‘कुक्कू लगी पे सिम्बलां जो रोंदी तूं पिछ्लेयां निम्बलां जो’ इन दिनों पहाड़ पर अपनी और आकर्षित कर रहे सेमल पेड़ से परिचय

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‘कुक्कू लगी पे सिम्बलां जो रोंदी तूं पिछ्लेयां निम्बलां जो’ इन दिनों पहाड़ पर अपनी और आकर्षित कर रहे सेमल पेड़ से परिचय
फोकस हिमाचल फीचर डेस्क
सेमल के फलों की निस्सारता भारतीय कवि परंपरा में बहुत काल से प्रसिद्ध है और यह अनेक अन्योक्तियों का विषय रहा है । ‘सेमर सेइ सुवा पछ्ताने’ यह एक कहावत सी हो गई है । पहाड़ी के गीतकारों ने भी इस पेड़ के बहाने पछतावे को लोकगीतों में ढाला है। एक बानगी देखिये – ‘कुक्कू लगी पे सिम्बलां जो रोंदी तूं पिछ्लेयां निम्बलां जो’ आज कल पहाड़ पर सिम्बल कहे जाने और बहुतयात पाए जाने वाले पेड़ पर यौवन आ गया है। फूलों से लकदक पेड़ अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। आओ इस पेड़ से परिचय करते हैं।
कॉटन ट्री’ – तने में कांटे, फूलों से रेशे
पहाड़ी में सिम्बल कहे जाने वाले इस पेड़ को संस्कृत में शाल्मली, हिंदी एन कांटीसेंबल, रक्त सेंबल, सेमल, सेमर कंद, सेमुल, सेमुर, शेंबल, शिंबल, सिमल, सिमुल और बंगाली में रक्तसिमुल, कटसेओरी कहा जाता है। सेमल (वैज्ञानिक नाम बॉम्बैक्स सेइबा है और इसे ‘कॉटन ट्री’ कहा जाता है। इसकी पत्तियां डेशिडुअस होतीं हैं। इसके लाल पुष्प की पांच पंखुड़ियाँ होतीं हैं। इसका फल एक कैपसूल जैसा होता है। ये फल पकने पर श्वेत रंग के रेशे, कुछ कुछ कपास की तरह के निकालते हैं। इसके तने पर एक इंच तक के मजबूत कांटे भरे होते हैं।
शेटरिंग के काम आती लकड़ी
सेमल की रूई रेशम सी मुलायम और चमकीली होती है और गद्दों तथा तकियों में भरने के काम में आती है, क्योंकि काती नहीं जा सकती।
इसकी लकड़ी इमारती काम के उपयुक्त नहीं होती है।इसकी लकड़ी पानी में खूब ठहरती है और नाव बनाने के काम में आती है। हिमाचल प्रदेश में इस पेड़ की लकड़ी शेटरिंग में प्रयोग लाई जा रही है।
आयुर्वेद – कमाल की औषधि है यह पेड़
आयुर्वेद में सेमल बहुत उपकारी ओषधि मानी गई है । यह मधुर, कसैला, शीतल, हलका, स्निग्ध, पिच्छिल तथा शुक्र और कफ को बढ़ाने वाला कहा गया है । सेमल की छाल कसैली और कफनाशक; फूल शीतल, कड़वा, भारी, कसैला, वातकारक, मलरोधक, रूखा तथा कफ, पित्त और रक्तविकार को शांत करनेवाला कहा गया है ।
रोगों में रामबाण
प्रदर रोग में सेमल के फलों को घी और सेंधा नमक के साथ साग के रूप में बनाकर खाने से स्त्रियों का प्रदर रोग ठीक हो जाता है। फूलों की सब्जी देशी घी में भूनकर सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ मिलता है। इस वृक्ष की गोंद का सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर में बहुत अधिक लाभ मिलता है।इस वृक्ष की छाल को पीस कर लेप करने से जख्म जल्दी भर जाता है सेमल के एक से दो ग्राम फूलों का चूर्ण शहद के साथ दिन में दो बार रोगी को देने से रक्तपित्त का रोग ठीक हो जाता है। इस वृक्ष के पत्तों के डंठल का ठंडा काढ़ा पीने से दस्त बंद हो जाते हैं। इस वृक्ष की रूई को जला कर उसकी राख को शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से आराम मिलता है। सेमल के पत्तों को पीसकर लगाने या बाँधने से गांठों की सूजन कम हो जाती है।

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