जीने की राह : पोलियो के हुए शिकार, पढऩे जाते थे पीठ पर हो सवार, पर नहीं मानी हार, मेहनत से किया चमत्कार

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जीने की राह : पोलियो के हुए शिकार, पढऩे जाते थे पीठ पर हो सवार, पर नहीं मानी हार, मेहनत से किया चमत्कार
धर्मशाला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
यह ऐसा ऐसे युवा की प्रेरककथा है, कभी जिसे पढऩे के लिए स्कूल तक पहुंचना एक चुनौती थी, उसने उच्च शिक्षा हासिल कर न केवल एक शिक्षक के तौर पर स्थापित किया, बल्कि विकलांगता के बावजूद दूसरे की मदद लेने की जगह दूसरों की मदद करने के काबिल बन कर जीने की राह दिखाई। पोलियो के शिकार एक बच्चे की स्कूली पढा़ई शुरू हुई तो दादा अपनी पीठ पर लाद कर पोते को स्कूल छोडऩे लगे। इस बालक ने विकलंागता की चुनौती को स्वीकार कर उससे लडऩे की ठानी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद संघर्ष से सफलता की बुनियाद डाल दी। वे न केवल शिक्षक हें, बल्कि विकलांगता के बावजूद कमर्शिलय लाइसेंस हासिल करने वाले और विकलांगों के लिए चार पहिया वाले विशेष स्कूटर को ड्राइव करने वाले पहले हिमाचली हैं।
दादा की पीठ पर स्कूल का सफर
मूलत: कांगड़ा विधानसभा क्षेत्र के तकीुपर से सबंध खने वाले अफलातू राम के के घर जब 8 अप्रैल 1972 को जब भानू के रूप में पोते का जन्म हुआ तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा, लेकिन नवजात पोलिया का शिकार हो गया। भानू के माता- पिता दोनों शिक्षक थे और उनकी व्यस्तता के चलते बच्चे की स्कूली शिक्षा में अड़चने आने लगी तो दादा ने कमान संभाली। भाून कहते हैं कि दसवीं तक उनके दादा ने उन्हें पीठ पर उठाकर स्कूल छोड़ा और छुट्टी के बाद घर पहुंचाया। बाद में यह परिवार धर्मशाला की पासू पंचायत में बस गया।
उच्च शिक्षा के साथ प्रोफेशनल स्किल
70 प्रतिशत विकलांगता वाले भानू को स्कूल के दिनों से ही इस बात का एहसास हो गया था कि वह अपनी विंगलांगता को सिर्फ शिक्षा से ही मात दे सकता है। दया का पात्र बनने के बजाये विकलांगता को चुनौती देने की सीख पेशे से शिक्षक माता- पिता से बचपन से मिल गई थी। यही कारण है कि उच्च शिक्षा हासिल करने के साथ खुद को ड्राइविंग में भी दक्ष किया। कॉलेज की पढ़ाई डिग्री कॉलेज धर्मशाला से हुई तो इलेक्ट्रानिक्स एंड कम्युनिकेशन में डिप्लोमा सुंरदरनगर से हासिल किया। जम्मू से बीएड की पढ़ाई की तो पटियाला से लाइब्रेरी सांइस में डिग्री और प्रदेश विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में एम की पढ़ाई की। विकलांगों के लिए बने विशेष चार पहिया स्कूटर को खरीदने और ड्राइव करने वाले वह पहले हिमाचली हैं। वे कहते हैं कि ड्राइविंग के हुनर ने उनकी जिंदगी आसान करए इसलिए ड्राइविंग उनकी हॉबी है।
कारोबार- प्यापार में आजमाया हाथ
उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भानू चौधरी ने टूरिज्जम के काम में हाथ अजमाया और टैक्सी ऑपरेटर के तौर पर अपना स्टार्टअप शुरू किया। इस के साथ हार्डवेयर और करियाने के कारेाबार को भी स्थापित किया। वर्ष 2007 में भानू की नियुक्ति शिक्षक के तौर पास्सू पंचायत में मड़दाणा दो बेहड़ा प्राथमिक पाठशाला में हुई। पिछले दस साल से वे बच्चों को जिंदगी की चुनौनियों से मुकाबले के लिए तैयार कर रहे हैं।
संस्थाओं में सक्रियता
भानू चौधरी कई संस्थाओं के सक्रिय सदस्य हैं। वे प्राइमरी टीजर्स फेडरेशन की धर्मशाला यूनिट के महासिचव है, जबकि विकलाग कल्याण संघ की जिला कांगड़ा इकाई के भी महासिचव है। वे रेडक्रॉस सोसायटी के लाइफ टाइम मेंबर हैं। उनकी पत्नी रीना कुमारी 60 प्रतिशत विकलांग होने के बावजूद टीजीटी शिक्षिका हैं। बेटी सार्थिका आठवीं में ओर बेटा वार्षिक पांचवीं कक्षा में पढ़ रहे हैं। विकलांग होने के बावजूद भानू हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं और सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं। भानू की पत्नी रीना कुमारी के सघर्ष की भी एक प्रेरककथा है, उपर चर्चा किसी ओर दिन करेंगे।

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