जयपुर से प्रकाशित होने वाली ‘राजस्थान पत्रिका’ में साल 1991 से लगातार छप रहे शिमला के इस डॉक्टर के आलेख, मिलिए आयुर्वेद को सरल हिंदी में घर -घर पहुंचाने वाले डॉ. अनुराग विजयवर्गीय से

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जयपुर से प्रकाशित होने वाली ‘राजस्थान पत्रिका’ में साल 1991 से लगातार छप रहे शिमला के इस डॉक्टर के आलेख, मिलिए आयुर्वेद को सरल हिंदी में घर -घर पहुंचाने वाले डॉ. अनुराग विजयवर्गीय से
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
भारतीय धर्म शास्त्रों में स्वास्थ्य को सबसे बड़ा धन माना गया है। यह बात इस उक्ति से स्पष्ट हो जाती है, कि पहला सुख निरोगी काया। स्वास्थ्य संबंधित जन जागृति के कार्य को मिशन मानते हुए स्वास्थ्य लेखन के अति महत्वपूर्ण कार्य से अनवरत जुड़े हुए डॉ. अनुराग विजयवर्गीय। डा. विजयवर्गीय स्वास्थ्य एवं आयुर्वेद की जानकारियां आम पाठकों तक पहुंचाने के लिए मिशनरी भावना से जुड़े हुए हैं। डॉ. विजयवर्गीय का मातृभाषा हिंदी के प्रति अगाध आस्था एवं लगाव है। इसी ने इन्हें हिंदी में लिखने को गतिशील रखने हेतु सतत प्रेरित किया है। विजयवर्गीय के आलेखों को धर्मयुग (टाइम्स ऑफ इंडिया), कादंबिनी, दैनिक हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता, सरिता, मुक्ता,गृहशोभा, गृहलक्ष्मी, मेरी सहेली, तीज, भारतीय गृह देवी, हेल्थ और न्यूट्रिशन, आयुर्वेद विकास, गिरिराज शिमला, दैनिक नवज्योति, पंजाब केसरी, इत्यादि पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर स्थान मिलता रहा है।
1000 से ज्यादा शोधपरक आलेख प्रकाशित
उल्लेखनीय है कि जयपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में डॉ. अनुराग के स्वास्थ्य एवं आयुर्वेद विशेष सौ से भी अधिक आलेख श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रकाशित हुए हैं। वे ये आलेख सन 1991 से इस समाचार-पत्र में लिख रहे हैं, जो उनकी विस्तृत जानकारी तथा योग्यता का प्रमाण है। इन्हें पाठकों के द्वारा भरपूर सराहना भी मिलती रही है। उनके लिखित एवं प्रकाशित आलेखों की संख्या 1000 से ज्यादा पहुंच चुकी है नियमित रूप से लेखन करना डॉक्टर विजयवर्गीय की दिनचर्या का अभिन्न अंग बन चुका है। वह ब्रह्म मुहूर्त के शांत एवं नीरव परिवेश को लेखन कार्य के संदर्भ में नितांत उत्प्रेरक मानते हैं।
पिता से मिला हिंदी में सेवा का गुर
डॉ. विजय वर्गीय अपने कलम कौशल का श्रेय स्वर्गीय पिता श्री मोतीलाल विजयवर्गीय को देते हैं, जिन्होंने हिंदी भाषा की बारीकियों बारीकियों की घुट्टी पिलाते हुए मातृभाषा हिंदी के प्रति लेखक का अनुवाद भाव जागृत किया‌। जिसके बिना लेखन कार्य करना असंभव था‌। यहां पर प्रसंगवश स्मरणीय है कि डॉ. अनुराग के पिता भी हिंदी भाषा मर्मज्ञ के रूप में सुविख्यात रहे हैं। वे शिक्षा विभाग में प्रधानाचार्य पद पर रहे तथा उन्होंने हिंदी भाषा के मानकीकरण के बारे में अनेकानेक पुस्तकें लिखी।
हिंदी में लिखने के लिए दो बार राष्ट्रीय सम्मान
डा. विजयवर्गीय विगत दो दशकों से विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के जटिल समस्याओं की प्रामाणिक जानकारियां पूर्ण वैज्ञानिक ढंग से सरल हिंदी भाषा एवं रोचक शैली में देश की देश विदेश की जान जनता तक पहुंचाने के चुनौतीपूर्ण कार्य में मिशनरी भावना से जुड़े हुए हैं। यह डॉ. विजयवर्गी एक ही सशक्त लेखनी का ही प्रताप था कि उन्हें भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के द्वारा दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
