जय महाकाली आयो गोरखाली : अर्की के मलौण किले से निकली मलौण रैजिमेंट के नाम से पहली गोरखा रेजिमेंट

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जय महाकाली आयो गोरखाली : अर्की के मलौण किले से निकली मलौण रैजिमेंट के नाम से पहली गोरखा रेजिमेंट
चंडीगढ़ से वीरेंद्र शर्मा ‘वीर’ की रिपोर्ट
दुनिया को अपने शौर्य और पराक्रम से दिल दहला देने वाली जंग में 16 अप्रैल 1815 को ब्रिटिश सेना की 200 नेपाली सैनिकों के साथ भयंकर लड़ाई हुई, जिसमें नेपाली सेना के 100 सैनिक मारे गए। गोरखा सैनिकों ने भक्ति सिंह थापा की अगुवाई में मात्र खुखरी और तलवारों के दम पर तीन दिन चले भीषण युद्ध में बंदूकों और तोपों जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश भारतीय सेना के छक्के छुड़ा दिए। 16 अप्रैल 1815 में देवथल इलाके में मलौण किले में गोरखा एंग्लो युद्ध लड़ा गया तो 74 साल के भक्तिथापा गोरखा सेना के नायक थे। विभिन्न स्थानों पर विजयी पताका फहराने के बाद इस युद्ध में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान देवथल के पश्चिमी मोर्चे पर मलौण किला था। उन्होंने संख्यात्मक रूप से बेहतर ब्रिटिश सेना पर पलटवार का नेतृत्व किया और शहादत पाई। भक्तिसिंह थापा की शहादत के बाद नेपाल के ध्वज के पायदान पर बैठे उनके पुत्र राम दास ने बाड़ा काजी अमर सिंह थापा से सलाह कर नेपाली सेना में जोश भरते हुए उसे प्रोत्साहित किया। हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था और इस लड़ाई के खत्म होने के बाद एंग्लो-नेपाल युद्ध ने एक अलग मोड़ ले लिया। गोरखा सेना को सीमा विस्तार की मुहिम को विराम लगा कर वापिस जाना पड़ा था।
तोपों और बंदूकों के सामने मात्र खुखरी से युद्ध का साहस
मेजर जनरल डेविड ऑक्टरलूनी के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने गोरखा सेना पर विजय प्राप्त की। तोपों और बंदूकों के सामने मात्र खुखरी से युद्ध लडऩे जैसा अदम्य साहस दिखाने वाले गोरखा सेना की टुकड़ी के कमांडर भक्ति सिंह थापा की वीरता, युद्ध कौशल एवं शौर्य के आगे अंग्रेज नतमस्तक हुए बिना न रह सके। अंग्रेजों ने भक्ति सिंह थापा के पार्थिव शरीर पर दोशाला ओढ़ाकर न केवल सम्मान दिया, बल्कि किले पास ही ढलान पर ससम्मान अंतिम संस्कार में सहायता भी की। उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनकी दो पत्नियों ने सती (अपने पति की चिता पर खुद को जला लेना) हो गईं। मलौण युद्ध के कुछ दिन बाद 24 अप्रैल 1815 को मलौण रैजिमेंट के नाम से पहली नसीरी बटालियन यानि पहली गोरखा रेजिमेंट का गठन करके इसे सेना में शामिल कर लिया।
दो बीघा भूमि पर किले का निर्माण
गोरखा लड़ाकों ने सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस‌ किले का निर्माण ऊंची पहाड़ी पर विशाल वॉच-टॉवर(दुश्मन पर नजर रखने के लिए ऊंची प्राचीर) प्रकार की संरचनाओं के साथ लगभग 2 बीघा भूमि में किया था।
