‘चम्बा की आत्मा अब अजीब छटपटाहट से भरी बेचैन, व्यग्र और बदहवास नजर आती है’ लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित अमीन चिश्ती के मन की बात

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‘चम्बा की आत्मा अब अजीब छटपटाहट से भरी बेचैन, व्यग्र और बदहवास नजर आती है’ लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित अमीन चिश्ती के मन की बात
चम्बा से मनीष वैद की रिपोर्ट
जिला चंबा की मौलिक लोककला एवं संस्कृति का स्वरूप अत्यंत विराट एवं वैभवशाली रहा है। इस प्राचीन ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत की सुदृढ़ परंपराओं को सहेजने, इसके प्रचार-प्रसार, इसे सजाने- संवारने के लिए जुटी अनेकों प्रतिभाओं की लंबी फेहरिस्त में कई ऐसे नाम है, जो केवल अपनी कला साधना से ही सरोकार रखकर अपनी आत्मा को इन्हीं परंपराओं में टटोलने में मशगूल हैं। विराट कला एवं सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं की ओट में संघर्षशील यह नाम कभी सरकारी संरक्षण की धूप की चाहत नहीं रखते। मौन भाव से अपनी समृद्ध विरासत के मौलिक अंशों को आमजन से रूबरू करवाने के जुनून में जिंदगी का लंबा सफर तय करने के बावजूद भी उपलब्धियों से तृप्त नहीं होते। प्रशंसा की लालसा में कभी चीत्कार या उन्माद से अपनी उपस्थिति का भान नहीं करवाते। बस आंसुओं के मेध में नहाई हुई उस विधवा की भांति मूक भाव से कल्पना करते हैं, तो उस कैनवास की जिस पर क्षमताओं की सूक्ष्म खुश्क तूलिका से अविस्मरणीय भविष्य के चित्र को उकेरना है। एक ऐसा ही नाम है जिला चम्बा के मोहल्ला पक्काटाला में 19 जुलाई 1961 में पुलिस अधिकारी स्व. मोहम्मद यूसुफ के परिवार में पैदा हुए मु. अमीन शेख चिश्ती का, जिन्होंने न केवल फुटपाथ पर साइन बोर्ड रंगते अनेकों युवाओं के अंधेरे जीवन में रंग भर कर उनके लिए स्वरोजगार के नए द्वार ही खोलें, अपितु खुद क्लास वन अधिकारी के पद तक पहुंचते- पहुंचते अनेकों उपलब्धियों को भी अर्जित किया है।
मिनिएचर पेंटिंग के कपड़े पर उकेरने की पहल
शिक्षा दीक्षा ग्रहण करने पश्चात अमीन चिश्ती ने वर्ष 1981 में सेनेटरी इंस्पेक्टर की ट्रेनिंग के लिए दिल्ली का रुख किया। ट्रेनिंग को अधूरा छोड़कर जब चम्बा वापिस आए तो भविष्य की चिंता सताने लगी। तब सड़क के किनारे खुले आकाश के नीचे एक पेटी में रंग लेकर चिश्ती ने साइन बोर्ड, नंबर प्लेट, नेम प्लेट लिखने का कार्य शुरू किया। सुखद अनुभूति यह रही कि किसी से भी पेंटिंग का विधिवत ज्ञान हासिल न करने के बावजूद चिश्ती का काम तेजी से चल निकला। फुटपाथ पर उन्होंने न केवल युवाओं को पेंटिंग क्षेत्र में निपुण करके रोजगार के अवसर ही उपलब्ध करवाया अपितु साइन बोर्ड लिखने में से आगे बढ़कर पहाड़ी सूक्ष्म चित्रकारी के क्षेत्र में भी नए आयाम दिए। विशेष कागज पर उकेरे जाने वाली मिनिएचर पेंटिंग को सिल्क, पापलेेंन और मलमल के कपड़े पर उकेरने की नई परंपरा को शुरू करवा कर इसे इंडियन मिनिएचर पेंटिंग का नाम दिया। अपनी सेवानिवृत्ति के पश्चात घर में स्थापित अपनी रंगशाला में वह, यह प्रयास अपने शिष्यों के साथ निरंतर जारी रखे हुए हैं ।
चम्बा लोक कला मंच के फाउंडर
