जिनको है अपने पशुओं से प्यार, देते हैं आरामदायक पशुशाला का उपहार, आधुनिक पक्की पशुशालाएं पंखे, ब्लोअर से लैस नजर, किसान का पशुशाला से है गहरा सम्बन्ध

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जिनको है अपने पशुओं से प्यार, देते हैं आरामदायक पशुशाला का उपहार, आधुनिक पक्की पशुशालाएं पंखे, ब्लोअर से लैस नजर, किसान का पशुशाला से है गहरा सम्बन्ध
सुंदरनगर से पवन चौहान की रिपोर्ट
असली भारत आज भी गांवों में बसता है और गांवों में आज भी पशु पाले जाते हैं। पशु जो हमारी दिनचर्या का एक अहम हिस्सा हैं। किसान के लिए उसके पशु उसका गहना होते हैं और जिस कमरे या मकान में पशु रहते हैं उसे पशुशाला /गौशाला कहते हैं। यह वह जगह होती है जहां पशु अपना सुख-दुख साझा करते हैं। यदि हिमाचल की बात करें तो इस पशुशाला को लोग अपनी-अपनी बोली में अलग-अलग नाम से पुकारते हैं। मंडी में इसे ग्वाएण, बिलासपुर, हमीरपुर में गोढ/ गोहड़, कुल्लू में खुड, कांगड़ा में घराहल या गोढ, सिरमौर में गोंठ, शिमला में ओबरा, चंबा के भटियात इलाके में गोढ तथा भरमौर में ग्वाड़ और इसी तरह लोअर किन्नौर में खुरंग तथा अप्पर किन्नौर में बौंग के नाम से पुकारा जाता है। पशुशाला पशुओं का रात का आश्रय स्थल होता है, जबकि दिन का अपना समय ये खुले आसमान तले गुजारते हैं।
किसान हमेशा से ही पशुओं के प्रति समर्पित रहा है। पशुओं के बगैर किसान खुद को जैसे बेसहारा समझता है। वह इनके लिए हर सुविधा जुटाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता है। यही कारण है कि आजकल की पशुशालाएं आपको नए आधुनिक रुप में पक्की दिवारों व फर्श, पंखे, ब्लोअर, आदि सुविधाओं से लैस नजर आएंगी।
निचले हिमाचल में ‘कपूरा’
हिमाचल में पशुशाला का कमरा निचले इलाकों में पहले पट्टार का तथा ऊपरी इलाकों में लकड़ी और पत्थर के मिश्रण से बनाया जाता था। समतल इलाके में ज्यादातर यह एक मंजिला होती है जिसे ‘कपूरा’ भी कहा जाता है। छत के ऊपर का हिस्सा जिसे ‘तालड़ी’ के नाम से संबोधित किया जाता है होती है। इस तालड़ी का उपयोग पशुओं के लिए सूखा घास, भूसा आदि रखने के लिए किया जाता है। नीचे पशुंओं को बांधा जाता है।
पहाड़ पर दो- तीन मंजिल के नीचे गौशाला
पहाड़ी इलाके की बात करें तो यह पशुशाला दो/तीन मंजिला मकान के सबसे नीचे स्थित हिस्से में होती है। इसका कारण यह रहता है कि इससे पशु एक तो नजदीक और साथ ही मालिक की निगरानी में रहते हैं। इसके अलावा इस कमरे के ऊपर स्थित चूल्हे की गर्मी भी उन्हे ठंड से बचाए रखती है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में ठंड बहुत होती है।
अब मिट्टी की जगह सीमेंटेड फर्श
पहले की पशुशालाओं का फर्श मिट्टी का रहता था, लेकिन अब समय के बदलाव के साथ-साथ यह सीमेंट का हो चुका है। मिट्टी वाला फर्श गर्मी और सर्दी के मौसम में बहुत लाभदायक रहता था। यह पशुओं को मौसम के अनुरुप वातावरण प्रदान करने में सहायता प्रदान करता था। सर्दी आते ही फर्श पर सूखे पत्ते, घास आदि बिछा दिए जाते हैं ताकि पशु सर्दी से बचे रह सकें। हर रोज नए बिछाए जाने वाले पत्ते, घास तह में बिछते रहते हैं और साथ ही साथ पशु के गौंत्र से सड़ते भी जाते हैं। जब यह परत काफी मोटी हो जाती है तब अपनी सुविधानुसार इसे निकालकर मैल के ढेर में शामिल कर दिया जाता है। निकालने तक यह मैल का रुप ले चुकी होती है। गर्मी में इस प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह बिछौना बरसात में फिर बिछाया जाता है, लेकिन इस बार इस प्रक्रिया का उद्देश्य पशुओं को ठंड से बचाना नहीं अपितु गोबर, गौंत्र आदि से पशुओं को गंदे होने से बचाने का होता है। बारिश का मौसम होने के कारण आमतौर पर पशु कई बार कई-कई दिनों तक पशुशाला में रखने पड़ जाते हैं जिसके कारण उनका गंदे होने की संभावनांए बढ़ जाती हैं। इस बिछौने को रोजाना बदला जाता है। बरसात के इस बिछौने में सूखे घास की अपेक्षा हरी पश्रियां या हरा घास ही रहता है। पशुशाला के अंदर गाड़े गए खूंटे/खुंडे पर पशु बांधे जाते हैं और वहीं पर ही खुरली (चारा डालने की जगह) का निर्माण भी किया जाता है ताकि चारे की बर्बादी न हो।
शिव शकर को समर्पित गाय
