कुल्लुत देश के रसीले गीतों की बुलबुल – अस्सी के दशक में कुल्लुवी गीतों को नई पहचान देने वाली लोकगायिका सरला चंबयाल

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कुल्लुत देश के रसीले गीतों की बुलबुल – अस्सी के दशक में कुल्लुवी गीतों को नई पहचान देने वाली लोकगायिका सरला चंबयाल
कुल्लू से पौमिला ठाकुर की रिपोर्ट
वर्ष 1949 में कुल्लू जिला के एक गांव भरैइण में जब वीर सिंह जम्वाल व टेसी देवी के घर एक बेटी का जन्म हुआ तो दादा दादी व पिता को कोई खुशी नहीं हुई। वे बच्ची को बड़े उपेक्षापूर्ण तरीके से पाल पोस रहे थे। बच्ची के नाना सब्जे चंद वजीर को यह बहुत नागवार गुजरा और आठ माह की उस दुधमुंही बच्ची को नाना अपने घर सैंज ले आए। नानी रबजू देवी के आंचल में पली वो बेटी कलांतर में अपने गीतों से कुल्लूत देश की बुलबुल के नाम से मशहूर हो गई। सरला चंबयाल ने कुल्लवी बोली के साहित्य व संगीत को अस्सी के दशक में एक नई पहचान दी। जिंदगी की सांझ में भी इस स्वर कोकिला की मिट्टी आवाज महफिल को लूट लेती है। वे आज भी निरंतर लिख रही है और साहित्यिक आयोजनों में अपनी रचनाओं से श्रौताओं को भाव विभोर कर रही हैं।
खुद घर पहुंचे हुनर के कद्रदान
बात करीब पैंतीस साल पहले की है। सरला चंबयाल कुल्लू के गांधीनगर स्थित अपने घर में अपने छोटे से टेप रिकॉर्डर में खुद के लिखे और संगीतबद्ध किए गीत सुन रही थीं। कुल्लू दशहरा के कार्यक्रम को रिकॉर्ड करने आई आकाशवाणी शिमला की टीम के कानों में जैसे ही सरला चंबयाल की मखमली आवाज ने रस घोला, टीम के सदस्य उस आवाज को ढूंढते उनके घर पहुंच गए। यही एक पहाड़ी प्रतिभा के जीवन का टर्निंग प्वांइट था। फिर क्या था, कुल्लू घाटी की यह आवाज आकाशवाणी शिमला की सदाबहार आवाज बन गई। सरला ने लोकगायकों की पुरानी और नई पीढ़ी के साथ पहाड़ी जुबां को नई ऊंचाइयां देने में अहम भूमिका अदा की।
लिखने में माहिर, गाने में अव्वल
सरला चंबयाल ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, लेकिन कुल्लू के लोकजीवन के प्रति उनकी गहरी समझ ने उन्हें कुल्लुवी बोली के कई मशहूर गीतों की गीतकार बना दिया। सरला चंबयाल की आवाज में जितनी मिठास है, उनके लिखे गीतों में उतनी ही गहराई है। सरला चंबयाल का कहना है कि बचपन से ही लोक संगीत को लेकर आकर्षण रहा। नानी के पास लोकगीतों का बड़ा खजाना था, वहीं से गाने-गुनगुनाने की शुरुआत हुई। शादी के बाद शिक्षा विभाग में कार्यरत पति ज्ञान चंद चंबयाल ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनकी आवाज पहाड़ की पहचान बन गई।
नई पीढ़ी को संदेश
सरला चंबयाल का कहना है कि जिस कुल्लुवी जुबान ने उन्हें यह शोहरत बख्शी है, उस जुबां के संरक्षण के लिए वे आज भी प्रयत्नरत हैं। आज भी कुल्लू में आयोजित होने वाले साहित्यिक आयोजनों में तरनुम्म में अपनी पहाड़ी रचनाएं सुनाकर नई पीढ़ी को अपनी बोली को बचाने का संदेश देती हैं।
किताब में प्रकाशित गीत, संगीत साधना के लिए सम्मान
सरला चंबयाल को कुल्लुवी साहित्य और लोकसंगीत में योगदान के लिए कई संस्थाओं ने सम्मानित किया है। उन्हें कुल्लू के हिमतरू प्रकाशन की ओर से कुल्लुवी साहित्य में सराहनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। सरला चंबयाल के लिए लिखे गीतों की किताब प्रकाशित हुई है। उनके लिखे गीतों में लोकजीवन के रंग धड़कते हैं।

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