गुप्त गंगा से संबंधित है चुहार घाटी के अराध्य देव श्री हुरंग नारायण जी की कहानी 

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गुप्त गंगा से संबंधित है चुहार घाटी के अराध्य देव श्री हुरंग नारायण जी की कहानी 
मंडी पठानकोट नेशनल हाईवे पर मंडी से करीब 28 किमी दूर सड़क के किनारे नारला गाँव बसा है. नारला मनाली से पठानकोट/धर्मशाला आने जाने वाली बसों का प्रमुख भोजन स्थल भी है। यात्री यहाँ रुक कर भोजन करते हैं। यहाँ रेहडियों पर मिलने वाले स्वादिष्ट पकोड़े भी यात्रियों में बहुत मशहूर हैं।
नारला गाँव में ही पहाडी पर सतत है गुप्त गंगा। सड़क से लगभग 200 मीटर पहाड़ चढ कर एक झरने के दर्शन होते हैं। पुरानी गुफा और गुफा के शीर्ष से निकलता पानी जो सोचने पर मजबूर कर देता है कि कैसे गुफा बनी होगी और कहां से ये पानी वर्ष भर निरंतर बहता रहता है।
स्थानीय लोगों का विश्वास है कि चुहार घाटी के अराध्य देव श्री हुरंग नारायण जी की कहानी गुप्त गंगा से संबंधित है। स्थानीय लोगों के अनुसार गुप्त गंगा का उदगम देव हुरंग नारायण जी ने अपने मनुष्य रुप में किया था।
हुरंग नारायण जी चौहार घाटी के सबसे बड़े व प्रभावशाली देवता माने जाते हैं। घाटी में कोई भी शुभ कार्य इनकी पूजा के बिना शुरू नहीं किया जाता। घाटी के विभिन्न मेले व त्योहार इनकी उपस्थिति में ही मनायें जाते हैं। काहिका उत्सव देव हुरंग नारायण की छत्रछाया में ही होता है।
कहा जाता है देव नारायण गांव के अन्य लोगों के साथ पशुओं को चराने के लिए नारला की पहाड़ी पर लाते थे। सभी गवाले अपने पशुओं को पानी पिलाने के दूर किसी नाले में ले जाते, लेकिन देव नारायण जी उनके साथ नहीं जाते और सबसे छुपा के डडें से जमीन पर वार करके पानी की धार जमीन से पानी निकाल देते।
एक बार गांव के लोगों ने उनके घर शिकायत लगा दी के नारायण पशुओं को प्यासा रखते हैं तो घर वालों ने देव नारायण जी का पीछा किया और उनकी लीला देखी तो सब हैरान रह गए। उसी दिन देव हुरंग नारायण जी वहां से लुप्त हो गये और चोहार घाटी में मूर्ति/रथ रुप में विराजमान हो गये हैं। यही कहानी स्थानीय लोग अपने बाप दादाओं की पीढ़ियों से सुनते आ रहें हैं।
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कंटेंट – विकास शर्मा

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