कुगती के केलंग बजीर मंदिर में पूरी होती है चेले से गूर बनाने की प्रक्रिया, कुगती गांव में देव मान्यता के चलते आज तक न तो मुर्गा पाला जाता है और न ही खाया जाता है

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कुगती (चंबा )से मनीष वैद की रिपोर्ट

हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिला के भरमौर उपमंडल के  दुगर्म क्षेत्र कुगती गांव में देव मान्यता के चलते आज तक न तो मुर्गा पाला जाता है और न ही खाया जाता है। मान्यता  है  कि मुर्गा देवता के झंडे में विराजमान है, जबकि मोर उनका वाहन है। कुगती में कार्तिक स्वामी का मशहूर मंदिर है, जिसे   केलंग बजीर से नाम से ख्याति प्राप्त है। केलंग बजीर गद्दी समुदाय के अलावा कांगड़ा-चंबा और लाहौल-स्पीति के लोगों के ईष्ट देवता हैं। कार्तिक स्वामी भगवान शिव शंकर के ज्येष्ठ पुत्र हैं जिन्हें देवभूमि हिमाचल प्रदेश में केलंग बजीर के नाम से मान्यता प्राप्त है। मणिमहेश यात्रा के दौरान  शिव भक्त इस मंदिर में पहुंच कर आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। शत्रु पर विजय पाने के लिए करते हैं बनखंडी में बगलामुखी की साधना, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने बनाया था यह प्राचीन मंदिर

बैसाखी के दिन खुलते मंदिर के कपाट
सर्दियों के दिनों में कुगती में बर्फबारी होने के कारण  संभवत: नवंबर माह से इस मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, जो प्राचीन परंपरा के अनुसार अप्रैल में बैसाखी के दिन खोले जाते हैं। हर वर्ष देवता का जन्मदिवस सात-आठ दिनों के लिए विशेष पूजा-पाठ के साथ मई अथवा जून माह में मनाया जाता है। इस दौरान देवता के चेले और गूर पारम्परिक वाद्य यंत्रों से देवधुनें निकालते हैं। इस दौरान देवता के मंदिर में खेल का भी आयोजन होता है। लोक विश्वास है कि इस मंदिर में सच्ची श्रद्धा से  जो भी मन्नत मांगता है, उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है।नाग मण्डोर को निमंत्रण को साथ शुरू होता चुवाड़ी का हर शुभ कार्य, चंबा जिला के चुवाड़ी में कुठेड़ गांव में है मंदिर

सात किलोमीटर का पैदल सफर
यह भव्य मंदिर भरमौर मुख्यालय से करीब 33 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भरमौर से 26 किलोमीटर तक वाहन में सफर तय होता है, जबकि सात किलोमीटर का सफर पैदल तय करना होता है। मणिमहेश यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु पवित्र डल की परिक्रमा करने के उपरांत कार्तिक स्वामी के दर्शन करने के लिए अवश्य जाते हैं। लाहुल-स्पीति से कुगती होकर मणिमहेश यात्रा पर आने वाले शिव भक्त कार्तिक स्वामी के दर्शन करने के बाद मणिमहेश पहुंचते हैं।द्वापर युग से जुड़ा है उदयपुर के मृकुला देवी मंदिर का इतिहास, प्राचीन काष्ठ कला का अद्भुत उदाहरण, यहां है महिषासुर के रक्त से भरा खप्पर, भूल से कोई देख ले तो हो जाएगा अंधा


केलंग बजीर के गूर, डल तोडने की रस्म
राधाष्टमी के दिन मणिमहेश झील में शाही स्नान शुरू करने से पहले डल तोडऩे की अहम रस्म में केलंग बजीर के गूरों की खास भूमिका है। संचूई के शिव चेले डल तोडऩे की रस्म को निभाते हैं। डल तोडऩे की रस्म निभाने से पहले शिव चेलों समेत भद्रवाह से आई छडिय़ां डल झील की परिक्रमा करती हैं। इस दौरान भगवान भोले नाथ के जयकारों से पूरा माहौल गूंज उठता है। इसके बाद केलंग बजीर के गूर संचूई के शिव चेलों को इशारा करते हैं और देखते ही देखते चेले डल झील में कूद कर इसे आर-पार कर जाते हैं। डल तोडऩे की रस्म पूरी होते ही मणिमहेश झील पर शाही स्नान शुरू हो जाता है।आशापुरी मंदिर के नजदीक पहाड़ी पर बनी गुफा में बाबा भौडी सिद्ध , 2300 पूर्व पुराना है मंदिर का इतिहास

शिव पार्वती से नाराज हो गए दक्षिण
एक किवदंती के अनुसार युद्ध के देवता माने जाने वाले केलंग बजीर का जन्म ताड़कासुर राक्षस का वध करने के लिए हुआ था। हिमालय पर्वतमाला में शिव शंकर के साथ कार्तिक स्वामी का भी वास है। भरमौर के कुगती में मुख्य मंदिर में केलंग बजीर विराजमान है। दक्षिण भारत में भी केलंग बजीर ने अधिक समय बिताया है, जहां वह अपने पिता शिव और माता पार्वती से नाराज होकर चले गए थे। उन्हें वहां पर कार्तिक स्वामी के नाम से पूजा जाता है। वहीं पर केलंग बजीर ने शुरपदमण राक्षस को भी हराया था।गोविंद सागर झील में बाबा गरीबनाथ का मंदिर, पेड़ के नीचे की थी तपस्या, नौ नाथों में शामिल हैं बाबा गरीब नाथ 