कला का पर्याय बन कर उभरे चिश्ती ने चम्बा लोक कला मंच के फाउंडर सदस्य के रूप में लोक सांस्कृतिक विरासत पर आधारित अनेकों कार्यक्रमों में राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन सहभागिता निभाकर, वरिष्ठ व गुणी कलाकारों के कलात्मक गुणों को आत्मसात किया। नुक्कड़, मंच रेडियो, टेलीविजन,फिल्म इत्यादि विभिन्न माध्यमों से अपनी समृद्ध विरासत के मौलिक स्वरूप को प्रस्तुत करने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस शख्सियत का रंगमंच में विशेष रुझान होने के कारण उन्होंने चम्बा रंग दर्शन चम्बा की स्थापना की। बीसियों नाटकों में अभिनय, लेखन और निर्देशन करने वाले चिश्ती की रंगमंच क्षमताओं को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली व भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश के संयुक्त तत्वाधान में साल 1985 में शिमला में आयोजित एक माह की नाट्य कार्यशाला से बल मिला।
नाटकों के लिए समर्पित दम्पति
वर्ष 1987 में लोक गायिका एवं रंगमंच की अदाकार मंजू शर्मा से विवाह उपरांत चिश्ती दंपति ने चंबा रंगमंच को तीव्र गति प्रदान करने के उद्देश्य से अनेकों नाटकों को मंचित करवा कर नए अध्याय का सशक्त सूत्रपात किया। अंधा युग, आधे अधूरे , छिंबी दलपत, आज का एकलव्य ,सिहासन खाली है , कोणार्क, शिल्पी का बदला, काला ताज ,यह भी एक खेल है ,मर्यादा की बेदी पर ,अंधेर नगरी चौपट राजा , पोस्टर,फुलमु रांझू, शहंशाह ईडिपस इत्यादि अनेकों हिंदी व चमब्याली नाटकों के मंचन जहां चम्बा रंगमंच की उजली भोर के रूप में याद किए जाते हैं।
एक हजार से ज्यादा नाटकों का मंचन
इसी दौर में चिश्ती ने नुक्कड़ नाटकों की नई परंपरा का सूत्रपात भी किया। जनता पागल हो गई है, टोबा टेक सिंह, रेत पर उभरते पांव, क्या कोई जवाब है, इत्यादि ऐसे सैकड़ों नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन जहां दर्शकों की अपार भीड़ जुटाकर नए रंगकर्मियों के हौसलों को बढ़ाकर चम्बा रंगमंच की नींव सशक्त कर रहे थे, वही नशा निवारण पर आधारित मीठा जहर जैसे नुक्कड़ नाटक प्रदर्शन का आंकड़ा एक हज़ार से भी ऊपर ले जाकर कीर्तिमान स्थापित करने की ओर अग्रसर हो रहे था। विलुप्त होते लोक नाट्य हर्णातर के उत्थान की अहम भूमिका रही है।
कला साधना के लिए छोड़ दी शिमला की जॉब
वर्ष 1992 में अमीन चिश्ती सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में बतौर स्टेज मास्टर नियुक्त हो गए। एक तो खुले आकाश में विचरण करने की प्रवृत्ति दूसरा जवानी का जोश और कुछ कर गुजरने का जज्बा उस पर घर से 400 किलोमीटर दूर शिमला में 2200 रुपए की नौकरी चिश्ती को अपने मोहपास में नहीं बांध पाई और चिश्ती चम्बा वापस लौट आया। वर्ष 1993 में धर्मशाला में नाट्य निरीक्षक के पद पर नियुक्ति के पश्चात नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला फिर से आरंभ हुआ, तो कला संस्कृति, साहित्य की साधना फिर से गति पकड़ना शुरू हुई। वर्ष 2008 में सहायक लोक संपर्क अधिकारी के पद पर पहुंचते-2 चिश्ती ने चमब्याली संस्कृति व साहित्य के प्रचार, प्रसार व संवर्धन के जी जान से प्रयास जारी रखें।
चमब्याली जुबान को नई पहचान