सर्जरी से बचाये कई रोगी
यह डॉक्टर अनुराग की महानता है कि अपने चिकित्सा संबंधी अनुभवों को वह बिना छुपाए हुए नियमित रूप से बिना किसी आलस्य के लिपि-बद्ध करते हुए पुस्तक के रूप में मानवता के हितार्थ प्रकाशित कर देते हैं। रोगों के मूल कारण तक पहुंच पाने की कुशलता के कारण ही आप ने गॉल ब्लैडर की पथरी, किडनी स्टोन, फाइब्राइड यूट्रस (रसौली) तथा ओवेरियन सिस्ट के अनेक रोगियों का दर्द पूर्ण एवं महंगी सर्जरी से बचाव किया है। उनके बताए गए उपचारों की बदौलत देश भर में अनेक अनेक रोगियों को समग्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हुआ है। उन्होंने अनेक रोगियों को आहार विहार की आदतों में बदलाव करते हुए ही ठीक किया है, जिनको अर्वाचीन चिकित्सा विशेषज्ञों ने सर्जरी की सलाह दी थी।
शैक्षणिक योग्यताएं-
वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के एकमात्र आयुर्वेदिक शिक्षण संस्थान गुजरात आयुर्वेद यूनिवर्सिटी, जामनगर से आयुर्वेदिक मौलिक सिद्धांत एवं दर्शन विषय में एम.डी. उपाधि धारक हैं। आपने भारत सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर से आयुर्वेद आचार्य की डिग्री1993 में प्राप्त की। 1986 में आयुर्वेद में प्रविष्ट हुए थे।
डॉ अनुराग की प्रकाशित पुस्तकें
अभी तक डॉ अनुराग द्वारा आयुर्वेद विषय पर लिखित दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। पहली पुस्तक फलों से स्वास्थ्य संवर्धन 1999 में ही प्रकाशित हो गई थी। चौखंबा संस्थान से प्रकाशित हुई पुस्तक ‘भारत में स्वास्थ्य पत्रकारिता’ नामक पुस्तक के लेखक प्रोफेसर यशवंत कोठारी ने डॉक्टर विजयवर्गीय की गणना देश के चुने हुए लेखकों में की है।डॉक्टर विजयवर्गीय के द्वारा लिखित एवं प्रकाशित पुस्तकों का विवरण-
1.फलों से स्वास्थ्य संवर्धन
2.जीवनदायिनी हरड़
3.स्वास्थ्य रक्षक बहेड़ा
4.अमृत फल आंवला
5. स्वास्थ्य संबंधी लोक कहावतें
6. जीवन शैली के रोग और आयुर्वेद
7. आयुर्वेद संपूर्ण स्वास्थ्य का आधार
8. सर्जरी से पहले
आयुर्वेद आजमाएं
9. आयुर्वेद पुरूषों के लिए
10. स्वास्थ्यवर्धक पेय।
काम को सम्मान
वे दो बार महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणब के कर कमलों से राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत हो चुके हैं। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के द्वारा सन 2010- 11 के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान विज्ञान हिंदी मौलिक लेखन पुरस्कार उनकी पुस्तक ‘जीवनशैली के रोग और आयुर्वेद’ को महामहिम राष्ट्रपति महोदय के कर कमलों से नई दिल्ली के विज्ञान भवन में प्राप्त हो चुका है। पुस्तक ‘आयुर्वेद संपूर्ण स्वास्थ्य का आधार ‘ को वर्ष 2014 में भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के द्वारा ही महामहिम राष्ट्रपति महोदय के कर कमलों से राष्ट्रीय पुरस्कार राष्ट्रीय राजभाषा गौरव पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। ये दोनों पुस्तकें बैस्ट सेलर है।
सरकारी नौकरी के साथ लेखन