देश दुनिया में कार्तिक स्वामी के मंदिर
कुगती के अलावा हिमाचल प्रदेश में कुल्लू, मनाली और लाहौल-स्पीति में केलंग बजीर के मंदिर बने हुए हैं।  कांगड़ा के खनियारा के थातरी गांव में केलंग बजीर का मंदिर स्थापित किया गया है। उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग में भी कार्तिक स्वामी का ऐतिहासिक मंदिर स्थिति है। केलंग बजीर को दक्षिण भारत में कार्तिक स्वामी, मुरुगन, दंडपानी, कुमारहण और श्रीसुब्रह्मण्यम के नाम से पूजा जाता है। कर्नाटक व आंध्रप्रदेश के अलावा श्रीलंका, मोरिशियस, सिंगापुर, मलेशिया, में भी कार्तिक स्वामी के मंदिर हैं।अजब-गजब : किले के अंदर मंदिर, रात में सुनाई देती है नृत्य करती मीरा के घुंघरूओं की खनक, बृजराज स्वामी का मंदिर है नूरपुर किले की जीवंतता, कभी यह स्थान कहलाता था ‘दरबारे खास’

कुगती के केलंग बजीर मंदिर में पूरी होती है चेले से गूर बनाने की प्रक्रिया
लाहौल से हर साल शिवभक्त मणिमहेश यात्रा के लिए आते हैं। लाहौल से मणिमहेश झील में पवित्र स्नान करने आने वाले भक्तों के लिए कुगती के केलंग बजीर का खास महत्व है। त्रिलोकीनाथ मंदिर लाहौल से यात्रा शुरू करने वाले शिवभक्त चौथे दिन केलंग बजीर के मंदिर में पहुंचते हैं। इसी मंदिर में चेले से गूर बनाने बनाने की प्रक्रिया चलती है। चेले से गूर बनने की प्रक्रिया कठिन तथा लंबी होती है। केलंग बजीर के मंदिर में मानदंडों को पूरा करने वाले नए चेलों को गूर की उपाधि दी जाती है।


लाहौल से कुगती जोत होकर मणिमहेश यात्रा का रास्ता सबसे दुर्गम और मुश्किल है। लाहौल से मणिमहेश कैलाश  के दर्शन के लिए 16568 फुट ऊंचे कुगती जोत की  खतरनाक ऊंचाई पर चढऩी होती है। लाहौल के शिव- भक्तों के लिए मणिमहेश की यात्रा काफी मायने रखती है। शिव भक्तअपनी जान जोखिम में डालकर दुर्गम रास्तों को पार कर लाहौल से मणिमहेश झील पर पहुंचते हैं।  शिवभक्तयात्रा में पांच पड़ाव के बाद छठे दिन लाहौल से मणिमहेश पहुंचते हैं। उदयपुर में आयोजित होने वाले पोरी मेले के आखरी दिन त्रिलोकनाथ मंदिर से शिव भक्तों का दल मणिमहेश यात्रा के लिए निकलता है।अबूझ पहेली बना हुआ मुग़ल बादशाह अकबर का मां ज्वालाजी मंदिर में चढ़ाया सवा मन सोने का छत्र

पहली रात सिंदवाड़ी गांव के नीचे बिताने के बाद दूसरा पड़ाव रापे गांव के ऊपर होता है। तीसरे दिन का रात्रि विश्राम अल्यास में करने के बाद शिवभक्त चौथे दिन केलंग बजीर के मंदिर में पहुंचते हैं। चेले से गूर बनने की प्रक्रिया कठिन तथा लंबी होती है। केलंग बजीर के मंदिर में गूर मानदंडों को पूरा करने वाले नए चेलों को गूर की  उपाधि दी जाती है। अगली सुबह पांचवें दिन केलंग मंदिर से दल ने यात्रा शुरू कर छठे दिन मणिमहेश झील पर पहुंचते हैं। लाहौल से मणिमहेश झील तक पहुंचने का रास्ता सबसे दुर्गम और मुश्किल माना जाता है। कुगती जोत होकर पथरीले पहाड़ों और बर्फ पर नंगे पांव कई कई शिव उपासक कठिन सफर तय करते हंै। मणिमहेश यात्रा से लौट कर शिव भक्त अपने घर पहुंच कर शिव को जातर देते हैं, जिसे धणी जातरÓ कहा जाता है ।हठ योग : 26 साल की उम्र में देखा शिव मंदिर बनाने का सपना, 38 साल अकेले काम कर 64 साल की उम्र में बना दिया भव्य मंदिर चायल की एक पहाड़ी पर बने भव्य कुंभ शिव मंदिर के निर्माण के पीछे सत्य भूषण के संकल्प की प्रेरककथा


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