केवल एक परिधि या विद्या में न बंध कर चिश्ती ने अपनी मातृ बोली चमब्याली में नाटक लेखन गीत व कविता लिखने तक ही अपने को सीमित नहीं रखा, अपितु चमब्याली लोक सांस्कृतिक विरासत के प्रचार- प्रसार के लिए चमब्याली लोकगीत संगीत की सैकड़ों ऑडियो व वीडियो एल्बमज का निर्माण करके अपनी कारगर अहम भूमिका का निर्वहन किया। गिनीज बुक में शुमार हॉलीवुड की जीसस फिल्म जिसकी एक हजार से भी अधिक विश्व भर की विभिन्न बोलियों में डबिंग हो चुकी है, इसके लिए चमब्याली व गाद्दी बोली का रूपांतरण चिश्ती ने करके गिनीज बुक के साथ अपना नाम जोड़ने का गौरव ही नहीं पाया, अपितु अपनी रंगमंच की पौध के साथ फिल्म के अंग्रेज पात्रों को चमब्याली डबिंग में अपनी आवाज देकर अपने जीवन की सार्थकता को भी पाया है।
रेडियो कार्यक्रम चलो चमबे चलिए का प्रस्तुतिकरण
वर्ष 2014 में जिला लोक संपर्क अधिकारी कांगड़ा का पदभार संभालने के पश्चात भी चिश्ती अपनी व्यस्तम दिनचर्या से कला सृजन के अवसर तलाशने में सदैव प्रयासरत रहे। आकाशवाणी धर्मशाला में अनेकों रेडियो के कार्यक्रमों में उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। रेडियो कार्यक्रम चलो चमबे चलिए के लंबे धारावाहिक की प्रस्तुति का मुख्य किरदार सुधीर (चिश्ती) बड़े सलीके से निभाया। जब चम्बा की सांस्कृतिक परंपराओं, भौगोलिक ,ऐतिहासिक ,राजनीतिक ,धार्मिक परंपराओं का गुणगान करते हुए जानकारी देता है तो आत्मीयता के भावों से ऐसा प्रतीत होता है जैसे पात्र नहीं चिश्ती ही अपने जिला की विराट पृष्ठभूमि का बखान करके प्रफुल्लित हो रहा है।
कला के आसमान से अपने हिस्से की धूप
वर्ष 2019 को जिला बिलासपुर से सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने तक के सफर में चिश्ती ने कला के आसमान से अपने हिस्से की धूप को इस तरह संचित कर लिया जिसके प्रकाश और तपिश से युवा पीढ़ी और नव प्रतिभाएं लाभान्वित होती रहेंगी। निसंदेह बचपन से ही कुछ नया करने की चाहत हमेशा चिश्ती के मन को कुरेदती रही ,भीड़ से अलग पहचान बनाने की इनकी महत्वाकांक्षा ने जहां उनके परवाज करते पंखों को हौसले ही दिए हैं, वहीं सपनों को पूरा करने के अनेकों अवसर भी प्रदान किए हैं।
महाभारत का अश्वत्थामा पसंदीदा पात्र
जीवन के हर पल से संतुष्ट चिश्ती के नाटकों व गीतों में यद्धपि प्रेम, हास्य और विरह के भाव सहजता से झलकते नज़र आ जाते हैं, लेकिन इनकी कविताओं में व्यवस्थाओं के प्रति विद्रोह की सुलगती चिंगारी इनके व्यक्तित्व को समझने में जटिल कर देती है। महाभारत का अश्वत्थामा इनका पसंदीदा पात्र है। जिसे वह अनेकों बार अभिनीत कर चुके हैं। नुक्कड़, मंच रेडियो, टेलीविजन,फिल्म इत्यादि विभिन्न माध्यमों से अपनी समृद्ध कला विरासत के मौलिक स्वरूप को प्रस्तुत करने वाली इस बहुमुखी प्रतिभा की धनी शख्सियत को उनके कला समर्पण के लिए अनेकों छोटे बड़े सम्मानों से नवाजा जा चुका है।
काम को मिले सम्मान
हिमोत्कर्ष साहित्य सांस्कृतिक जन कल्याण परिषद द्वारा वर्ष 2005 में स्वर्गीय कैलाश महाजन चम्बा श्री श्रेष्ठ लोक कलाकार के रूप में सम्मानित। अभिव्यक्ति साहित्य एवं सामाजिक संस्था मध्य प्रदेश द्वारा सारस्वत सम्मान से सम्मानित। विभिन्न धार्मिक सांस्कृतिक सामाजिक संस्थाओं व सरकारी कार्यक्रमों में इनकी विभिन्न उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया है। अमीन चिश्ती एक बेहतरीन उद्घोषक भी है। मंच संचालन का इनका अपना एक अलग अंदाज है। अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला चम्बा में लगातार 12 वर्षों तक अकेले मंच का संचालन करने का अमीन चिश्ती का कीर्तिमान शायद ही कोई उद्घोषक तोड़ सके, क्योंकि अब मेलों एक एक रात्रि में ही तीन से चार एंकर सामान्य सी बात हो गई है। स्कूली व कॉलेज