परिसर में एक मां काली का मंदिर है। अठारहवीं सदी के समय से हनुमान, भैरव और अन्य देवताओं की मूर्तियों सहित एक बाघ की प्राचीन मूर्ति भी यहां विद्यमान हैं। स्थानीय लोगो के अनुसार यंहा की प्राचीर पर बड़ी- बड़ी तोपे तैनात थीं। एक तोप जब रामशहर की ओर चलाई गई थी तो इतनी जोरदार गर्जना हुई थी कि इस क्षेत्र के आस- पास गर्भवती पशुओं के गर्भ तक गिर गए थे। लड़ाई में इस्तेमाल की गई तोपों को तो किले में रखा गया था, लेकिन कुछ वर्ष पहले उन्हें गोरखा ट्रेनिंग सेंटर संग्रहालय सुबाथू ले जाया गया है।
पुजारी ने राजा से मांग लिया दान में किला
मलौण किले का इतिहास हण्डूर रियासत से भी जुड़ा हुआ है। 1800 ईसवीं में राजा राम शरण सिंह नालागढ़ रियासत के राजा थे। मलौण किले पर भी इन्ही का आधिपत्य हुआ करता था। किले में स्थापित काली माता के मंदिर में कोलकत्ता से आए कालिदास ठाकुर पुजारी थे। किंवदंती के अनुसार काली दास ठाकुर ने माता को प्रसन्न करने के लिए तीन बार अपना शीश काट कर चढ़ाया था,परन्तु माता की कृपा से वे हर बार जीवित हो जाते थे। नालागढ़ रियासत के राजा को जब इस प्रकरण का पता चला तो उन्होंने पुजारी से मां के दर्शनों की फरियाद की। पुजारी ने जब माता का आह्वाहन किया तो माता सिंह पर सवार होकर आई। उस दौरान ऐसी भयंकर गर्जना हुई कि डर से राजा ने पुजारी को मां के दीदार से मना कर दिया और पुजारी को कुछ भी मांगने के लिए कहा। पुजारी ने राजा से मलौण सहित दो गांव मांगे। यह जिला का एकमात्र मन्दिर है, जहां राजपूत पुजारी है। आज भी कालिदास ठाकुर के परिजन इस कार्य को बड़ी ही लग्न व शिद्दत से निभा रहे है। राजाओं के समय से इस परिवार का लगान आज भी माफ है।
‘कायर हुनु भंदा मरनो राम्रो’
मालौण में पहली गोरखा राइफल्स की स्थापना हुई थी। इसे एक गोरखा राइफल्स या संक्षिप्त रूप में 1 जीआर के रूप में जाना जाता है। रेजिमेंट का एक लंबा इतिहास रहा है और इसने कई संघर्षों में सफलतापूर्वक भाग लिया है। गोरखा रेजिमेंट ने 1965 और 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ कई अभियानों में भी भाग लिया है और संयुक्तराष्ट्र के हिस्से के रूप में शांति व्यवस्था का भी काम किया है। गोरखा राइफल्स को अदम्य साहस व बहादुरी के लिए दो विक्टोरिया क्रॉस, एक परमवीर चक्र,क्रसात महावीर चक्र, सोलह वीरचक्र, एक कीर्ति चक्र, तीन शौर्य चक्र एवं बाइस सेना मैडल मिले हैं। गोरखाओं का मूल मंत्र रहा है ‘कायर हुनु भंदा मरनो राम्रो।’ यानि कायर होने से मरना बेहतर है। हर साल गोरखा रेजिमेंट की ओर से भक्तिसिंह थापा के शहीदी दिवस पर उन्हें उनकी समाधि पर पहुंच की श्रद्वासुनम अििर्पत किए जाते हैं। सन 1741 में लामजुंग, नेपाल में जन्मे भक्तिसिंह थापा नेपाल के भी ऐतिहासिक राष्ट्रीय नायक हैं।
ऐसे कर सकते हैं मलौण किले की सैर
हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला में गोरखा किला के नाम से विख्यात मलौण किला जिला सोलन एवं बिलासपुर सीमा के पास होने के कारण मलौण किले के जाना जाता है। शिमला-बिलासपुर उच्च मार्ग द्वारा ब्रह्मपुखर से पहले जयनगर सडक़ मार्ग से बाईफर्केशन दयोथ देवथल-मैलथी-जामली रोड होते हुए किले तक पहुंचा जा सकता है। मैठी लोहारघाट मार्ग पर मलौण नामक ये किला गांव के ऊपर ऊंची चोटी पर है। सडक़ मार्ग के बाद किले तक पहुंचने के लिए कच्ची सर्पीली सडक़ या फिर दिलचस्प ट्रेकिंग मार्ग का रोमांच लेते हुए पहुंचा जा सकता है।

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