जिस दिन देश आजादी का जश्न मना रहा था, बंटवारे की खबर ने ले ली शहीद भगत सिंह के क्रांतिकारी चाचा की जान

Spread the love

जिस दिन देश आजादी का जश्न मना रहा था, बंटवारे की खबर ने ले ली शहीद भगत सिंह के क्रांतिकारी चाचा की जान
डलहौजी से संजीव कौशल की रिपोर्ट
क्रांतिकारी सरदार अजीत सिंह शहीद-ए-आजम भगत सिंह के प्रेरणाश्रोत थे । चाचा के पदचिन्हों पर चलकर ही भगत सिंह क्रान्तिकारी बने। अजीत सिंह ने नेता जी सुभाष चन्द्र बॉस की आजाद हिन्द सेना की स्थापना में मदद की। ग़दर आन्दोलन में अहम् भूमिका अदा करने वाले अजीत सिंह ने ही बॉस की मुलाक़ात हिटलर और मुसोलिनी से कर्ववाई। ‘पगडी संभल जट्टा’ आन्दोलन के नायक रहे अजीत ने 38 सालों तक वतन से बाहर रह कर क्रान्ति की मशाल जलाए रखी। देश की आजादी की खबर उन्होंने डलहौजी में सुनी। इस खबर से उन्हें इस बात का सुकून मिला कि जिस मिशन के लिए उन्होंने जीवन लगा दिया, आखिर वह पूरा हो गया। लेकिन आजादी के साथ देश के बंटवारे की खबर ने अन्दर टक तोड़ दिया और जिस दिन देश आजादी का जश्न मना रहा था, यह क्रांतिकारी सदा सदा के लिए चला गया।
‘पगडी संभल जट्टा’ आंदोलन के नायक
सरदार अजीत सिंह जी का जन्म 23 फरवरी 1881 को हुअा था। औपनिवेशिक शासन की आलोचना और खुलकर विरोध करने पर उन्हें राजनीतिक ‘विद्रोही’ घोषित कर दिया गया था। सरदार अजीत सिंह ‘पगडी संभल जट्टा’ आंदोलन के नायक थे। यह आंदोलन, किसानों से परे, सेना को घेरने के लिए फैल चुका था। 1907 में, लामा लजपत राय के साथ बर्मा में मंडाले जेल को निर्वासित किया गया था। अजीत सिंह के बारे में कभी बाल गंगाधर तिलक ने कहा था ये स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने योग्य हैं।
27 साल की उम्र में छोड़ा देश, विदेशों में बोये क्रांति के बीज
1909 में सरदार अजीत सिंह अपना घर बार छोड़ कर देश सेवा के लिए विदेश यात्रा पर निकल चुके थे, उस समय उनकी उम्र 27 वर्ष की थी। ईरान के रास्ते तुर्की, जर्मनी, ब्राजील, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान आदि देशों में रहकर उन्होंने क्रांति का बीज बोया और आजाद हिन्द फौज की स्थापना में अहम् रोल अदा किया। नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी से मिलाया। उन्होंने रोम, जिनेवा, पेरिस और रियो डी जनेरियो की यात्रा की।
रोम रेडियों को ‘आजाद हिन्द रेडियो’ का नाम
अजीत सिंह ने भारत और विदेशों में होने वाली क्रांतिकारी गतिविधियों में पूर्ण रूप से सहयोग दिया। उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन को चुनौती दी तथा भारत के औपनिवेशिक शासन की आलोचना की और खुलकर विरोध भी किया। रोम रेडियो को अजीत सिंह ने नया नाम दे दिया था, ‘आजाद हिन्द रेडियो’। इसके मध्यम से उन्होंने क्रांति का प्रचार प्रसार किया।
ग़दर पार्टी में काम, बॉस की मदद
1918 में, वह सैन फ्रांसिस्को में गदर पार्टी के निकट संपर्क में आए । 1939 में, वे यूरोप लौट आए और बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मिशन में इटली में मदद की। 1946 में, वह पंडित जवाहर लाल नेहरू के निमंत्रण पर भारत लौट आए। देश से बाहर 38 वर्ष रहने के बाद जब वो भारत वापस आये तो उनकी एक झलक पाने के लिए पूरा कराची स्टेशन पर जमा हो गया था।
पंचपुला में सरदार अजीत की समाधि
दिल्ली में कुछ समय बिताने के बाद वह डलहौज़ी आ गए। यहीं पर उन्होंने आख़िरी सांस ली। 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली तो उनके अंतिम शब्द थे, ‘भगवान का शुक्र है, मेरा मिशन पूरा हो गया है।’ आजादी के यह दीवाने भारत के विभाजन से इतने व्यथित हुए15 अगस्त,1947 को सुबह 4 बजे उन्होंने अपने पूरे परिवार को जगाया, और जय हिन्द कह कर दुनिया से विदा हो गए। डलहौजी से 2 किलोमीटर आगे पंचपुला नामक जगह पर उनकी समाधि बनाई गई है।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *