कांगड़ा का यह संयुक्त परिवार, सेब की बागवानी से किया चमत्कार, 1980 से बागवानी के क्षेत्र में बनाई पहचान, स़ुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के मॉडल से उगाया सेब

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कांगड़ा का यह संयुक्त परिवार, सेब की बागवानी से किया चमत्कार, 1980 से बागवानी के क्षेत्र में बनाई पहचान, स़ुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के मॉडल से उगाया सेब
नगरोटा बगवां के अमतराड़ गांव से विनोद भावुक की रिपोर्ट
अस्सी का दशक था। कांगड़ा जिला के नगरोटा बगवां के अमतराड़ के शिक्षक सुरेश चंद उपाध्याय ने अपने शिक्षक दोस्त ज्ञान चंद के सहयोग से अपनी पैतृक भूमि पर बागवानी की शुरूआत की। सबसे पहले लीची का बाग लगाया गया, फिर आम, संतरे, नींबू की सफल बागवानी करने के बाद तीन साल पहले उन्होंने लोअर हाइट पर सेब की बागवानी शुरू की तो कई लोगों को लगा था कि शायद ही उन्हें कामयाबी मिलेगी। सुरेश चंद उपाध्याय ने दशकों के अपने अनुभव व कड़ी मेहनत के दम पर सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के मॉडल से सेब की बागवानी कर धौलाधार में सेब उत्पादन की नई संभावनाओं को जन्म दिया है। उनकी देखादेखी व परामर्श से अब क्षेत्र के अन्य कृषक भी सेब बागवानी की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। उनके बगीचे में सेब की दो अर्ली वैरायटीज अन्ना और डोरमेट के पांच से करीब सेब के पौधे हैं। अढ़ाई साल के पौधे फल दे रहें हैं।
एकता में बल
परिवार के तीन भाईयों का आज भी संयुक्त परिवार है। सुरेश उपाध्याय जहां सेटर हैंड टीचर के पद से सेवानिवृत हुए हैं, वहीं डॉ. कुशल कुमार उपाध्याय जिला आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारी के पद से रिटायर्ड हुए हैं। तीसरे भाई अविनाश उपाध्याय तीसरी बार स्थानीय पंचायत के प्रधान हैं। इस बीच एक बार उनकी धर्मपत्नी मधुबाला उपाध्याय भी पंचायत की प्रधान निर्वाचित हो चुकी हैं। तीनों भाईयों के अधिकतर बच्चों की शादियां भी हो चुकी हैं, बावजूद इसके परिवार आज भी संयुक्त परिवार के तौर पर मिसाल पेश कर रहा है।
कीवी और ब्लैक बैरी पर फोकस
इस परिवार के बगीचे में अब भी लीची के करीब डेढ़ सौ पौधे फल दे रहे हैं, वहीं आम का बगीचा भी है। अब वे संतरे, अमरूद व नींबू की बागवानी छोड़ चुके हैं। उन्होंने इसी साल अपने बगीचे में कीवी और ब्लैक बैरी की बागवानी की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इस परिवार ने प्राकृतिक खेती करने में भी क्षेत्र में अपनी खासी पहचान बनाई है।

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