क्या आपको पता है हिमाचल में कहाँ है ‘गैंडा रोड’? पढ़िए गुमनाम रहे हिमाचल के ‘द माउंटेन मैन’ सूबेदार गैंडा राम चौधरी की जिद और जुनून की प्रेरककथा

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क्या आपको पता है हिमाचल में कहाँ है ‘गैंडा रोड’? पढ़िए गुमनाम रहे हिमाचल के ‘द माउंटेन मैन’ सूबेदार गैंडा राम चौधरी की जिद और जुनून की प्रेरककथा
नगरोटा बगवां से संजीव कौशल और जसवंत जस्सो की रिपोर्ट
पहाड़ काट कर नहर बनाने वाले बिहार के गेहलौर गांव के दशरथ मांझी का जीवन संघर्ष बेशक प्रसिद्ध फिल्म निर्माता केतन मेहता की फिल्म ‘मांझी- द माउंटेन मैन’ के जरिये दुनिया के सामने आ गया, लेकिन अलग ही मिट्टी के बने और असीमित क्षमताओं वाले कई दशरथ मांझी और पहाड़ से टकराने के उनके काम गुमनाम ही रह जाते हैं। सूबेदार गैंडा राम चौधरी हिमाचल के ऐसे ही माउंटेन मैन’ हैं, पहाड़ के बौना करने के जिनके किस्से आज भी कांगड़ा जिला के पालमपुर उपमंडल के चंगर क्षेत्र में बड़े गर्व के साथ सुनाये जाते हैं।
बताया जाता है कि जब तमाम फरियादों के बावजूद सरकार ने इस चंगर क्षेत्र में सड़क के निर्माण की दिशा में कोई कदम नहीं बढ़ाया तो रिटायर्ड सूबेदार गैंडा राम चौधरी ने खुद की सड़क निकालने की शुरुआत कर दी। उनके इस मिशन में गांव के लोग जुड़ने लगे और देखते ही देखते पहाड़ काट कर एक किलोमीटर लम्बी सड़क बन कर तैयार हो गई। इस सड़क के निर्माण के चर्चे जब सरकार के कानों तक पहुंचे तो मजबूरन सरकार को आगे की सड़क का निर्माण करना पड़ा। आज भी अछरू का भरोह से चिड़न हो कर धीरा जाने वाली सड़क को ‘गैंडा रोड’ कहा जाता है। गांव में सूबेदार गैंडा राम चौधरी समारक इस चंगर क्षेत्र के सामजिक- आर्थिक बदलाव में उनके अथक प्रयासों की गवाही देता है।
निरक्षर ने किये शिक्षा के लिए प्रयास
सेना से रिटायर्ड आकर सूबेदार गैंडा राम चौधरी ने अपने इलाके के विकास का बीड़ा अपने कन्धों पर उठाया। 13 बच्चों की परवरिश के बावजूद उन्होंने खुद को सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। बेशक वे खुद निरक्षर थे लेकिन शिक्षा के प्रति सजग थे। गांव में प्राइमरी स्कूल तो था, लेकिन एक कमरे वाले इस स्कूल की छत घास से बनी थी। उन्होंने न केवल स्कूल की छत में स्लेट डलवाने की व्यवस्था करवाई, बल्कि एक और कमरे का निर्माण करवाया।
तीन साल माध्यमिक स्कूल को प्राइवेट स्कूल की तरह चलाया
स्कूल को स्तरोन्नत करवा कर माध्यमिक करवाने में अहम् रोल अदा किया। तीन साल तक माध्यमिक स्कूल को प्राइवेट स्कूल की तरह चलाया और और अध्यापकों का प्रबंध अपनी जेब से किया। सड़क से जुड़ा न होने के कारण इस चंगर क्षेत्र में कोई अध्यापक नहीं आना चाहता था, तक गैंडा राम अध्यापकों की व्यवस्था करने के लिए शिमला तक सक्रीय रहते और यहाँ तक कि अध्यापकों का सामान खुद अपने सिर पर ढ़ो कर लाते।
गांव में बिजली – पानी का प्रबंध
तब तक गांव में बिजली नहीं पहुँची थी। साल 1975 में गांव में बिजली पहुंचाना उनकी ही देन है। साल 1979-80 में उन्हीं के प्रयासों से गांव के लिए पहली बार पेयजल सुविधा का लाभ मिला। उनके प्रयासों से जहां अछरू का भरोह से चिड़न हो कर धीरा जाने वाली सड़क का निर्माण हुआ, वहीं उस रोड पर 1986 में बस सुविधा शुरू करवाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। सामाजिक कार्यों के लिए पूरी तरह से समर्पित गैंडा राम की उस दौर में क्षेत्र में खूब धाक थी, यही कारण था कि उस समय की सरकारों पर दबाव बना कर क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए वित्तीय प्रबंध करवा लेते थे।
93 साल जीये, आखिर तक रहे सक्रीय
साल 1902 को पालमपुर के चंगर क्षेत्र के बेहद पिछड़े डाकघर रझूं के तहत आते चंबी गांव में पैदा हुए गैंडा राम चौधरी इसलिए शिक्षा हासिल नहीं कर पाए क्योंकि इस क्षेत्र में शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं था। 19 साल की उम्र में उस समय की ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए और 26 साल तक सेवायें देकर भारत विभाजन से पहले सूबेदार के पद से सेवानिवृत हुए। उनका विवाह जुगनी देवी से हुआ और और इस दम्पति के घर आठ पुत्रों और पांच पुत्रियों का जन्म हुआ। वर्तमान में उनके सभी तदरूस्त एवं साधन संपन्न हैं।साल 1995 में 93 साल की उम्र में गैंडा राम चौधरी स्वर्ग सिधार गए। वे अपने जीवन के आखिरी वर्षों तक सक्रीय रहे।

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