काजू से भी महँगा बिकता है हिमाचल का यह ड्राई फ्रूट ‘पाइन नट’ किन्नौर में टापरी से लेकर पूह तक सतलुज किनारे पैदा होता है चिलगोजा

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काजू से भी महँगा बिकता है हिमाचल का यह ड्राई फ्रूट ‘पाइन नट’ किन्नौर में टापरी से लेकर पूह तक सतलुज किनारे पैदा होता है चिलगोजा
शिमला से विनोद भावुक की रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर में टापरी से लेकर पूह तक सतलुज नदी के किनारे एक ऐसा दुर्लभ ड्राई फ्रूफ ‘पाइन नट’ पैदा होता है, औषधीय गुणों के कारण जिसकी कीमत बाज़ार में काजू से भी ज्यादा होती है। चिलगोजा कहा जाने वाला यह ड्राई फ्रूफ चीड़ से मिलते- जुलते पेड़ पर पैदा होता है, जो खासकर टापरी से लेकर पूह तक केवल सतलुज नदी के किनारे पाए जाते हैं। यह पेड़ चीड़ के पेड़ से मिलता जुलता है, लेकिन पेड़ का तना सफेद होता है। चीड़ की तरह ही इसके कोन्स होते हैं, जिसमें बीज लगते हैं। चिलगोजा को स्थानीय भाषा में नेयोजा के नाम से जाना जाता है। चिलगोजा खरीदने के लिए व्यवसायी दूर-दूर से किन्नौर के मुख्यालय रिकांगपिओ आते हैं। कई बीमारियों में रामबाण चिलगोजा भारतीय बाजार में ही दो हजार रूपये प्रति किलोग्राम से कीमत में बिकता है।
अभी तक वैज्ञानिक खेती दूर की कोड़ी
तमाम कोशिशों के बावजूद चिलगोजे की वैज्ञानिक खेती अभी तक संभव नहीं हो पाई है। हिमाचल प्रदेश का वन विभाग और बागवानी विभाग चिलगोजा की अऩ्यत्र खेती करने के प्रयास कर चुका है, लेकिन अभी तक यह दूर की कोड़ी साबित हुई है। किन्नौर में हर साल पाइन नट के हजारों नए पौधे रोपे जा रहे हैं, लेकिन उम्मीद के अनुरूप कम ही पौधे टिक पाते हैं। जानकारों का कहना है कि यदि इस पेड़ के संरक्षण पर विशेष ध्यान न दिया गया तो औषधीय तत्वों से भरपूर यह चिलगोजा विलुप्त हो सकता है।
जापान की मदद से पाइन नट की खेती के प्रयास
हिमाचल प्रदेश के वन विभाग ने जापान इंटरनेशनल कारपोरेशन एजेंसी (जीका) के आर्थिक सहयोग से हिमाचल प्रदेश वन पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन और आजीविका सुधार परियोजना के तहत 800 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। 10 साल की परियोजना का मुख्य उद्देश्य वन कवर, जैव विविधता संरक्षण में सुधार और संस्थागत क्षमता को मजबूत करके ग्रामीण लोगों की अर्थव्यवस्था में सुधार करना है। इस वित्त वर्ष के लिए 41.78 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं और 12,000 हेक्टेयर वन भूमि पर एक करोड़ से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिनमें पाइन नट के 35,000 पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए क्षेत्र के लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण वन समितियों का गठन किया गया है। देखना होगा कि इस दिशा में वन विभाग के प्रयास कितने सफल होते हैं।
चीन- नेपाल- अफगानीस्तान में चिलगोजा
किन्नौर के अलावा भारत में कश्मीर के छोटे से हिस्से में भी चिलगोजा पाया जाता है। उधर नेपाल, अफगानिस्तान और चीन में भी कुछ सीमित क्षेत्रों में चिलगोजा पाया जाता है। उंची चट्टानों, पहाड़ों और पत्थरों के बीच विशालकाय पेड़ों के इन कोन्स को निकालना आसान नहीं होता। काफी मेहनत के बाद निकले चिलगोजा को बाज़ार में अच्छा भाव मिलता है। अगर हिमाचल प्रदेश वन विभाग इसकी खेती करने में सफल रहता है तो किन्नौर में पाइन नट स्थानीय रोजगार और सतत आजीविका का आधार बन सकता है।

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