घड़ोग मुहल्ला के धर्मेश के नाम है चंबा शहर का पहला एचएएस अधिकारी बनने का बिरला रिकॉर्ड, जानिए कैसे स्टार बना एक दलित मोटर मैकेनिक का होनहार बेटा

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घड़ोग मुहल्ला के धर्मेश के नाम है चंबा शहर का पहला एचएएस अधिकारी बनने का बिरला रिकॉर्ड, जानिए कैसे स्टार बना एक दलित मोटर मैकेनिक का होनहार बेटा
पालमपुर से विनोद भावुक की रिपोर्ट
अगर आप चंबा शहर को जानते होंगे, तो आपको यहां के मुहल्लों के बारे में भी पता होगा। चंबा शहर के पुराने बस स्टैंड (जो अब टैक्सी स्टेैंड के तौर पर प्रयोग हो रहा है) के नीचे की ओर है धड़ोग मुहल्ला। इस मुहल्ले के हुनर की बात करें तो यहां के कारीगरों के हाथों तैयार होने वाली चंबा चप्पल की पहचान न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक है। यह दूसरी बात है कि चंबा चप्पल को वह मान नहीं मिल पाया जो चम्बा रूमाल को हासिल है। धड़ोग मुहल्ले के अधिकतर निवासी मध्यवर्गीय अथवा निम्न मध्यवर्गीय दलित परिवार हैं। इसी मुहल्ले के एक मोटर मैकेनिक के बेटे ने अपनी मेहनत और हुनर से चंबा शहर का पहला एचएसएस अधिकारी होने का गौरव हासिल किया है। इस मुहल्ले के धर्मेश रमोत्रा ने तीसरे प्रयास में एचएसएस की परीक्षा कर चंबा शहर से पहले एचएएस अधिकारी बनने का रिकॉर्ड स्थापित कर दिया। वर्तमान में वह एसडीएम पालमपुर के पद पर तैनात हैं और अधिकारी के तौर पर अल्पकाल में ही उन्होंने बेहतरीन अधिकारी के तौर पर पहचान बनाई है। यह कामयाबी इसलिए भी अहम है कि पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए टयूशन करने वाले धर्मेश ने परिवार व नौकरी की जिम्मेदारी निभाते हुए अपनी चमक बिखेरी है।
पालने में दिख गए पूत के पांव
19 अप्रैल 1976 को चंबा शहर के धड़ोग मुहल्ला के डीएस रमोत्रा व कमला रमोत्रा के घर पहली संतान के रूप में बेटे का जन्म हुआ तो उसका नाम धर्मेश रमोत्रा रखा गया। रमोत्रा परिवार में इसके बाद दो बेटियों का जन्म हुआ। पेशे से मोटर मैकेनिक और एचआरटीसी में सेवारत डीएस रमोत्रा का परिवार दो कमरों वाले एक साधारण से घर में रहता था। सरकार के पास ही सरकारी स्कूल था प्राथमिक पाठशाला धड़ोग। छह साल के होते ही धर्मेश का दाखिला इस स्कूल में कर दिया गया। धर्मेश ने पांचवीं की परीक्षा में जब अपने ब्लॉक में टॉप किया तो स्कूल में इसके नाम की तीन तालियां बजवाई गईं और एक शिक्षक ने बच्चे को गोद में उठा कर शाबाशी दी। अबोध बच्चे के दिलो दिमाग पर यहीं से एक बात घर कर गई कि पढ़ाई में बेहतर करने की वजह से उन्हेें यह स्नेह मिल रहा है।
टयूशन से चलाया पढ़ाई का खर्च
धर्मेश की आठवीं तक की पढ़ाई सीनियर सकेंडरी स्कूल चंबा से हुई। आठवीं में वह चंबा जिला के टॉप तीन में शामिल रहे। पिता का तबादला धर्मशाला हुआ तो बेटे की नौंवी से लेकर जमा दो तक की पढ़ाई ब्वॉज स्कूल धर्मशाला से हुई। 1993- 94 में नॉन मेडीकल में जमा दो करने के बाद चंबा कॉलेज से बीएससी नॉन मेडीकल की। स्नातक करने के बाद दाखिले के लिए कई शिक्षण संस्थानों में चयन हुआ, लेकिन धर्मेश ने कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से एमएससी फिजिक्स करने को प्राथमिकता दी। घर के तीनों बच्चे पढऩे में अच्छे थे और सभी उच्च कक्षाओं में शिक्षारत थे। पिता पर आर्थिक बोझ को देखते हुए धर्मेश ने कुरूक्षेत्र में अपने अध्ययन के दौरान टयूशन पढ़ा कर अपना खर्च चलाया।