पशुशालाओं के साथ हमारा धार्मिक महत्व भी जुड़ा है। जब गाय किसी बछड़े को जन्म देती है तो गाय का दूध पहले जूठा नहीं किया जाता है। विसम संख्या के दिनों (अमूमन 7 या 9) तक दूध को जमाया जाता है। उस दूध से जो घी निकाला जाता है उसे पहले शिव शंकर के मंदिर में चढ़ाया जाता है। इससे पहले घर पर ही गाय के खूंटे और गाय की पूजा की जाती है। खूंटे को अच्छी तरह से पानी से धोने के पश्चात गाय के गोबर का चौका दिया जाता है तथा साथ ही साथ गाय को नहलाकर या मौसम के अनुरुप गाय के सिर्फ पैरों को धोकर गाय और उसके खूंटे का प्रसाद, दूध, घी, फूल, दूब और सिंदूर आदि से पूजन किया जाता है। इसके पश्चात मंदिर में घी, दूध को चढ़ाने के बाद ही गाय के दूध का सेवन परिवार में किया जाता है। गाय को शिव शकर को समर्पित माना जाता है।
लखदाता पीर को समर्पित भैंस
इसी तरह भैंस समर्पित रहती है देवता लखदाता पीर को। भैंस के बच्चा देने के बाद के पहले दूहे दूध से बाहुली तैयार की जाती है तथा मक्की की रोटी से तैयार चुरी के साथ लखदाता पीर को चढ़ाई जाती है व साथ ही साथ प्रसाद के रुप में गांव में बांटी जाती है। यदि किसी के भैंस के गर्भ न ठहरता हो तो लखदाता पीर से इसके लिए प्रार्थना की जाती है। कई परिवार मंदिर जाकर या घर से ही धूप/अगरबती जलाकर यह सुखना (प्रार्थना) भी करते हैं कि यदि हमारी भैंस गर्भवती हो जाती है तो हम आपकी सेवा में घर/मंदिर में जागरण करवाएंगे। गर्भवती होने या बच्चा देने पर घर वाले परेहाइ (ढोल बजाने वाले) बुलाते हैं या फिर पूरी रात भर टमक (लखदाता पीर का वाद्ययंत्र) बजाते हैं तथा जागरण होता है। यह एक जश्न का माहौल होता है और लोग बारी-बारी से टमक बजाकर लखदाता का आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।
‘चिडन्याला’ साजा याद करो
पशुशाला से जुड़ा हर कार्य शुभ दिन को ध्यान में रखकर ही निपटाया जाता है। पौश महीने में कोई भी नया कार्य आरंभ करना शुभ नहीं समझा जाता, इसलिए किसी भी नए कार्य का इस महीने से पहले ही श्रीगणेष कर दिया जाता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पौश महीने के शुरु होने से पहले ही पशुशाला के फर्श पर बिछे मैल को हल्का सा निकाल दिया जाता है ताकि यदि इस महीने के बीच मैल निकालने की जरुरत पड़े तो इस कार्य में कोई बाधा न आए। लोकभाषा में इसे ‘अउरा महीना’ भी कहा जाता है। इसी कड़ी में नागपंचमी के दिन गाय के गोबर को पांच छोटे-छोटे नाग या गोल आकार में आकृति प्रदान कर इन्हे पशुशाला के दरवाजे के ऊपर चिपका दिया जाता है। इस पर फूल, द्रुब आदि लगाकर देवता माहुंनाग (सांपों के देवता) से प्रार्थना की जाती है कि वे सांप व कीड़े-मकोड़ों से उनके पशुओं की रक्षा करे। इसी दिन बरसात के कारण बंद पड़ी उपले बनाने की प्रक्रिया को फिर से षुरु कर दिया जाता है तथा साथ ही साथ क्यारियों में बीज डालकर नई फसल बोने का शुभारंभ भी कर दिया जाता है। सावन के महीने में आने वाले साजे के दिन पशुशाला के बाहर आग जलाकर 5 या 7 चिडणों (ब्राउन इयर टिक) को पशुओं से निकालकर इस आग में जला दिया जाता है और इस साजे के दिन यह फरियाद की जाती है कि हे ईश्वर, हमारे पशुओं को इन चिडणों से बचाकर रखना। इस साजे को आम भाषा में ‘चिडन्याला’ कहकर संबोधित किया जाता है।
नई नस्ल नहीं पशुपालक
एक बात जो आज अखरती है वह यह कि आज की पीढ़ी पशु पालने की इस परंपरा को तिलांजलि देती नजर आ रही है। इस भागमभाग में उसके पास पशु पालने का विचार तक नहीं कौंधता। जहां पहले सभी ने अपने घरों में अपने गुजारे के लिए पशु पाले होते थे वह परंपरा आज धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। अब इसे मात्र व्यवसाय की दृष्टि से ही देखा जा रहा है। इस कारण पहले जहां नए मकान बनाने के साथ पशुशाला के लिए भी पहले ही जगह निश्चित कर दी जाती थी आज वह जगह धीरे-धीरे मकान के नक्शे से गायब हो रही है, लेकिन पशुशालाओं का वजूद वहां देखा जा सकता है जहां अभी हमारी पिछली पीढ़ी दम हांक रही है।
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 पवन चैहान, गांव व डाकघर, महादेव
तहसील सुंदरनगर, जिला- मंडी (हि. प्र.)- 175018

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