छोटी काशी को साहित्य चूड़ामणि भवानी दत्त शास्त्री ने मंडियाळी में दिया कृष्ण का संदेश, इस अमर कृति के रचनाकर्म में लगे 27 साल 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

छोटी काशी को साहित्य चूड़ामणि भवानी दत्त शास्त्री ने मंडियाळी में दिया कृष्ण का संदेश, इस अमर कृति के रचनाकर्म में लगे 27 साल 
मंडी से विनोद भावुक की रिपोर्ट
रियासतकाल में मंडी राजघराने के गुरू रहे साहित्य चूड़ामणि पंडित भवानी दत्त शास्त्री ने छोटी काशी को मंडयाली में कृष्ण के संदेश को घर- घर पहुंचाया। उन्होंने मंडियाळी में गीता के 700 श्लोकों का अनुवाद किया है। इस कार्य के लिए 27 साल का लम्बा वक्त लगा और यह महान कृति देवभूमि प्रैस मंडी से प्रकाशित हुई। मंडियाळी में उनका संग्रह ‘सोचां पहाड़ दियां’भी खूब चर्चित रहा। चार भाषा में एक साथ सृजन के लिए उनकी कृति कुसुमांजलि अपनी तरह की दुनिया की अदभुत साहित्य कृति है, जिसमें चार भाषाओं अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत व मंडियाळी में हर रचना लिखी गई है।
साहित्यकार संग चित्रकार
उनकी रचना गीतामृतम 1954, कविता संग्रह पूणे से प्रकाशित हुई। प्रकाशित पुस्तकों में भज गोविन्दम पहाड़ी अनुवाद सहित संस्कृत गीत (1977)। हिम-कुसुमांज्जलि संस्कृत काव्य- सान्वय तथा हिंदी पहाड़ी और अंग्रेजी (1978) भावानुवाद सहित। लेरा धारां दी पहाड़ी गीत तथा कविताएं हिम-सुमन-गुच्छम्ंा् संस्कृत काव्य, हिंदी अनुवाद सहित (1987), विपासा-लास : संस्कृत काव्य पहाड़ी पद्यानुवाद सहित (1988), श्रीमद्भागवत गीता -पहाड़ी पद्यानुवाद सहित (1989), ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक आदि उपनिषदों का हिंदी व पहाड़ी अनुवाद शामिल हैं। भवानी दत्त शास्त्री जितने अच्छे साहित्यकार थे उतने ही उच्च श्रेणी के चित्रकार थे। उन्होंने 300 तैलीय जल चित्र भी बनाए।
आज भी चल रहीं गीता की कक्षाएं
भवानी दत्त शास्त्री ने 1938 में शास्त्री की पढ़ाई करने के बाद मंडी रिसायत में शिक्षा का बीड़ा उठाया। वे 24 साल तक मंडी राज परिवार के दमदमा महल में शिक्षा का प्रकाश करते रहे। उन्होंने खत्री सभा में गीता की कक्षाएं शुरू कीं और अनपढ़ महिलाओं तक को गीता का पाठ कंठस्थ करवा दिया। बेशक 26 सितंबर 2008 को शास्त्री इस दुनिया को छोड़ कर चले गए, लेकिन उनकी शुरू की गईं गीता की कक्षाएं आज भी चल रही हैं। उन्होंने 20 अगस्त 1948 को साहित्य सदन की स्थापना की।
बहुत कुछ सहेजना बाकि
भवानी दत्त शासत्री ने माण्डूक्योपनिषद, ऐतरेयोपनिषद, तैतरेयोपनिषद, श्वेताश्तवरोपनिषद, तत्व चिंतन सोपान संस्कृत खंड काव्य, हिंदी अनुवाद, वेदांत दर्शन (ब्रह्म सूत्र) का भी मंडियाळी में अनुवाद किया लेकिन ये सब पांडुलिपियां प्रकाशन तक नहीं पहुंच पाईं। ऐसे में साहित्य मेें उनकी दूरदर्शिता व गहराई के काम का सही मूल्यांकन होना बाकि है।
‘पहाड़ी साहित्य चूड़ामणि’ पुरस्कार
वर्ष 1989 में उन्हें गीता के मंडियाळी में अनुवाद के लिए ‘पहाड़ी साहित्य चूड़ामणि’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साहित्य साधना के लिए उन्हें वर्ष 1994 भाषा कला संस्कृति अकादमी का अकादमी शिखर सम्मान, साल 1998 में पहाड़ी साहित्यकार पुरस्कार , वर्ष 2000 में माण्डव्य रत्न व भारत ज्योति पुरस्कार तथा चित्रकला के लिए सोभासिंह अवार्ड मिले।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *