क्रांतिकारी वैक्सीन- दिल से कवि शिमला के डॉक्टर ने खोजा रेबीज का सबसे सस्ता इलाज

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क्रांतिकारी वैक्सीन- दिल से कवि शिमला के डॉक्टर ने खोजा रेबीज का सबसे सस्ता इलाज, डॉक्टर ओमेश कुमार भारती के ‘चिक प्रोटोकॉल’ को डब्ल्यूएचओ की मान्यता, पदमश्री अवार्ड

शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट


बड़े कम पाठकों को इस बात की जानकारी होगी कि रेबिज के उपचार की दुनिया की सबसे कम लागत वाली वैक्सीन बनाने वाले डॉक्टर ओमेश कुमार भारती को साहित्य की दुनिया से भी गहरा लगाव है। दिल से कवि डॉक्टर ओमेश एक कोमल कवि के तौर पर भी अपनी खास पहचान रखते हैं। पिछले दो साल से वे चिकित्सा जगत में अपनी खोज को लेकर सुर्खियां बटोर रहे हैं। बावजूद इसके सोशल मीडिया पर उनका कवि मन इस खोज के पीछे उनके संघर्ष की कहानी को इशारों में समझा रहा है। वे फेसबुक पर लिखते हैं  ‘मेहनत का फल जरूर मिलता है, डूब कर मेहनत कीजिए।’
सौ गुणा कम लागत, कम डॉज
डब्ल्यूएचओ ने डॉक्टर ओमेश कुमार भारती के रेबीज के लिए कम लागत के उपचार को स्वीकार कर इसे क्रांतिकारी वैक्सीन बताया है। यह बेक्सिंग पागल कुत्ते व बंदर के काटने से होने वाली बीमारी रेबीज के इलाज के लिए बनाए गया नया ‘चिक प्रोटोकॉल’ उपचार भविष्य में बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। इस प्रोटोकॉल को शिमला के डॉक्टर ओमेश कुमार भारती ने विकसित किया है। इसे दुनिया में रेबीज का अब तक का सबसे कम खर्च वाला इलाज माना जा रहा है। भारती ने रेबीज की बिमारी में इस सस्ते उपचार को एक क्रांति बताया है, जिसकी मदद से मरीज की दवा लेनी की खुराक काफी कम हो जाती है। इसके चलते उपचार की लागत प्रति मरीज 35 हजार रुपए (545 डॉलर) से 100 गुना कम होकर सिर्फ 350 रुपए (5.50 डॉलर) हो जाती है।

‘चिक प्रोटोकॉल’ को मान्यता


डॉ. भारती पिछले 17 साल से इस पर काम कर रहे थे। इन दिनों इंट्रा डिसर्मा-रेबीज क्लिनिक और रिसर्च सेंटर ऑफ दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में काम कर रहे हैं। साल 2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने रेबीज वैक्सीन और इम्युनोग्लोब्युलंस की जानकारी साझा करते हुए डॉक्टर भारती की इस नए और कम लागत वाले उपचार ‘चिक प्रोटोकॉल’ को मेडिकल सांइस में विश्व स्तर पर मान्यता दे दी है।
महंगा था उपचार
डब्लूएचओ के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी कुत्ते या बंदर के काटने का शिकार होने वाले मरीज के लिए रेबीज इम्युनोग्लोब्यिलिन के साथ इंट्रामर्मली नाम की एक वैक्सीन दी जाती है जिससे घाव और मांसपेशियों में दोनों में इंजेक्ट किया जाता है। रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन वैक्सीन की मात्रा रोगी के शरीर के वजन के अनुसार दी जाती है, जो बहुत ही महंगा पड़ती है, लेकिन रेबीज का टीका लगभग समान ही रहता है। वहीं अब इस नए प्रोटोकॉल से रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन का इलाज काफी सस्ता बना दिया है।

पिल्लेे से भी रैबीज का खतरा

आंकड़ों के मुताबिक, हर साल दुनिया भर में तकरीबन 59 हजार लोग रेबीज होने से मर जाते हैं। इस बीमारी से मरने वालों में अकेले भारत में यह आंकड़ा 20 हजार है, क्योंकि दवा काफी मंहगी है और इसका खर्चा हर मरीज के लिए उठा पाना मुश्किल होता है, जिस वजह से हर साल इतने लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। डॉक्टर भारती के अनुसार तीन माह से कम उम्र के पिल्ले से भी रैबीज का खतरा हो सकता है। हिमाचल में रैबीज के स्टेट मास्टर ट्रेनर डॉ. ओमेश कुमार भारती ने शोध में पाया कि हिमाचल में पिल्लों से संक्रमण के कारण तीन लोग मरे हैं।
अद्भुत काम, मिले सम्मान
वरिष्ठ साहित्यकार एसआर हरनोट कहते हैं, हमारे प्रिय मित्र और कवि हृदय डॉ. ओमेश भारती ने रेबीज से बचने के किफायती उपचार के लिए अपने शोध में जो कामयाबी हासिल की है, उसको विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मान्यता प्रदान की है जो हिमाचल के साथ देश के लिए भी गौरव की बात है। डॉ. ओमेश भारती की इस पहल का हिमाचल में ही नहीं, पूरे भारत के चिकित्सा जगत में स्वागत होना चाहिए। डॉ. डॉ. ओमेश भारती की इस चिकित्सीय खोज के लिए भारत सरकार ने साल 2019 में उन्हें प्रतिष्ठित पदमश्री आवार्ड से सम्मानित किया है।

उधर सपने परवाज, इधर अपनी आवाज


डॉक्टर ओमेश भारती की पत्नी अर्चना फुल्ल प्रदेश के अंग्रेजी मीडिया जगत में एक बड़ा नाम हैं। हिंदोस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस में लंबी पारी खेलने के बाद वे इन दिनों स्टेट्समैन की स्टेट रिपोर्टर के तौर पत्रकारिता के मील पत्थर स्थापित कर रहीं हैं। वे विभिन्न साामाजिक संस्थाओं के साथ जुडक़र अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाहन कर रहीं हैं। पति की इस चमकदार कामयाबी पर उनका कहना है कि यह संघर्ष और साधना के लंबे सफर की कामयाबी है।


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