शादी  के बाद अधिकारी बनने की धुन
एमएससी करने के बाद धर्मेश ने बीपीएस स्कूल चंबा में पढ़ाना शुरू कर दिया। यहां दो साल पढ़ाया। इसी बीच उनकी शादी हो गई। इस दौरान धर्मेश को ग्रामीण विकास विभाग के तहत एक परियोजना में समन्वयक के तौर पर काम करने लगे। एक दिन उनकी मुलाकात तब के सहायक आयुक्त विकास मैहला विनय सिंह से हुई। धर्मेश में एचएएस परीक्षा पास कर प्रशासनिक अधिकारी बनने का अपना इरादा पहली उन्हीं स जाहिर किया था और परीक्षा की तैयारी के लिए जरूरी टिप्स भी उन्हीं से मांगे थे। साल से भी कम समय में धर्मेश ने इस नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। यहीं से उनके मन में प्रशासनिक अधिकारी बनने की धुन सवार हुई।
गैर सरकारी संस्था ने बदला नजरिया
कई देशों में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था एक्शन एड उस समय चंबा में भी एक परियोजना पर काम कर रही थी। धर्मेश समन्वयक के तौर पर इस संस्था में काम करने लगे। यहां काम करते हुए जीवन के प्रति उनका नजरिया बदल गया। उन्होंनेे घुमंतु गुज्जरों व दलितों की शिक्षा के लिए गंभीर प्रयास किए। उन्होंने विकलांगों व महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में काम किया और गुज्जरों की शिक्षा को लेकर ‘घूमता जीवन’ पुस्तक का लेखन किया। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।
तीसरे प्रयास में स्थापित किया रिकॉर्ड
साल 2012 में पहली बार धर्मेश एचएएस की परीक्षा में शामिल हुए और पहले ही प्रयास में परीक्षा पास कर साक्षात्कार तक पहुंचने में कामयाब रहे। चयन न हो पाने का मातम मनाने की जगह उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पहले से मुकाबले ज्यादा जोश व उत्साह के साथ तैयारी करनी शुरू कर दी। तब तक वह एक अन्य परीक्षा पास कर आबकारी एवं कराधान निरीक्षक बनकर पालमपुर में सेवारत हो चुके थे। हालांकि एचएएस के दूसरे प्रयास में भी उनके हाथ निराशा लगी, लेकिन उनका इरादा अटल था और दो बार का अनुभव भी उनके साथ था। तीसरे प्रयास में धर्मेश ने एचएसएस की परीक्षा कर चंबा शहर से पहले एचएएस अधिकारी बनने का रिकॉर्ड स्थापित कर दिया।
अधिकारी का फर्ज, अपनों का कर्ज
2016 में उनकी पहली नियक्ति सहायक विकास आयुक्त धर्मशाला के पद पर हुई। उनके बाद एसडीएम कांगड़ा, एसडीएम धर्मशाला, एसडीएम बल्ह, सचिव स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला के बाद \एसडीएम पालमपुर के पद पर सेवायें देने के बाद वर्तमान में एसडीएम सुंदरनगर के पद पर कार्यरत हैं। उनकी पत्नी अनुराधा स्कूल कैडर में फिजिक्स की प्रवक्ता हैं। बेटा युवराज अर्थशास्त्र ऑनर्ज कर रहा है जबकि बेटी असावरी दसवीं कक्षा की स्टूडेंट हैं। धर्मेश धर्मशाला व कांगड़ा में सेवारत रहते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स के लिए अपनी सेवाएं देते रहे हैं। उन्होंने अपने मुहल्ले के स्टूडेंट्स का एक व्हटअप गु्रप भी बनाया है, जिस पर वे उनके करियर के लिए मददगार बनकर हर संभव मदद करते हैं। जिस मिट्टी में खेल कर धर्मेश ने सपने बुने और उनमें रंग भरे, वहां के लिए आज भी वह समर्पित हैं। इस अधिकारी की यही बात उन्हें दूसरों के बेहतर साबित करती है।

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