कवि गोपाल शर्मा की समीक्षा : संघर्ष और साहस की अभिव्यक्ति है कवि विनोद ध्रब्याल राही का काव्य संग्रह “चांद पर लाजो”

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विज्ञान का विद्यार्थी जब कविता लिखने उतरता है, तो वह नये प्रयोग करता है और परिणाम स्वरूप “चांद पर लाजो” काव्य संग्रह का जन्म होता है।  जिसमें अभावों के प्रभाव के साथ साथ संघर्ष और साहस की अभिव्यक्ति हुई है।  ज्येष्ठ के ताप का किसी शरीर को ठण्डा कर देना और बरसात में शरीर में से आग निकलना, कविता में प्रयुक्त ऐसे प्रतीक और बिम्ब हैं जिनसे कवि के सामर्थ्य का पता चलता है। न्नदू और लाजो के माध्यम से कवि ने समाज में व्याप्त विसंगतियों और वंचनाओं को अभिव्यक्ति दी है।  संग्रह की सारी कविताएं स्वछंद होते हुए भी अपने में लयता और रवानी लिए हुए हैं।शब्दों की बुनाई बड़ी कुशलता से की गई है। “मास्टर जी” व “नन्ही बच्ची”  कविताओं के माध्यम से कवि ने न्याय व्यवस्था पर जोरदार प्रहार किया है।  तो “खामोशी का दर्द” में स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं के संघर्ष को सुंदर शब्दों में पिरोया है।  “लाल गाय” के माध्यम से समाज को निस्वार्थ भाव से गाऊ सेवा करने की नसीहत दी है, न कि हम दान भी स्वार्थ की चाशनी में लपेट कर करें। लोगों के हर्ष और विषाद का साक्षी चम्बा का चौगान कवि के भावों को उद्वेलित करके कविता का रूप लेकर कुछ इस प्रकार प्रकट हुआ है-साहित्यकार भूपेंद्र जम्वाल ‘ भूपी’ का पहाड़ी भाषा पर विचार : ‘पहाड़ कन्ने पहाड़ी’

 

सदियों से हरता आया है
अपनी शरण में आने वालों की
कुंठा और परेशानियां
बंटाता आया है दर्द
चम्बा का चौगान।

“वह” कविता में कवि नारी की समाज में जो स्थिति है उसका आंकलन कर रहा है। नारी सशक्तिकरण के प्रयासों को तो वह नाकाफी मानता ही है साथ में नारी के स्वयं के उद्योग से भी कवि संतुष्ट नहीं है।

कौए से भिड़ने वाली
पिद्दी सी चिड़िया तो
कब से सिखा रही है उसे
आंगन में आकर
अपनी रक्षा के लिए
लड़ना, चीखना,चिल्लाना।

 

कवि ने प्रकृति का बड़ी निकटता से अवलोकन किया है, तथा इसके साथ छेड़छाड़ उसे व्यथित करती है। चिड़िया का गुम हो जाना कवि के ह्रदय को कचोटता है।  कहीं नदी की पीढ़ा को शब्द देकर पाठक ने मन को झकझोरने की कोशिश करता है।  गाँव का शहर हो जाना कवि को नश्तर की तरह चुभता है।

गांव में बीता पल पल याद आता है
जब कंक्रीट का जंगल नश्तर चुभाता है।

 

प्रेम की पराकाष्ठा देखिए पत्नी को अर्धांगिनी की जगह पूर्णांगिनी कहकर अपने अस्तित्व को ही उसी में विलीन कर दिया।पिता की पुस्तक में बेटी के रेखाचित्र :  सुंदरनगर के साहित्यकार पवन चौहान के कथा संग्रह में उनकी बेटी आस्था के रेखाचित्र, नौवी में पढ़ने वाली आस्था को कविता, कहानी लेखन और चित्रकारी का है शौक 

 

जमा लिया है अधिपत्य
तुम्हारी खुशबू ने
मेरी साँसों पर
हो गया हूँ आश्रित
तुम पर इस कद्र
कि तुम्हें अर्धांगिनी नहीं
पूर्णांगिनी कहना उचित होगा।

 

बड़े भाई तथा पिता जी के असमय चले जाने की पीढ़ा व कृतज्ञयता “पिता” कविता म़ें यूँ छलकी है-

 

मेरा यह जीवन
तुम्हारे श्रम
परित्याग
और आशीषों की ही उपज है।

 

कविता की सार्थकता साकारात्मक दृष्टिकोण में है। दुख है, चिंता है, परेशानियां हैं, विषमताएं हैं, संघर्ष है। परंतु इन सब पर विजय प्राप्त कर लेने की एक उम्मीद, एक विश्वास और साहस का होना भी बहुत आवश्यक है। इन सब के दर्शन हमें विनोद ध्रब्याल राही जी के इस काव्य संग्रह “चांद पर लाजो” में होते हैं। भाव और भाषा के सुंदर संगम से प्रकट हुए इस काव्य संग्रह के लिए विनोद राही जी को बहुत बहुत बधाई ।आशा है मां बीणा वादिनी के आशीष से वह और भी बहुत कुछ लिख कर साहित्य को समृद्ध करेंगे। विनोद जी के सुखद तथा स्वस्थ जीवन के लिए मेरी मंगलकामनाएं। कसौली में पैदा हुए, मसूरी को बनाया घर, भारत में बचपन की स्मृतियां और प्रेम के कारण इंग्लैड से लौट आने वाले लेखक रस्किन बांड की जिंदगी से एक दिलचस्प कहानी, बकौल रस्किन – ‘आसान नहीं बच्चों का ध्यान किताबों की तरफ खींचना’

 

समीक्षक : गोपाल शर्मा,  कांगड़ा, हि प्र.

 

 

 

 

 


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