गोरखा महल के नाम से मशहूर बनासर किला, खंडहर कहते हैं किले की मजबूती की कहानी

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गोरखा महल के नाम से मशहूर बनासर किला, खंडहर कहते हैं किले की मजबूती की कहानी
चंडीगढ़ से वीरेंद्र शर्मा ‘वीर’ की रिपोर्ट
परवाणू मार्ग पर 15 किलोमीटर दूर घिन्नी घाड़ क्षेत्र की बनासर पंचायत में अवस्थित प्राचीन एवं बनासर किला उचित देखभाल न होने की वजह से नष्ट होने के कगार पर है। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे बनासर किले का निर्माण गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने संभवत: 1806 से 1815 के मध्य हरियाणा एवं पंजाब के मैदानी इलाकों की ओर से आने वाली अंग्रेजी सेनाओं पर नजर रखने के लिए करवाया था। ऐसा स्थानीय निवासी एवं अमर सिंह थापा के वंशज पूर्व सेनाधिकारी वीएस थापा कहते हैं। इसी अवधि में गोरखा सेनापति ने धारों की धार, जोहडज़ी के पास किशनगढ़, मलोण व सुबाथू आदि किलों का निर्माण भी किया और करालघाट के जय राजा सूड़ देवता मंदिर का निर्माण करवाया था।
आयताकार में तीन मंजिला किला
आयताकार में बनें ये तीन मंजिला किला कभी बहुत मजबूत था, जिसके भीतर जाने के लिए मात्र एक ही रास्ता था। बाहरी दीवार के बीचोंबीच सैनिकों को बैठकर मोर्चा संभालने के लिए जगह और साथ साथ एक गली और उसके आगे किले के भीतर भी एक सुरक्षा दीवार थी। उसके भीतर एक बड़ा हॉल, कुछ शस्त्रागार, शाही कमरे आदि थे जो कि अब गिर गए हैं। बाहर की चारदीवारी और चार कोनों पर बनी मीनारें अभी तक किसी तरह अपना अस्तित्व बचाए रखने में कामयाब रही हैं। इतनी ऊंचाई पर किले में जलापूर्ति कैसे की जाती होगी ये भी शोध का का विषय है।
अन्य मान्यता : गोरखाओं के आने से पहले से पहले का किला
कुछ मान्यताओं के अनुसार ये किला गोरखाओं के आने से पहले से ही अवस्थित था जो नाहन या उसके नीचे एक राजा द्वारा बनाया गया था। अमर सिंह ने विजय के बाद इस गढ़ी नुमा किले का जीर्णोद्धार अपने प्रभाव क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए किया, किंतु ये सब किन्हीं दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं है। मात्र दंतकथाओं में ही है, जिसमें मत मतान्तर हैं। स्थानीय निवासी विद्यादत्त बताते हैं कि खूंखार जंगली जानवरों एवं बड़े-बड़े सांपों की उपस्थिति का डर दिखाकर उन्हें बुजुर्ग खंडहर में तब्दील होते इस किले के भीतर जाने से रोकते रहे हैं।
राजा पटियाला को पहाड़ी मिलने की वजह
94.69 एकड़ में फैले बनासर गांव से करीब एक किलोमीटर पहले एक बहुत ऊंचे टीले पर स्थित इस किले से परवाणू, कालका, पिंजौर, पंचकुला,कसौली, व डगशाई आदि स्थानों का बेहद सुन्दर दृश्य दिखाई देता है। समूचे क्षेत्र में किले को गोरखा महल के रूप में भी जाना जाता है। कुछ स्थानीय बुजुर्गों के कयास हैं कि हो सकता है कि राजा पटियाला को यह पहाड़ी 1814 में गोरखाओं की पिटाई हेतु मेजर जनरल ऑक्टरलोनी की मदद करने के लिए मिली हो।
राजस्व रिकॉर्ड में नहीं बनासर किले का इतिहास
अब बनासर किला भी धीरे-धीरे दृश्य से अपने लुप्त होने के दिन की ओर बढ़ रहा है। दुखद बात ये कि सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में इस किले के इतिहास बारे कहीं समुचित वर्णन नहीं मिलता। आजादी के बाद से अब तक किसी भी सरकार और पुरातत्व विभाग ने बनासर किले सहित कई अन्य खंडहर होते या हो चुके किलों के इतिहास को जानने एवं संरक्षण की दिशा में कुछ भी कार्य नहीं किया। इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोमांचक यात्राओं को बढ़ावा देने से बनासर किला सोने की खान साबित हो सकता है। ऐसा करने से न केवल स्थानीय लोगों को रोजग़ार मिलेगा, बल्कि स्मारक भी अपने वजूद को बचाए रखने में सफल रहेगा।
धरोहर संरक्षण के नहीं हुए प्रयास
सरकार ने कुछ समय पहले वन विभाग को अधिकृत कर सर्वेक्षण और किले की प्राचीन सुंदरता को बहाल करने के लिए 45,000 रुपए की धनराशि जारी करने की घोषणा की थी। शिमला से आई एक टीम ने किले का सर्वेक्षण भी किया था। सर्वेक्षण रिपोर्ट में पता चला था कि जारी धनराशि ऊंट के मुंह मे जीऱा जैसी थी। इसी वजह से किले को पुराने रूप में लाने की योजना ठंडे बस्ते में डाल दी गई। स्थानीय निवासी बताते हैं कि बनासर किले के इतिहास को खोजने के लिए कड़ी मेहनत करने के बाद, एक वृत्तचित्र फिल्म निर्माता ने किले पर एक फिल्म की शूटिंग करने की योजना बनाई थी किंतु प्रमाणित इतिहास में कहीं जानकारी न मिलने के कारण वो भी खटाई में पड़ गई थी।

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