जिस स्कूल में की पढ़ाई, स्टूडेंट्स ने खुद उसकी सांसें बचाई, मंडी शहर के जर्जर हो चुके 150 पुराने रियासतकालीन हेरिटेज स्कूल को करोड़ों खर्च कर मौलिक स्वरूप में संरक्षित करने की प्रेरककथा

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जिस स्कूल में की पढ़ाई, स्टूडेंट्स ने खुद उसकी सांसें बचाई, मंडी शहर के जर्जर हो चुके 150 पुराने रियासतकालीन हेरिटेज स्कूल को करोड़ों खर्च कर मौलिक स्वरूप में संरक्षित करने की प्रेरककथा

मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट
पांच साल पहले तक स्कूल की जर्जर इमारत का आलम यह हो चुका था कि दो मंजिला धरोहर भवन कभी भी जमींदोज हो सकता था। इस भवन के संरक्षण की राह में सबसे बड़ी रुकावट यह थी कि पत्थर और लकड़ी से निर्मित इस इमारत को नई सांसें देने में करोड़ों का खर्च आना था। इस रियासतकालीन धरोहर के आस- पास कंकरीट का बड़ा जंगल खडा हो चुका था, लेकिंग इको फ्रेंडली इस भवन के प्रति सरकारी उदासी छंटने का नाम नहीं ले रही थी। तब इस स्कूल से पढ़े स्टूडेंट्स खुद इस स्कूल को बचाने के आगे आये। करोड़ों खर्च कर 150 पुराने रियासतकालीन हेरिटेज स्कूल को मौलिक स्वरूप में संरक्षित करने का बिरला कारनामा कर दिखाया। किसी स्कूल की 150 वर्षगांठ के ख़ास अवसर पर उस स्कूल के लिए उसके स्टूडेंट्स का इससे बढ़िया ओर क्या तोहफा हो सकता है। ओल्ड स्टूडेंट्स एसोसियेशन,बिजाई हाई स्कूल मंडी इस उपलब्धि के लिए बधाई की पात्र है। अपनी तरह की यह अनूठी पहल हमें भी इससे सीख लेकर अपने शिक्षा के मंदिर के लिए अपने दायित्व के लिए प्रेरित करती है।

पांच साल में लौटीं स्कूल की सांसें


ओल्ड स्टूडेंट्स एसोसियेशन,बिजाई हाई स्कूल मंडी के सदस्यों ने इस स्कूल के संरक्षण की कार्ययोजना बनाई। उठाया प्रशासन- शासन से इस मामले को प्रमुखता से उठाया। स्कूल के स्टूडेंट्स के ही प्रयासों का प्रतिफल था कि एशियन डेवलपमेंट बैंक की परियोजना के तहत इस धरोहर भवन के संरक्षण का कार्य 15 जनवरी 2016 को शुरू हुआ। हालांकि इस भवन के संरक्षण का काम दो वर्ष में पूरा होना था, लेकिन लकड़ी पर महीन कशीदाकारी जैसे मूल स्वरूप को सहेजने में लम्बा वक्त लगा। ओल्ड स्टूडेंट्स एसोसियेशन के पधाधिकारी नियमित इस कार्य का अवलोकन करते रहे। ओल्ड स्टूडेंट्स एसोसियेशन के अध्यक्ष अनिल शर्मा कहते अपने मूल स्वरूप में संरक्षित हुआ भवन अपनी भव्यता से सैलानियों को आकर्षित करेगा।
राज्य अभिषेक पर राजा का तोहफा

 

साल 1851 में पैदा हुए बिजाई सेन ने मंडी रियासत की सत्ता संभाली उस समय वे नाबालिग थे। साल 1866 में व्यस्क होने पर बिजाई सेन का राज्य अभिषेक हुआ। इस अवसर की खुशी पर राजा ने रियासत में स्कूल खोलने की घोषणा की और एंग्लो वर्नाकुलर मिडल स्कूल की स्थापना हुई। साल 1921 में इसे स्तरोन्नत कर हाई स्कूल बनाया गया। साल 1950- 51 तक इस स्कूल को बिजाई स्कूल के नाम से जाना जाता रहा। 100 साल बाद इसे विजय हाई स्कूल के नाम से जाना जाने लगा। साल 1986 में प्रदेश सरकार ने इसे स्तरोन्नत कर वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल बनाया गया। शुरुआती दौर में यहां अंग्रेजी और उर्दू में शिक्षा दी जाती थी। डेढ़ दशक के सुनहरे इतिहास में इस स्कूल ने कई प्रतिभाएं निखारी, जिन्होंने सार्वजनिक में बड़ी प्रतिष्ठा हासिल की।
पहाड़ी शैली में बना वास्तुकला का अनूठा स्कूल भवन

 


देवदार की लकड़ी और पत्थर से निर्मित दो मंजिला यह स्कूल अपने दौर का पहाड़ी शैली में बना वास्तुकला का अनूठा उदाहरण था। भवन की आकृति अंग्रेजी के ओ अक्षर की तरह होने के कारण इसे ओ ब्लाक के नाम से भी पुकारा जाता रहा। लकड़ी के 53 स्तंभों पर टिका कर बनाये गए नक्काशीदार दरवाजे, खिडकियां व दरवाजे और नक्क्शीयुक्त आर्क इस भवन की ख़ूबसूरती में चार चांद लगाते थे। इस भवन की सीढियां अन्दर से थीं और भवन का बड़ा प्रवेश द्वार भी काष्ठकला के शिखर की गवाही देता था। भवन के धरालत का बड़ा हाल पुस्तकालय के तौर पर प्रयोग होता था। लकड़ी के दरवाजों को खोल कर इसी तल के दस कमरों और बरामदों में पहुंचा जा सकता था।


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