैदा होने वाले चरणजीत सिंह की खेल प्रतिभा को पहचान लायलपुर कॉलेज से मिली। बीएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई करने वाले जगजीत सिंह ने 1950 से पंजाब टीम से खेलना शुरू किया। यहीं से टीम इंडिया की कैप पहनने का अवसर मिला 1964 में उनकी कप्तानी में टीम ने ओलंपिक गोल्ड मेडल जीता। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथों अर्जुन अवार्ड मिला और उसी साल खेल में उनकी शानदार उपलब्धियों के लिए देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया गया। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, क्रिकेट के भगवान डॉन ब्रैडमैन और फुटबॉल के खिलाड़ी पेले उनके आदर्श खिलाड़ी रहे।

 

पंजाब पुलिस के एएसआई का सफर

 

साल 1950 में पंजाब पुलिस  के एएसआई के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले चरणजीत सिंह साल 1964 तक डीएसपी बन चुके थे। उस दौरान एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उन्हें चंडीगढ़ बुलाकर नौकरी देने का ऑफर दिया। उन्हें स्पेशल इंक्रीमेंट के साथ डिप्टी डायरेक्टर स्पोर्ट्स एंड यूथ प्रोग्राम बनाया गया। वे पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर भी रहे औएर यूजीसी के मेम्बर भी। वे हिमाचल स्पोर्ट्स के डायरेक्टर,  हॉकी की नेशनल सलेक्शन कमेटी के मेंबर 8 साल तक हिमाचल हॉकी संघ के अध्यक्ष और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ स्पोर्ट्स के सदस्य भी रहे।

 


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