के छात्रों की नाटक स्पर्धाओं के लिए अनेकों नाटकों के निर्देशन। हिन्दी फीचर फिल्म ” रिश्ते दिल से ” प्रदर्शन को तैयार है, जबकि दो अन्य फीचर फिल्मों व एक बेव सरीज के लिए भी तैयारी जारी है। वीडियो एल्बम वादियों का सूरुर में चम्बा की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने का सुंदर प्रयास किया गया है, जिसमें चम्बा के 12 लोकगीतों को मौलिक भाव से प्रस्तुत किया गया है, इस एलबम में लगभग चार सौ लोक कलाकारों ने अपनी प्रतिभा प्रदर्शित की है।
पारंपरिकता की चादर, आधुनिकता का बदरंग दाग
अमीन चिश्ती का मानना है कि विगत 100 वर्षों में अनियमित, अनियंत्रित विकास ने अगर सबसे ज्यादा खरोंचें बनाई है तो वह आज चम्बा की ग्रामीण लोक कला एवं संस्कृति पर आईं हैं। आज चम्बा के गांव की संस्कृति में वह उल्लास, उच्छाह व उत्साह दिखाई नहीं देता है जो किसी प्राचीन जातर, मेले, पर्व, अनुष्ठान में चैत्र से लेकर फाल्गुन माह तक देखने को मिला करता था। फिल्म, टीवी और सोशल मीडिया के गांव में पहुंचने से गांव की संस्कृति में अत्यंत बदलाव आया है। पांव की थिरकन और गले की मुरकियां भोंडे ऊंचे ताल बेताल, भद्दे फूहड़ अंदाज इस कदर गांव की संस्कृति पर हावी हो गए हैं कि पारंपरिकता की चादर पर आधुनिकता का यह बदरंग दाग वास्तविक मौलिक पृष्ठभूमि तक पहुंचने ही नहीं देता। आज विभिन्न संस्कृतियों का बेमेल मिश्रण में नई पीढ़ी को जिस भाव, रूप, माधुर्य का दर्शन हो रहा है। वे पिछले कुछ वर्षों से बहुत हटकर है जिसके विषय में चिंता की जानी अत्यंत आवश्यक है।
संस्कृति में जुड़े मुहावरे दम तोड़ने लगे
चिश्ती का कथन है कि जिस प्राचीन मौलिक लोक संस्कृति पर गर्व करते हम अघाते नहीं है, वे आधुनिकता की होड़ में अपना लालित्य खोने लगी है। मिठास , कड़वाहट में बदल गई है। यहां तक की संस्कृति में जुड़े हमारे मुहावरे दम तोड़ने लगे हैं ।सहजता ,सरलता, परस्पर सौहार्द, आत्मीयता, अपनत्व, एकता ,भाईचारे और अलाव के गिर्द हर्णातर, होरी, कुंजडी मल्हार, घुरेहियों, के लयबद्घ स्वरों से बनती “चम्बा की आत्मा ” अब अजीब छटपटाहट से भरी बेचैन, व्यग्र और बदहवास नजर आती है।
नई नस्ल को मिले मौलिकता
महज नृत्य ,गायन ,चित्रकला शिल्पकला ही चंबंयाली लोक कला एवं संस्कृति का हिस्सा नहीं है। अधिकांश प्राचीन मौलिक लोक कलाएं एवं, संस्कृति अपना वास्तविक स्वरूप खोकर आज मात्र एक दिखावे की चीज बन कर रह गई है। इसे दर्शाने के लिए लम्बी चौड़ी कवायदों को सिरे चढ़ाने की कोशिशें करने की नितांत आवश्यकता है। विद्वानों ,कवियों, शिल्पियों, लोक कलाकारों ,को फिर से संगठित करने की आवश्यकता है, जो अपने अनुभव, कला निपुणता, और हुनर को प्रदर्शित ही न करें ,अपितु आने वाली पीढ़ी से भी उसको मौलिक भाव से परिचित कराएं। प्राचीन नगाड़े की धमक, बांसुरी की लय, शहनाई की गूंज, नृत्य की मौलिक लोच, आभूषणों की घड़त, वेशभूषा की विधिवता, चित्रकला की मौलिक लोक शैली, गायन का आनन्द और पकवानों का स्वाद, कढ़ाई की बारीकी, शिल्प में निपुणता प्राचीनता का बोध करवाने में तभी सफल हो पाएगी, जब चम्बा की विरासत के वारिस इसे पुरखों की अमूल्य सौगात के सम्मान से नवाजेगे, अन्यथा चम्बयाली लोक सांस्कृतिक विरासत को स्वार्थ में लीन तिकड़म बाज आधुनिकता की चक्की में पीसकर अपनी रोटियां सेंकते रहेंगे।

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