गरली- प्रागपुर के चार युवा सूद कारोबारियों सुरधा, निधा, जल्ला और निहाला ने साल 1832 में ब्रिटिश शिमला में शुरू किया था कारोबार

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गरली- प्रागपुर के चार युवा सूद कारोबारियों सुरधा, निधा, जल्ला और निहाला ने साल 1832 में ब्रिटिश शिमला में शुरू किया था कारोबार
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
ब्रिटिश हुकूमत के दौरान शिमला में कारोबार की शुरुआत करने का श्रेय गरली- प्रागपुर के चार युवकों सुरधा, निधा, जल्ला और निहाला को जाता है। साल 1832 में शिमला में 30 ब्रिटिश कॉटेज, कुछ गेस्टहाउस और कुछ दुकानें थीं। 1832 के वसंत के आते- आते सूद व्यापारी होशियारपुर अनाज मंडी से अनाज और अन्य खाद्यानों की पहली खेप खच्चरों और ऊँटों पर लाद कर नादौन और बिलासपुर होते हुए शिमला के लिए तैयार थे। सुरधा और निधा यह सोच कर शिमला के रवाना हुए कि रिज पर स्थित अप्पर बाजार उनके व्यवसाय का स्थान होगा। जल्ला और निहाला 30 से 40 खच्चरों वाले चरवाहे का पता लगाने के लिए कुल्लू की ओर गए, जो होशियारपुर से शिमला तक पहाड़ियों वाले कठिन इलाके पर उनका राशन ढोने को तैयार हो। दोनों जोड़ियों को अपने अपने काम में कामयाबी मिली। साल 1930 में प्रकाशित कनाडाई-भारतीय मूल के लेखक हरी सूद की पुस्तक ‘एंटरप्रिन्योर्स ऑफ़ ब्रिटिश शिमला – सूद, सरकार एंड शिमला 1832 – 1932’ ब्रिटिश शिमला में कारोबार की एक सदी का सूचनात्मक दस्तावेज है।
50 साल में 4 से 400 हुए सूद कारोबारी
हरी सूद लिखते हैं कि होशियारपुर से शिमला तक आनाज की आपूर्ति का सफर आसान काम नहीं था। लुटेरों से बचते हुए कारोबारी दो दिनों में नादौन पहुंच गए। यहां उन्होंने एक दिन विश्राम किया और फिर तीन दिन पैदल चलकर बिलासपुर पहुंचकर एक और दिन विश्राम किया। वे अगले दो दिनों में अर्की पहुँचे और फिर अगले दो दिनों में बालूगंज पहुँच गए। यहां एक दिन का आराम किया और फिर आनाज की आपूर्ति रिज पर पहुंच गई। व्यापार का यह रूट लम्बे समय तक सूद व्यापारियों की दिनचर्या का हिस्सा रहा, लेकिन 50 साल के बाद अन्य कई सूद व्यापारी उनके साथ शामिल हो गए। बहुत से सूद व्यापारे न केवल शिमला में बस गए, बल्कि हिंदुस्तान-तिब्बत सड़क के किनारे भी अपना कारोबार स्थापित किया। शिमला में सूद व्यवसायियों की संख्या 1864 में बढ़कर 100 और 1881 में 400 हो गई।
कारोबार के अवसर के लिए उठाया जोखिम
हरि सूद लिखते हैं कि साल 1830 तक आते- आते शिमला में बसे ब्रिटिश परिवार अपने जीवन यापन के लिए शिमला में अन्न भंडार और और आनाज की आपूर्ति चाहते थे। उस कालखंड में सूद व्यापारी ब्यास नदी के साथ लगते क्षेत्रों में अनाज का व्यापार और साहूकारी का काम करते थे। अधिकांश सूद तब जसवां रियासत में रहते थे। जब व्यापार और कारोबार करने वाले इन सूदों को पता चला कि शिमला के एक नए बसे हुए गाँव में ऐसे व्यापारियों की ज़रूरत है जो यहां बसने वाले ब्रिटिश लोगों को राशन की आपूर्ति कर सकें, तो उन्होंने कारोबार के इस शानदार अवसर का लाभ उठाने का जोखिम उठाया।
मेजर कैनेडी के साथ पहली बैठक असफल
उस समय सबाथू (जो अब सोलन जिले में है) सभी व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र था। क्योंकि ब्रिटिश के राजनीतिक एजेंट मेजर कैनेडी वहां बैठते थे। शिमला के लिए आनाज का व्यापार शुरू करने के मकसद से सबाथु पहुंचे सूद कारोबारियों की मेजर कैनेडी के साथ पहली मुलाकात में दोनों पार्टियां किराने के सामान की कीमतों का निर्धारण करने में विफल रहीं और बैठक उपद्रव में समाप्त हो गई। शिमला में रह रहे ब्रिटिश लोगों के मेजर कैनेडी पर बढ़ते दबाव ने उन्हें एक बार फिर से सूद व्यापारियों को आमंत्रित करने के लिए मजबूर किया और इस बार की बैठक में दोनों पार्टियां समाधान पर पहुंचीं।
एडवर्डगंज में ‘लाला निधा मल्ल पूरन मल्ल प्रतिष्ठान
हरि सूद अपनी किताब में लिखते हैं, ‘शिमला में व्यवसाय की शुरूआत करने के लिए कठिन से भे कठिन दौर से गुजरे चारों सूद भागीदारों को बढ़ती उम्र ने यह बताना शुरू कर दिया कि अपने कारोबार को अपने उत्तराधिकारियों को सौंपने का यह सही वक्त है। साल 1861 में सुरधा और अन्य साथी अपने घर गरली- परागपुर के लिए रवाना हो गए, जबकि चौथे भागीदार निधा मल्ल ने शिमला में रह कर एडवर्डगंज में पहला प्रतिष्ठान ‘लाला निधा मल्ल पूरन मल्ल ‘ स्थापित किया।
शिमला की अर्थव्यवस्था और संस्कृति की रीढ़ हैं सूद
भारत की आजादी के बाद बेशक शिमला में पश्चिम पंजाब से शरणार्थियों की आमद के साथ शिमला में कारोबार और व्यापार शरणार्थियों के हाथ आता गया। तेज़ गति से वृद्धि वाले सूद उद्यमों में स्थिरता आती गई व सूदों को व्यापार को पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया, लेकिन सूद वर्तमान शिमला का एक जीवंत समुदाय है। अत्यधिक पेशेवर सूद समुदाय शहर की अर्थव्यवस्था और संस्कृति की रीढ़ है। शिमला के कारोबार में आज भे उनकी संख्या आज भी काफी अधिक है।

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