निस्संदेह डॉ. अनुराग विजयवर्गीय अंग्रेजी भाषा के मोह को त्यागकर मातृ भाषा हिंदी के प्रति अगाध आस्था लगाव के साथ आयुर्वेद एवं स्वास्थ्य जैसे जटिल विषय पर भी भारत के आमजन के स्वास्थ्य के हितार्थ हिंदी भाषा में अपने लेखनी को सतत गतिशील बनाए हुए हैं। इन दिनों राज्य सेवा में रहते हुए भी हिमाचल प्रदेश में अपनी सृजनात्मकता को संपूर्ण मानवता के हितार्थ अनवरत जिंदा रखते हुए डॉ. विजयवर्गीय जिस भावना से कार्य कर रहे हैं, वह निस्संदेह सबके लिए प्रेरणादाई बात है।
रोगों के मूल कारण तक पहुंचने की कुशलता
रोगों के मूल कारण तक पहुंच पाने की कुशलता के कारण ही उन्होंने गॉल ब्लैडर की पथरी, किडनी स्टोन, फाइब्राइड यूट्रस (रसौली), तथा ओवेरियन सिस्ट के अनेक अनेक रोगियों का दर्द पूर्ण एवं महंगी सर्जरी से बचाव किया है। उनके बताए गए उपचारों की बदौलत देश भर में अनेक अनेक रोगियों को समग्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हुआ है। ऐसे अनेक रोगियों को आहार विहार की आदतों में बदलाव करते हुए ही ठीक किया है, जिनको अर्वाचीन चिकित्सा विशेषज्ञों ने सर्जरी की सलाह दी थी।
कई रोगों के उपचार में माहिर
एलजीमर्स, ट्राई जेमिनल र्न्यूराल्जिया, एंजायटी न्यूरोसिस, पार्किंसन, ओवेरियन सिस्ट, फाइब्राइड्स, कार्पल टनल सिंड्रोम, स्लिप- डिस्क, सोरायसिस, ग्लूकोमा, मैक्युलर डिजनरेशन, ब्रेन ट्यूमर,थायराइड संबंधी विकार, चिकनगुनिया, डेंगू, थैलेसीमिया, अल्सरेटिव कोलाइटिस, कैंसर , किडनी फैलियर, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, लो ब्लड प्रेशर, डायबिटीज माइग्रेन, यूरिक एसिड बढ़ना, कोलेस्ट्रॉल बढ़ना इत्यादि आज की जीवनशैली की देन रोगों के सफल आयुर्वेदीय उपचार में उनको महारत है तथा पहचान है.
पालने में दिखे पूत के पांव
बचपन में चंपक, नंदन, पराग, बाल भारती, बाल हंस, सुमन सौरभ, गुड़िया इत्यादि बाल पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कार्य किया। उनमें संवेदनशीलता कूट-कूट कर भरी हुई है, जो कि जहां उनको एक अच्छा लेखक तो बनाती है, साथ ही इसी संवेदनशीलता के चलते वे बहुत अच्छे चिकित्सक के रूप में भी प्रसिद्ध है। इतना ही कह सकते हैं-
‘जहां भी रहेगा रोशनी लुटाएगा।
किसी चिराग का अपना मकान नहीं होता।’
कई डॉक्टरों के काम आ रही इस डॉक्टर की पुस्तकें
विजयवर्गीय की पुस्तकों के माध्यम से आयुर्वेद के अनेकानेक गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन सरल, एवं आसान हिंदी भाषा में हुआ है। उनकी पुस्तकें जन सामान्य, बुद्धि जीवियों, स्वस्थ एवं स्वस्थ लोगों के साथ-साथ आयुर्वेद के प्रति आस्थावान चिकित्सकों के लिए भी संग्रह योग्य एवं उपयोगी साबित हो रही हैं. देश भर में आयुर्वेदिक चिकित्सक इन पुस्तकों के सहयोग से सफल आयुर्वेदिक उपचार कर रहे हैं।
रोगमुक्त जीवन जीने का राज
डॉ. विजयवर्गीय द्वारा लिखित पुस्तकों तथा आलेखों में आयुर्वेद के पहले पक्ष स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना पर विस्तार से चर्चा की गई है। जन सामान्य को स्वास्थ्य संबंधी उन आधारभूत नियमों की जानकारियां आम भारतीय भाषा हिंदी में उपलब्ध कराई गई है, ताकि स्वस्थ व्यक्ति उन नियमों का पालन करते हुए अपने स्वास्थ्य को भलीभांति रक्षा कर सके और रोगमुक्त जीवन जीते हुए शतायु हो सके। इन दिनों वे मंत्र चिकित्सा, संगीत चिकित्सा, मेडीटेशन, हस्त मुद्रा चिकित्सा, डाइट थैरेपी, लाफ्टर थेरेपी इत्यादि ड्रगलैस थैरेपीज पर विस्तृत व्यावहारिक कार्य कर रहे हैं।

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