जैविक उत्पाद – अमेरिका से लौटे इंजीनियर ने कांगडा में जिंदा कर दिए पालम लाल चावल, नवरंगी व कस्तूरी बासमती, रमेश गनेरीवाल ने घरोह गांव में स्थापित किया अपना फार्म, सौ फीसदी जैविक उत्पाद

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जैविक उत्पाद – अमेरिका से लौटे इंजीनियर ने कांगडा में जिंदा कर दिए पालम लाल चावल, नवरंगी व कस्तूरी बासमती, रमेश गनेरीवाल ने घरोह गांव में स्थापित किया अपना फार्म, सौ फीसदी जैविक उत्पाद
धर्मशाला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
बीस साल तक अमेरिका में इंजीनियर के तौर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले रमेश गनेरीवाल वहां के कई बांधों के निर्माण में शामिल रहे। कुछ साल पहले जब वह भारत लौटे तो कांगड़ा जिला मुख्यालय के पास स्थित घरोह गांव में अपने एग्रो फार्म की शुरूआत की। इंजीनियरिंग में कमाल करने वाले गनेरीवाल ने कृषि के क्षेत्र में भी अपना हुनर दिखाया और पहाड़ के खेतों से गायब हो चुके हिमाचली पालम लाल चावल, नवरंगी और कस्तूरी बासमती चावल को अपने खेतों में पुनर्जीवित कर दिखाया। वे अपने खेतों में वे चावल की कई पुरानी प्रजातियों पुनर्जीवित करने में सफल रहे। बता दें कि पालम लाल चावल में आयरन और फाइबर प्राचूर मात्रा में पाया जाता है, जिस कारण इन चावलों की मेडिसनल वैल्यू है। कोई समय था जब कांगड़ा घाटी के स्थानीय किस्मों के चावल विदेशों तक मशहूर थे।
कई पुराने बीजों की खोज
जब रमेश गनेरीवाल ने जैविक खेती शुरू की तो सबसे पहले गैर-संकर बीजों की खोज शुरू हुई। जिनके पास बीज बैंक थे और पुरानी किस्मों के बीच सुरक्षित थे, ऐंसे पुराने किसानों को ढूंढा गया। बीज मिले तो प्रयोग शुरू हुए और वे कई गैर संकर बीजों को पुनर्जीवित करने में सफल रहे। गनेरीवाल का कहना है कि हाइब्रिड बीज केवल एक बार इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे बीजों से उत्पादन के लिए हैं और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता है। आप उनके साथ जैविक खेती नहीं कर सकते।
सौ फीसदी जैविक उत्पाद
रमेश गनेरीवाल के खेतों की खासियत यह है कि यहां के उत्पाद सौ फीसदी जैविक है। वे अपने खेतों में देसी खाद का प्रयोग करते हैं। वे कहते हैं कि रासायनिक खाद और कीटनाशक हानिकारक हैं। इनके इस्तेमाल से लोग खुद पर्यावरण और मिट्टी के लिए खतरा बन रहे हैं। मिट्टी यूरिया की आदी हो जाती है और मांग के अनुरूप खुराक बढ़ानी पड़ती है। वे कहते हैं कि अमेरिका में रसायनों के उपयोग से क्षतिग्रस्त हई मिट्टी को पुनर्जीवित करने में 10-15 साल लग गए।
कूहल के जरिये सिंचाई
रमेश गनेरीवाल ने अपने खेतों में सिंचाई के लिए कांगड़ा घाटी की पारंपरिक सिंचाई प्रणाली कुहल का विकल्प चुना है। इस सिंचाई प्रणाली में कूहल के जरिये खेतों की सिंचाई की जाती है। वह परम्परागत कृषि प्रणाली के हिसाब से खेती करने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि वे सीमित उत्पादन करते हें, लेकिन उनके उत्पाद पूरी तरह के प्राकृतिक होते हैं। धान के अलावा वह आड़ू व केले की खेती कर रहे हैं।
खेती का विज्ञान जानते थे पूर्वज
रमेश गनेरीवाल का मामना है कि हमारे पूर्वज खेती करने के विज्ञान को जानते थे। वे प्रकृति का सम्मान करना जानते थे। फ्रांस और भारत में प्राचीन संस्कृतियों में चंद्रमा के चक्रों के साथ रोपण करने का वर्णन है। तब फसलें स्वस्थ थीं और ऐसा भोजन करने से शरीर निरोगी थे।

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